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देश के लिए लड़ाई ही नहीं लड़ी, अंग्रेजों की यातनाएं भी सही

Sun, 23 Jan 2022 02:24 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 23 Jan 2022 02:24 AM IST
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Not only fought for the country, the tortures of the British were also right.
विकास सैनी
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रोहतक। देश की आजादी की लड़ाई आसान नहीं थी। द्वितीय विश्व युद्ध भी उन्हीं दिनों हुआ। हमारे देश के बड़ी संख्या में जवान विदेशों में लड़ने गए थे। इनमें मेरे पिता लेफ्टिनेंट चंद्रभान भी शामिल थे। वर्ष 1943 में वे सिंगापुर में थे। इन्हीं दिनों नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन किया। इसमें पिता भी शामिल हुए। इसके बाद यातनाओं का कड़ा दौर चला। पिता सकुशल घर पहुंचे तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा। इससे पूर्व पिता 6 साल घर नहीं आए। यह कहना है स्वतंत्रता सेनानी लेफ्टिनेंट चंद्रभान के बेटे खरावड निवासी बैंक से सेवानिवृत्त जयप्रकाश मलिक का। वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती की पूर्व संध्या पर अमर उजाला से बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि पिता मार्च 1946 को घर आए थे। उस समय मैं पांचवीं कक्षा में था। तीन भाई व दो बहनों में सबसे बड़ा होने के नाम घर में सभी का प्यार मिला। पिता के संघर्ष की कहानी भी धीरे-धीरे पता लगी। वे 1934 में सेना भर्ती में भर्ती हो गए थे। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो उन्हें सिंगापुर जाना पड़ा। यहां नेताजी ने जापान से बातचीत कर अपने पकड़े गए जवानों को रिहा कराया व आजाद हिंद फौज का गठन किया। पिता भी इसका हिस्सा बने। सिंगापुर में शैगोन रोड पर डिटेंशन कैंप में उन्हें बंदी बना लिया गया। यहां काफी यातनाएं सहनी पड़ीं। बाद में उन्हें भारत लाया गया। यहां बंगाल में नीलगंज कैंप में रखा गया। इस कैंप में भी स्वतंत्रता सेनानियों की यातनाएं कम या खत्म नहीं हुई। अंग्रेजों के जुल्म सहने के बावजूद ये जवान देश की आजादी के लिए संघर्षरत रहे। हमें नहीं पता छह साल पिता कहां व किन हालातों में रहे। मार्च 1946 में वे घर आए तो हर कोई खुशी से झूम उठा। इसके बाद उन्होंने घर की जिम्मेदारी संभालते हुए शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखा। केंद्र सरकार में आवेदन किया तो उन्हें एनडीएसआईए के पद पर कार्यभार मिला। डीपीई की तरह एनडीएसआईए के पद पर रह कर रोहतक के अलावा इंदौर व दिल्ली में सेवाएं दी। वे आठवीं पास थे। खरावड में पांच जून 1916 में उनका जन्म हुआ था। वे 29 अक्तूबर 1967 में 51 वर्ष की अल्पायु में हृदयगति रुकने से चल बसे। अब उनकी यादें ही शेष हैं। उनके संघर्ष से पूरे परिवार का मान सम्मान मिला है। देश के लिए लड़ाई लड़ने वालों में उनका नाम आने से हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
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गुमनाम 285 स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान का इंतजार
रोहतक। देश की आजादी में अनगिनत लोगों का योगदान रहा है। कुछ प्रत्यक्ष तो कुछ अप्रत्यक्ष रूप से आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहे। देश की आजादी के बाद सरकार ने कुछ लोगों को स्वतंत्रता सेनानी होने का सम्मान दिया। इसके बावजूद प्रदेश में अनेक स्वतंत्रता सेनानी व शहीदों के नाम गुमनामी के अंधेरे में हैं। इन नामों को स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह के बेटे श्रीभगवान फौगाट ढूंढ कर निकाल रहे हैं। पिछले एक दशक में वे 285 स्वतंत्रता सेनानियों के नाम जुटा का सरकार को भेज चुके हैं। इनमें अपने हक के सम्मान का इंतजार है। यह खुलासा नेताजी की जयंती की पूर्व संध्या पर अमर उजाला से हुई विशेष बातचीत में श्रीभगवान फौगाट ने किया।
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मूलरूप से चरखी दादरी के ढाणी फौगाट हाल रेवाडी के भक्ति नगर में रहने वाले श्रीभगवान ने कहा कि प्रदेश के अनेक स्वतंत्रता सेनानी गुमनामी के अंधेरे में हैं। इन्हें खोज कर सामने लाने के साथ इनका मान सम्मान दिलाने का प्रयास कर रहा हूं। पिछले दस साल में 285 स्वतंत्रता सेनानियों के नाम जुटाए हैं। ये नाम सरकार को भेजे गए हैं। मुख्य सचिव को भी पत्र भेजा गया है। अब तक आजाद हिंद फौज से जुड़े 80 स्वतंत्रता सेनानियों के नाम जुटा चुका हूं। यह अभियान जारी है। फिलहाल नेताजी के संघर्ष के भागी रहे चंद बुजुर्ग सिपाही ही जीवित रहे हैं।
आजादी से करीब एक साल पहले घर आए पिता
मेरे पिता राम सिंह एनआईए के सिपाही थे। वे 1942 में आजादी हिंद फौज से जुड़े थे। नेताजी ने उस समय जापान से पकड़े गए जवानों को आजाद कराते हुए देश की आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंका था। वर्ष 1946 में पिता घर लौटे। इस बीच देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ने के साथ अंग्रेजों की यातनाएं भी सही।
285 में से 58 रोहतक, सोनीपत व झज्जर से
प्रदेश के 285 स्वतंत्रता सेनानियों का रिकार्ड ही नहीं है। इनके परिवारों के बारे में कोई नहीं जानता है। इन्हें आजादी 75 वर्ष बाद भी स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा नहीं मिला है। राष्ट्रीय अभिलेखागार विभाग से मिली जानकारी के अनुसार आजाद हिंद फौज के 58 सैनिक अब भी गुमनाम हैं। यह रिकॉर्ड नाम व गांव सहित सरकार को पहुंचा दिया गया है। प्रशासन के पास भी यह रिकार्ड है, मगर दुखद है कि इन सैनिकों के परिवारों को यह जानकारी ही नहीं है। इसलिए इन परिवारों की तलाश की मुहिम शुरू की है।

सीएम विंडो पर 10 बार लगा चुका गुहार
श्रीभगवान ने बताया कि गुमनाम सैनिकों को उनका हक व मान सम्मान दिलाने की मुहिम शुरू की है। इसके तहत 10 बार सीएम विंडो पर गुहार लगा चुका हूं। इसके बावजूद कोई समाधान नहीं हुआ है। सैनिकों के परिवारों को तलाशने व उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिलाने के लिए रोहतक के सीटीएम से भी मुलाकात की गई है। यहां से भी उचित कार्रवाई का ही आश्वासन मिला है।
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