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दो माह बाद सांस नली से निकाली कील

Thu, 02 Jun 2016 02:13 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक Updated Thu, 02 Jun 2016 02:13 AM IST
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खेल खेल में मासूम ने निगल ली एक इंच की कील - फोटो : amar ujala
करीब दो माह पहले तीन साल के बच्चे ने खेल खेल में एक कील निगल ली। डर के मारे उसने यह बात परिजनों को नहीं बताई। कील निगलने के बाद से उसकी तबीयत खराब रहने लगी। परेशान होकर परिजन उसे पीजीआई ले आए। डाक्टरों ने उसका एक्सरे किया तो मालूम चला कि बच्चे की सांस की नली में कील फंसी है। इसके बाद डाक्टरों ने ब्रोंकोस्कोपी से कील निकाल कर बच्चे को नया जीवन दिया। डाक्टरों का कहना है कि शुक्र रहा कि कील ने सांस की नली और फेफड़े को जख्मी नहीं किया। यदि ऐसा होता तो बच्चे की मौत हो सकती थी।
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रोहतक के बहुअकबरपुर निवासी आनंद बीमार पड़ने पर अपने तीन साल के बेटे कर्ण को पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआईएमएस) के बालरोग विभाग में लाए थे। कर्ण को बार-बार बुखार, छाती में संक्रमण, खांसी और निमोनिया की शिकायत हो रही थी। कर्ण का जब एक्स-रे कराया गया तो पता चला कि उसकी सांस की नली के सहारे करीब एक इंच की कील दाएं फेफडे़ से उलझ गई है। इसके बाद बाल रोग विभाग ने कील निकालने के लिए कर्ण को ईएनटी विभाग में भेज दिया।
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ईएनटी विभाग के प्रोफेसर रमन वडेरा और सीनियर रेजिडेंट डॉ. शरद ने 27 मई को कर्ण की ब्रोंकोस्कोपी से कील को बहार निकाल दिया। इस तरह तीन साल के मासूम को दो माह बाद नई जिंदगी मिली। इससे पहले हर पल उसकी जिंदगी दांव पर लगी थी। ब्रोंकोस्कोपी से कील निकालते समय भी बहुत सावधानी बरती गई, क्योंकि कील निकालते समय नुकसान पहुंचा सकती थी। परिजन कपिल सहगल ने कर्ण की जान बचाने के लिए डाक्टरों का आभार जताया है।
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निजी अस्पताल नहीं लेते ऐसे मामले

प्रो. रमन वडेरा का कहना है कि कर्ण जैसे मामलों को निजी अस्पताल नहीं छेड़ते, क्योंकि इसमें मरीज की जान को खतरा रहता है। ऐसी स्थिति में परिजनों को इधर-उधर भटकने की बजाय सीधा पीजीआई या किसी एक्सपर्ट के पास जाना चाहिए। प्रो. वडेरा ने बताया कि उनके सात-आठ साल के कैरियर में यह दूसरा केस है, जिसमें मरीज ने कील निगली थी। अकसर छोटे बच्चे मूंगफली, रेवड़ी, खिलौना, कंकड़ जैसी चीजें निगल लेते हैं। ये चीजें जब खाने की नली में जाती हैं तो शौच के दौरान निकल जाती हैं, लेकिन जब यही चीजें सांस की नली में जाती हैं तो समस्या हो जाती है। उन्होंने बताया कि हर माह इस तरह से 10-12 केस आ जाते हैं। परिजनों को चाहिए वे बच्चों की ओर खास ध्यान रखें।
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