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भारत-चीन सीमा विवाद और टैक्सटाइल मिलों में उत्पादन आधा रहने से नरमे के भाव टूटे
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खेत में खड़ी नरमे की फसल।
- फोटो : Fatehabad
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सुरेंद्र असीजा
फतेहाबाद। भारत-चीन सीमा विवाद के बाद एक्सपोर्ट बंद होने और कोविड-19 महामारी के चलते टैक्सटाइल मिलों में उत्पादन ठप होने से नरमा के भाव 700 रुपये प्रतिक्विंटल गिरकर 4700 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं, जबकि भारत-चीन विवाद उत्पन्न होने से पूर्व इसके दाम 5400 रुपये रहे थे। नरमे के भाव गिरने से किसानों के साथ-साथ व्यापारियों को भी खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। मार्केट कमेटी व सीसीआई के अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि नरमे के भाव एक्सपोर्ट बंद होने के बाद गिरे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार फतेहाबाद में इस बार करीब 66 हजार हेक्टेयर भूमि पर नरमे की बिजाई की गई थी, जब मंडियों में नरमे की फसल आनी शुरू हो गई तो शुरू में निजी खरीददारों ने नरमा 5400 रुपये से लेकर 6200 रुपये प्रति क्विंटल खरीदा था, लेकिन बाद में इसके दाम कम होते गए। इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूई की गांठों की मांग कम होना बताया गया है। मार्च-अप्रैल के बाद कोरोना महामारी के चलते गुजरात व महाराष्ट्र में टैक्सटाइल मिलें बंद हो गईं, जिस कारण नरमे के दाम और गिर गए।
नरमा एक्सपोर्ट से जुटे व्यापारियों के अनुसार विभिन्न देशों में लॉकडाउन के बाद फैक्टरियां बंद हो गईं। भारत में भी धागे की स्पीनिंग मिलें बंद हो गईं, जिस कारण लेबर अपने घरों को चली गई ओर रूई की गांठें ज्यों की त्यों पड़ी रहीं। इस समय रुई के गांठ के दाम 4 हजार रुपये प्रति मण थे। कॉटन व्यापार से जुड़े व्यापारियों ने पंजाब, हरियाणा व गुजरात से नरमे की खरीद करनी बंद कर दी। इस वजह से रुई के दाम 3500 रुपये मण रह गए। मई के बाद कुछ फैक्ट्रियों में 50 फीसदी तक काम शुरू हुआ तो नरमें में कुछ तेजी के आसार दिखाई दिए। निजी खरीददारों द्वारा नरमा की खरीद बंद कर देने से इसके रेट भी टूटने शुरू हो गए। फतेहाबाद में इसके दाम पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल से भी कम हो गए। मई माह में कॉटन कार्पोरेशन ऑफ इंडिया ने नरमे की खरीद शुरू की। नरमे का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5405 रुपये था। सीसीआई ने कुछ दिन ही नरमे की खरीद करके इसे बंद कर दिया। वजह थी सीसीआई के पास एक करोड़ से ज्यादा रूई की गांठों का स्टॉक होना। उधर महाराष्ट्र में कोरोना के चलते कपड़े की लूूपें बंद होने से पंजाब की टैक्सटाइल मिलों में जाने वाला धागा भी वहां जाना बंद हो गया, जिसकी वजह कपड़े की डिमांड में कमी होना बताया गया है। पता चला है कि कपड़े की डिमांड कम होने से कपड़ा मिलों ने अपना उत्पादन आधा कर दिया है। इन कई कारणों से नरमे के दाम धड़ाम से गिर गए है।
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सीसीआई के पास रूई का प्रर्याप्त स्टॉक : गोयल
इस बारे में सीसीआई के सहायक प्रबंधक एपीएस गोयल ने कहा कि अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य 5405 रुपये प्रति क्विंटल की दर से 3589 गांठें अथवा 17537 क्विंटल नरमे की खरीद की है। सीसीआई के पास रूई की गांठों का पर्याप्त व जरूरत का स्टॉक है, जिस कारण जून में खरीद बंद कर दी गई।
इसलिए गिरे भाव
भारत से रूई की गांठें चीन व बांग्लादेश जाती थीं। भारत-चीन सीमा विवाद के बाद यहां से चीन से व्यापार बंद हो गया। जिस कारण नरमे के दामों में गिरावट आई है। कोविड-19 के चलते भी धागा मिलों ने अपना उत्पादन आधा कर दिया है। इन कई कारणों से नरमे के दाम में गिरावट आई है।
संजीव सचदेवा, सचिव मार्केट कमेटी फतेहाबाद
मिलों ने उत्पादन कम किया है
सीजन में रूई के दाम 4 हजार रुपये मण थे जो अब 3500 रुपये मण रह गए हैं। वजह है गुजरात व महाराष्ट्र में टैक्सटाइल मिलों द्वारा उत्पादन आधा कर देना। चीन विवाद पर भी नरमे के दामों पर असर पड़ा है।
