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सांदल बार का इतिहास सिर्फ अतीत नहीं, पर्यावरण व पहचान की चेतावनी : धालीवाल
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33 केवल धालीवाल। संवाद
रोहतक। सांदल बार, पंजाब का वह इलाका है जहां कभी रावी और चिनाब के बीच घने जंगल, शुद्ध हवा और प्रकृति से जुड़ा जीवन था। सुपवा में आयोजित सांदल बार नाटक के निर्देशक केवल धालीवाल ने खास बातचीत में बताया कि अंग्रेजी हुकूमत के दौर में इस इलाके के लोगों को उनकी ही धरती से उजाड़ दिया गया। इसी भूले-बिसरे इतिहास को मंच पर जीवित करता है एक नाटक, जो आज की पीढ़ी को प्रकृति, संघर्ष और विस्थापन की सच्चाई से रूबरू कराता है। संवाद
सवाल: सांदल बार क्या था और इसका इतिहास क्यों महत्वपूर्ण है?
सांदल बार पंजाब का वह ऐतिहासिक क्षेत्र था जो आज पाकिस्तान में है। यह इलाका रावी और चिनाब नदियों के बीच फैला हुआ था। यहां जंगल, हरियाली और प्राकृतिक जीवन भरपूर था। लोग खेती, पशुपालन और सादगी भरे जीवन से जुड़े थे। सांदल बार के लोग प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन मानते थे। गाय-भैंसों को बच्चों की तरह पाला जाता था। जंगल, हवा और पानी उनकी संस्कृति का हिस्सा थे। सादगी में ही उनका सुख था अच्छा खाना, स्वच्छ हवा और सामूहिक जीवन।
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सवाल : इस नाटक को करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
नई पीढ़ी को इस इतिहास के बारे में पता होना चाहिए। झूमर और सामी जैसे लोकगीतों के जरिए हमने इस कहानी को कहा है। यह केवल इतिहास नहीं बल्कि पर्यावरण और इंसानी अधिकारों की लड़ाई है। इस नाटक से हम 1976 से जुड़े हैं। लगभग 50 साल के अनुभव और शोध का नतीजा है। जून में नाटक तैयार हुआ और पहली बार कुछ दिन पहले पटियाला में मंचन हुआ। अब तक 9-10 बार इसका मंचन किया जा चुका है।
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सवाल: क्या आपका निजी रिश्ता भी इस इतिहास से जुड़ा है?
हां, मेरा परिवार भी संभल बार से जुड़ा है। धालीवाल गांव पाकिस्तान में है। विभाजन के समय हमारे लोग कई बार इधर-उधर गए। यह केवल इतिहास नहीं, मेरी अपनी कहानी भी है। स्कूल के समय से गाना और थिएटर करता था। अमृतसर में स्कूल थिएटर किया। 1978 तक गांव-गांव नाटक किए। 1991 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से लौटकर अपना थिएटर ग्रुप बनाया।
सवाल : आज के दौर में थिएटर की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
कमिटमेंट की कमी। जब तक अंदर से जुनून नहीं आता, थिएटर नहीं हो सकता। आज मोबाइल ने ध्यान बांट दिया है। थिएटर के लिए समर्पण जरूरी है। मेरे पास 5000 से ज्यादा किताबें हैं। 3000 थिएटर से जुड़ी हैं। 60 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। थिएटर को शिक्षा प्रणाली से जोड़ा जाना चाहिए। हर जिले में ओपन थिएटर बनने चाहिए।
सवाल: नई पीढ़ी के लिए आपका संदेश?
इतिहास बहुत कुछ सिखाता है। पंजाब को सिर्फ नशा और बंदूक से मत जोड़िए। हमारी असली पहचान संस्कृति, संघर्ष और प्रकृति से जुड़ी है। सादगी में ही असली ताकत है।
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सवाल: सांदल बार क्या था और इसका इतिहास क्यों महत्वपूर्ण है?
सांदल बार पंजाब का वह ऐतिहासिक क्षेत्र था जो आज पाकिस्तान में है। यह इलाका रावी और चिनाब नदियों के बीच फैला हुआ था। यहां जंगल, हरियाली और प्राकृतिक जीवन भरपूर था। लोग खेती, पशुपालन और सादगी भरे जीवन से जुड़े थे। सांदल बार के लोग प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन मानते थे। गाय-भैंसों को बच्चों की तरह पाला जाता था। जंगल, हवा और पानी उनकी संस्कृति का हिस्सा थे। सादगी में ही उनका सुख था अच्छा खाना, स्वच्छ हवा और सामूहिक जीवन।
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सवाल : इस नाटक को करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
नई पीढ़ी को इस इतिहास के बारे में पता होना चाहिए। झूमर और सामी जैसे लोकगीतों के जरिए हमने इस कहानी को कहा है। यह केवल इतिहास नहीं बल्कि पर्यावरण और इंसानी अधिकारों की लड़ाई है। इस नाटक से हम 1976 से जुड़े हैं। लगभग 50 साल के अनुभव और शोध का नतीजा है। जून में नाटक तैयार हुआ और पहली बार कुछ दिन पहले पटियाला में मंचन हुआ। अब तक 9-10 बार इसका मंचन किया जा चुका है।
सवाल: क्या आपका निजी रिश्ता भी इस इतिहास से जुड़ा है?
हां, मेरा परिवार भी संभल बार से जुड़ा है। धालीवाल गांव पाकिस्तान में है। विभाजन के समय हमारे लोग कई बार इधर-उधर गए। यह केवल इतिहास नहीं, मेरी अपनी कहानी भी है। स्कूल के समय से गाना और थिएटर करता था। अमृतसर में स्कूल थिएटर किया। 1978 तक गांव-गांव नाटक किए। 1991 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से लौटकर अपना थिएटर ग्रुप बनाया।
सवाल : आज के दौर में थिएटर की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
कमिटमेंट की कमी। जब तक अंदर से जुनून नहीं आता, थिएटर नहीं हो सकता। आज मोबाइल ने ध्यान बांट दिया है। थिएटर के लिए समर्पण जरूरी है। मेरे पास 5000 से ज्यादा किताबें हैं। 3000 थिएटर से जुड़ी हैं। 60 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। थिएटर को शिक्षा प्रणाली से जोड़ा जाना चाहिए। हर जिले में ओपन थिएटर बनने चाहिए।
सवाल: नई पीढ़ी के लिए आपका संदेश?
इतिहास बहुत कुछ सिखाता है। पंजाब को सिर्फ नशा और बंदूक से मत जोड़िए। हमारी असली पहचान संस्कृति, संघर्ष और प्रकृति से जुड़ी है। सादगी में ही असली ताकत है।