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धान की रोपाई में आड़े आ रही मजदूरों की कमी

Mon, 28 Jun 2021 01:15 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Mon, 28 Jun 2021 01:15 AM IST
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Shortage of laborers coming in the way of paddy transplantation
धान की रोपाई में मजदूरों की कमी आड़े आ रही है। कोरोना की दूसरी लहर में बड़ी संख्या में मजदूर अपने घर चले गए। जिसके चलते रोपाई की रफ्तार सुस्त है। जिलेभर में अब तक दो हजार एकड़ में ही धान की रोपाई हुई है। जबकि, पिछले साल इसी समय तक तीन हजार एकड़ में धान लगाया जा चुका था।
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जिले में धान का रकबा करीब 60 हजार हेक्टेयर है। इस बार मानसून के 15 जून तक आने की उम्मीद थी। धान की रोपाई भी 15 जून से ही शुरू होती है। किसानों को उम्मीद थी कि समय से मानसून आएगा तो पहली सिंचाई में उनकी आर्थिक बचत हो जाएगी। लेकिन मानसून भटक गया और अब तक नहीं आया। जो किसान ट्यूबवेल से सिंचाई कर धान लगाना चाहते हैं, उनके लिए अब मजदूरों की कमी समस्या बनी हुई है। खेतीबाड़ी विभाग के अधिकारी डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि पिछले साल की तुलना में इस बार काफी कम रोपाई हुई है। मजदूरों की किल्लत किसानों के लिए मुश्किल बनी हुई है।
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डीजल महंगा होने के कारण ट्यूबवेल से सिंचाई करने में गुरेज कर रहे किसान
अखिल भारतीय किसान सभा के जिला प्रधान प्रीत सिंह ने कहा कि कोरोना की दूसरी लहर में बहुत से मजदूर अपने घर चले गए थे। जो मजदूर यहां रुके थे, वे भी पंजाब चले गए हैं। डीजल महंगा होने के कारण बहुत से किसान ट्यूबवेल से सिंचाई करने से गुरेज कर रहे हैं। वे बारिश का इंतजार कर रहे हैं। जबकि, पंजाब में रोपाई की रफ्तार तेज है, वहां काम मिल रहा है, इसलिए मजदूर फिलहाल वहीं चले गए हैं।
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किराया ज्यादा था तो नहीं गए घर, बाकी साथी चले गए
बिहार में पूर्णिया जिले के मूल निवासी पुरुषोत्तम अपने परिवार के साथ गांव किलोई के एक खेत में धान लगा रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके साथ के सभी लोग कोरोना की दूसरी लहर में अपने घर लौट गए। वह भी जाना चाहते थे। लेकन बस वाला 1800 रुपये प्रति सवारी मांग रहा था। जबकि, ट्रेन में सिर्फ तीन सौ रुपये प्रति सवारी किराया लगता है। पैसों की कमी के चलते वह मजबूरी में यहां रुके रहे। पहले सरसों की कटाई की, अब जहां काम मिल रहा है, वहां धान की रोपाई कर रहे हैं। वह 3200 रुपये प्रति एकड़ में ठेके पर रोपाई करते हैं। इसमें रोजाना के 500 रुपये बन जाते हैं।
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