- प्रदीप कुमार, कॉटन ब्रोकर फतेहाबाद।
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फतेहाबाद। भारत-चीन सीमा विवाद के बाद एक्सपोर्ट बंद होने और कोविड-19 महामारी के चलते टैक्सटाइल मिलों में उत्पादन ठप होने से नरमा के भाव 700 रुपये प्रतिक्विंटल गिरकर 4700 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं, जबकि भारत-चीन विवाद उत्पन्न होने से पूर्व इसके दाम 5400 रुपये रहे थे। नरमे के भाव गिरने से किसानों के साथ-साथ व्यापारियों को भी खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। मार्केट कमेटी व सीसीआई के अधिकारी इस बात की पुष्टि करते हैं कि नरमे के भाव एक्सपोर्ट बंद होने के बाद गिरे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार फतेहाबाद में इस बार करीब 66 हजार हेक्टेयर भूमि पर नरमे की बिजाई की गई थी, जब मंडियों में नरमे की फसल आनी शुरू हो गई तो शुरू में निजी खरीददारों ने नरमा 5400 रुपये से लेकर 6200 रुपये प्रति क्विंटल खरीदा था, लेकिन बाद में इसके दाम कम होते गए। इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रूई की गांठों की मांग कम होना बताया गया है। मार्च-अप्रैल के बाद कोरोना महामारी के चलते गुजरात व महाराष्ट्र में टैक्सटाइल मिलें बंद हो गईं, जिस कारण नरमे के दाम और गिर गए।
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नरमा एक्सपोर्ट से जुटे व्यापारियों के अनुसार विभिन्न देशों में लॉकडाउन के बाद फैक्टरियां बंद हो गईं। भारत में भी धागे की स्पीनिंग मिलें बंद हो गईं, जिस कारण लेबर अपने घरों को चली गई ओर रूई की गांठें ज्यों की त्यों पड़ी रहीं। इस समय रुई के गांठ के दाम 4 हजार रुपये प्रति मण थे। कॉटन व्यापार से जुड़े व्यापारियों ने पंजाब, हरियाणा व गुजरात से नरमे की खरीद करनी बंद कर दी। इस वजह से रुई के दाम 3500 रुपये मण रह गए। मई के बाद कुछ फैक्ट्रियों में 50 फीसदी तक काम शुरू हुआ तो नरमें में कुछ तेजी के आसार दिखाई दिए। निजी खरीददारों द्वारा नरमा की खरीद बंद कर देने से इसके रेट भी टूटने शुरू हो गए। फतेहाबाद में इसके दाम पांच हजार रुपये प्रति क्विंटल से भी कम हो गए। मई माह में कॉटन कार्पोरेशन ऑफ इंडिया ने नरमे की खरीद शुरू की। नरमे का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5405 रुपये था। सीसीआई ने कुछ दिन ही नरमे की खरीद करके इसे बंद कर दिया। वजह थी सीसीआई के पास एक करोड़ से ज्यादा रूई की गांठों का स्टॉक होना। उधर महाराष्ट्र में कोरोना के चलते कपड़े की लूूपें बंद होने से पंजाब की टैक्सटाइल मिलों में जाने वाला धागा भी वहां जाना बंद हो गया, जिसकी वजह कपड़े की डिमांड में कमी होना बताया गया है। पता चला है कि कपड़े की डिमांड कम होने से कपड़ा मिलों ने अपना उत्पादन आधा कर दिया है। इन कई कारणों से नरमे के दाम धड़ाम से गिर गए है।
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सीसीआई के पास रूई का प्रर्याप्त स्टॉक : गोयल
इस बारे में सीसीआई के सहायक प्रबंधक एपीएस गोयल ने कहा कि अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य 5405 रुपये प्रति क्विंटल की दर से 3589 गांठें अथवा 17537 क्विंटल नरमे की खरीद की है। सीसीआई के पास रूई की गांठों का पर्याप्त व जरूरत का स्टॉक है, जिस कारण जून में खरीद बंद कर दी गई।
इसलिए गिरे भाव
भारत से रूई की गांठें चीन व बांग्लादेश जाती थीं। भारत-चीन सीमा विवाद के बाद यहां से चीन से व्यापार बंद हो गया। जिस कारण नरमे के दामों में गिरावट आई है। कोविड-19 के चलते भी धागा मिलों ने अपना उत्पादन आधा कर दिया है। इन कई कारणों से नरमे के दाम में गिरावट आई है।
संजीव सचदेवा, सचिव मार्केट कमेटी फतेहाबाद
मिलों ने उत्पादन कम किया है
सीजन में रूई के दाम 4 हजार रुपये मण थे जो अब 3500 रुपये मण रह गए हैं। वजह है गुजरात व महाराष्ट्र में टैक्सटाइल मिलों द्वारा उत्पादन आधा कर देना। चीन विवाद पर भी नरमे के दामों पर असर पड़ा है।
- प्रदीप कुमार, कॉटन ब्रोकर फतेहाबाद।