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Rohtak News: दाखिला रद्द करने पर शोधार्थियों ने एमडीयू कुलपति का कार्यालय घेरा
Thu, 11 Dec 2025 12:39 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
Updated Thu, 11 Dec 2025 12:39 AM IST
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रोहतक। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय प्रशासन ने दिसंबर 2024 से पहले के सभी नेट सर्टिफिकेट पीएचडी दाखिले के लिए अयोग्य माना है। इसके चलते शोधार्थियों के दाखिले रद्द कर दिए गए हैं। इसके विरोध में शोधार्थियों ने बुधवार को कुलपति कार्यालय का घेराव किया।
डीन एकेडमिक अफेयर प्रो. एससी मलिक ने प्रदर्शन कर रहे शोधार्थियों से मुलाकात कर उनकी मांगों को सुना। दोनों पक्षों की बातचीत के बाद एमडीयू प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से पूरी दाखिला प्रक्रिया को होल्ड पर रखने का आदेश दिया।
छात्र नेता डॉ. प्रदीप देशवाल ने बताया विश्वविद्यालय प्रशासन ने आदेश जारी किया है कि दिसंबर 2024 से पहले के सभी नेट सर्टिफिकेट पीएचडी दाखिले के लिए अयोग्य माने जाएंगे। इस फैसले के चलते कई शोधार्थियों के दाखिले रद्द कर दिए गए हैं। उन्होंने एमडीयू के इस आदेश को गैरकानूनी और असांविधानिक बताया।
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उन्होंने कहा कि यूजीसी की ओर से जारी नेट सर्टिफिकेट की वैधता आजीवन होती है लेकिन एमडीयू प्रशासन की ओर से इसे अमान्य करार देना अधिकारियों की अज्ञानता को दर्शाता है। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि कार्य दिवस होने के बावजूद कुलपति, कुलसचिव सहित कोई भी मुख्य अधिकारी कुलपति सचिवालय में उपस्थित नहीं था।
इस फरमान के खिलाफ प्रभावित शोधार्थियों ने अधिवक्ता रविंद्र सिंह ढुल के माध्यम से पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिका में एमडीयू के आदेश पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई है।
डॉ. देशवाल के अनुसार उच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए यथास्थिति बनाए रखने और याचिकाकर्ता शोधार्थियों की कैंसिल की गई पीएचडी सीटों को होल्ड करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति आने के बाद इस संबंध में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
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यूं उभरा विवाद
प्रदीप देशवाल ने बताया कि इमसाॅर में प्रवेश के लिए पीएचडी शोधार्थियों ने आवेदन किया था। यहां उन्हें प्रवेश नहीं मिला। इसकी वजह यूजीसी वर्ष 2024 से पहले के नेट प्रमाण पत्र अमान्य बताए गए। इसका आवेदकों ने विरोध किया तो विवि के अन्य सभी विभागों में पुराने नेट पास उम्मीदवारों को प्रवेश दिए जाने की बात सामने आई। यूजीसी ने 2024 में जारी निर्देशों के अनुसार नेट पास तीसरी श्रेणी के लिए एक वर्ष की वैधता निर्धारित की है। विवि ने अन्य विभागों की तरह इमसॉर में पुराने नेट प्रमाण पत्र को मान्य नहीं किया और विद्यार्थियों को प्रवेश न देकर सभी दाखिले रद करने की ईमेल की। इसके चलते शोधार्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
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डीन एकेडमिक अफेयर प्रो. एससी मलिक ने प्रदर्शन कर रहे शोधार्थियों से मुलाकात कर उनकी मांगों को सुना। दोनों पक्षों की बातचीत के बाद एमडीयू प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से पूरी दाखिला प्रक्रिया को होल्ड पर रखने का आदेश दिया।
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छात्र नेता डॉ. प्रदीप देशवाल ने बताया विश्वविद्यालय प्रशासन ने आदेश जारी किया है कि दिसंबर 2024 से पहले के सभी नेट सर्टिफिकेट पीएचडी दाखिले के लिए अयोग्य माने जाएंगे। इस फैसले के चलते कई शोधार्थियों के दाखिले रद्द कर दिए गए हैं। उन्होंने एमडीयू के इस आदेश को गैरकानूनी और असांविधानिक बताया।
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उन्होंने कहा कि यूजीसी की ओर से जारी नेट सर्टिफिकेट की वैधता आजीवन होती है लेकिन एमडीयू प्रशासन की ओर से इसे अमान्य करार देना अधिकारियों की अज्ञानता को दर्शाता है। उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि कार्य दिवस होने के बावजूद कुलपति, कुलसचिव सहित कोई भी मुख्य अधिकारी कुलपति सचिवालय में उपस्थित नहीं था।
इस फरमान के खिलाफ प्रभावित शोधार्थियों ने अधिवक्ता रविंद्र सिंह ढुल के माध्यम से पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिका में एमडीयू के आदेश पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई है।
डॉ. देशवाल के अनुसार उच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए यथास्थिति बनाए रखने और याचिकाकर्ता शोधार्थियों की कैंसिल की गई पीएचडी सीटों को होल्ड करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति आने के बाद इस संबंध में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
यूं उभरा विवाद
प्रदीप देशवाल ने बताया कि इमसाॅर में प्रवेश के लिए पीएचडी शोधार्थियों ने आवेदन किया था। यहां उन्हें प्रवेश नहीं मिला। इसकी वजह यूजीसी वर्ष 2024 से पहले के नेट प्रमाण पत्र अमान्य बताए गए। इसका आवेदकों ने विरोध किया तो विवि के अन्य सभी विभागों में पुराने नेट पास उम्मीदवारों को प्रवेश दिए जाने की बात सामने आई। यूजीसी ने 2024 में जारी निर्देशों के अनुसार नेट पास तीसरी श्रेणी के लिए एक वर्ष की वैधता निर्धारित की है। विवि ने अन्य विभागों की तरह इमसॉर में पुराने नेट प्रमाण पत्र को मान्य नहीं किया और विद्यार्थियों को प्रवेश न देकर सभी दाखिले रद करने की ईमेल की। इसके चलते शोधार्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।