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Rohtak News: हमें नहीं पता क्या है मजदूर दिवस, काम मिलेगा तो चूल्हा जलेगा
Thu, 02 May 2024 05:20 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
Updated Thu, 02 May 2024 05:20 AM IST
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शहर में लाल चौंक पर सिर पर पत्थरों का टोकरा लेकर जाता श्रमिक।
बहादुरगढ़। बहादुरगढ़ के रेलवे रोड पर विश्वकर्मा चौक के नजदीक सुबह-सुबह काम की तलाश में सैकड़ों श्रमिक जमा थे। सबकी आंखें ग्राहक को तलाश रही थी। जैसे ही कोई बाइक या स्कूटी से आता सब उसे घेरकर खड़े हो गए। बोले बताओ साहब क्या काम है। चिनाई करानी है या घर पर रंग रोगन। किसी की बात बनी तो मोलतोल करके मजदूरी तय की और काम पर चले गए । कोई काम के लिए ग्राहक का इंतजार ही करता रहा। इन्हें मजदूर दिवस के बारे में नहीं पता था। बताने पर कहा साहब हमारा क्या मजदूर दिवस। काम मिलेगा तो चूल्हा जलेगा ।
बुधवार को मजदूर दिवस मनाया गया। इसको लेकर रेलवे रोड पर काम की तलाश में पहुंचे मजदूरों से बात की। अधिकांश को इसकी जानकारी नहीं थी। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखड़ और बिहार शामिल हैं। अधिकतर मेहनत-मजदूरी तो काफी चिनाई (राज मिस्त्री) के अलावा अन्य कई तरह के काम करते हैं। ये सभी श्रमिक सुबह 7 बजे रेलवे रोड पर स्थित अग्रसेन धर्मशाला के बाहर पहुंच जाते हैं और करीब 1 बजे तक यहीं पर काम के लिए डटे रहते हैं।
कभी मिलता है काम, कभी नहीं
बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले रामबाबू ने बताया कि उन्हें मजदूर दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं है। उनके लिए तो हर दिन एक जैसा है। रामबाबू के अनुसार, वे प्रतिदिन यहां पर काम की तलाश में पहुंचते हैं, लेकिन महीने में करीब 15-20 दिन ही काम मिल पाता है। ऐसे में 10 दिनों तक उन्हें खाली रहकर ही संतोष करना पड़ता है। इस तरह राम बाबू केवल अकेला ऐसा शख्स नहीं है जिसे महीने में 10 दिन काम नहीं मिलता। सुबह जैसे ही घड़ी की सूई 10 पर पहुंचती है तो रेलवे रोड से इन मजदूरों की संख्या समाप्त हो जाती है। काफी ऐसे मजदूर बगै र काम मिले ही वापस अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो जाते हैं। वे फिर अपनी किस्मत को कोसते हैं।
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गेहूं कटान और मंडियों में काम अंतिम चरण में
उत्तर प्रदेश के जालौर और कन्नौज के रहने वाले श्रमिक बाबूराम व राजू ने बताया कि पिछले कई दिनों से उन्हें खेतों और अनाज मंडी में काम मिल रहा था, लेकिन अब खेतों और मंडियों में काम कम हो गया है। ऐसे में उनके लिए समस्या पैदा हो गई है। यदि अगले दिनों में काम नहीं मिलता है तो रोटी के भी लाले पड़ जाएंगे।
सरकार नहीं देती ध्यान
अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और झारखंड के श्रमिकों संजय व सलीम ने कहा कि चाहे मजदूर दिवस हो, चोह कोई और दिवस उन्हें रोजगार मिल जाता है तो ठीक, अन्यथा उन्हें दिन बिताना ही बड़ी मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार भी मजदूरों की ओर कोई ध्यान नहीं देती। यदि उन्हें प्रतिदिन रोजगार मिल जाए तो उनका गुजर-बसर ठीक ढंग से हो सकता है। बहादुरगढ़ में 70 हजार से अधिक श्रमिक अलग-अलग स्थानों पर काम करते हैं।
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बुधवार को मजदूर दिवस मनाया गया। इसको लेकर रेलवे रोड पर काम की तलाश में पहुंचे मजदूरों से बात की। अधिकांश को इसकी जानकारी नहीं थी। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखड़ और बिहार शामिल हैं। अधिकतर मेहनत-मजदूरी तो काफी चिनाई (राज मिस्त्री) के अलावा अन्य कई तरह के काम करते हैं। ये सभी श्रमिक सुबह 7 बजे रेलवे रोड पर स्थित अग्रसेन धर्मशाला के बाहर पहुंच जाते हैं और करीब 1 बजे तक यहीं पर काम के लिए डटे रहते हैं।
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कभी मिलता है काम, कभी नहीं
बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले रामबाबू ने बताया कि उन्हें मजदूर दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं है। उनके लिए तो हर दिन एक जैसा है। रामबाबू के अनुसार, वे प्रतिदिन यहां पर काम की तलाश में पहुंचते हैं, लेकिन महीने में करीब 15-20 दिन ही काम मिल पाता है। ऐसे में 10 दिनों तक उन्हें खाली रहकर ही संतोष करना पड़ता है। इस तरह राम बाबू केवल अकेला ऐसा शख्स नहीं है जिसे महीने में 10 दिन काम नहीं मिलता। सुबह जैसे ही घड़ी की सूई 10 पर पहुंचती है तो रेलवे रोड से इन मजदूरों की संख्या समाप्त हो जाती है। काफी ऐसे मजदूर बगै र काम मिले ही वापस अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो जाते हैं। वे फिर अपनी किस्मत को कोसते हैं।
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गेहूं कटान और मंडियों में काम अंतिम चरण में
उत्तर प्रदेश के जालौर और कन्नौज के रहने वाले श्रमिक बाबूराम व राजू ने बताया कि पिछले कई दिनों से उन्हें खेतों और अनाज मंडी में काम मिल रहा था, लेकिन अब खेतों और मंडियों में काम कम हो गया है। ऐसे में उनके लिए समस्या पैदा हो गई है। यदि अगले दिनों में काम नहीं मिलता है तो रोटी के भी लाले पड़ जाएंगे।
सरकार नहीं देती ध्यान
अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और झारखंड के श्रमिकों संजय व सलीम ने कहा कि चाहे मजदूर दिवस हो, चोह कोई और दिवस उन्हें रोजगार मिल जाता है तो ठीक, अन्यथा उन्हें दिन बिताना ही बड़ी मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार भी मजदूरों की ओर कोई ध्यान नहीं देती। यदि उन्हें प्रतिदिन रोजगार मिल जाए तो उनका गुजर-बसर ठीक ढंग से हो सकता है। बहादुरगढ़ में 70 हजार से अधिक श्रमिक अलग-अलग स्थानों पर काम करते हैं।