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चंदा एकत्रित कर कराई जा रही एड्स पीड़ितों की शादी, सामाजिक संस्था की मदद से आई गाड़ी पटरी पर

Sat, 20 Apr 2019 03:04 PM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 20 Apr 2019 03:04 PM IST
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ngo helping aids victims marriage by donation in haryana
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

जीने की आस छोड़ चुके एचआईवी संक्रमित कई जोड़ों की जिंदगी में शादी के बाद नई उम्मीद जगी है। परिजनों के साथ-साथ आपसी रजामंदी के बाद अगले माह यानी मई में रोहतक के दो, कैथल और भिवानी के एक-एक जोड़े की शादी तय कर दी गई है। चंदा जुटाकर प्रदेश के एचआईवी पीड़ित जोड़ों की शादी कराने में नेटवर्क फॉर पीपल लिविंग विद एचआईवी नामक संस्था अहम भूमिका निभा रही है।

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हाल में शादी करने वाले पानीपत के एचआईवी पीड़ित दंपती ने बताया कि वे अब अन्य पीड़ितों को भी जागरूक कर रहे हैं। उनका मानना है कि एचआईवी से संक्रमित होने का मतलब जीवन समाप्त होना नहीं है। एचआईवी पीड़ित भी आम लोगों की तरह जिंदगी जी सकता है।
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इसी तरह तीन माह पूर्व शादी करने वाले रोहतक के एचआईवी पीड़ित दंपती का कहना है कि शादी के बाद से उनके जिदंगी चल पड़ी है। अब उन्हें पहले जैसी दिक्कत फिलहाल नहीं है। दोनों जोड़े नेटवर्क फॉर पीपल लीविंग वीद एचआईवी संस्था से जुड़े हैं।
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संस्था के सचिव ने बताया कि इस बीमारी का पता लगने के बाद कई लोग जीने की उम्मीद छोड़ देते हैं, मगर उनका संगठन ऐसे लोगों को जीने का जज्बा देता है। करीब छह माह से आर्थिक मदद देने के साथ-साथ ऐसे युगल की शादी कराई जा रही है। रोहतक के अलावा कैथल, सोनीपत, पानीपत, फतेहाबाद, भिवानी, कुरुक्षेत्र, चरखी दादरी और हिसार में काउंसलिंग के बाद विवाह का आयोजन होता है।

उनका दावा है कि पिछले छह माह में 60 एचआईवी पीड़ितों की शादी करवाई जा चुकी है। उनका दावा है कि प्रदेश में एचआईवी पीड़ितों की संख्या 20 हजार से अधिक है।

एचआईवी पीड़ित दंपती की कराई जाती है काउंसलिंग
एआरटी विभाग के सूत्रों के अनुसार एचआईवी पीड़ित दंपती की काउंसिलिंग कराई जाती है। यदि पहले से ही दोनों की दवाई चल रही होती है तो बच्चे को एचआईवी की चपेट में आने का खतरा बहुत कम होता है। गर्भ ठहरने के तीन माह बाद नेवरा पाइन और अन्य दवाइयां दी जाती हैं। इसके कारण 99 प्रतिशत बच्चे एचआईवी की चपेट में नहीं आते हैं।


एचआईवी पीड़ित महिला को सरकारी अस्पताल में ही डिलिवरी करानी चाहिए, ताकि दवाई देकर उसके होने वाले बच्चे को एचआईवी से संक्रमित होने से बचाया जा सके।
- डा. वीके कत्याल, एचओडी, मेडिसिन विभाग

क्यों जानलेवा होता है एड्स
एचआईवी संक्रमित ज्यादातर मरीज 10 साल के अंदर एड्स की चपेट में आ जाते हैं। प्रतिरोधक तंत्र नाजुक होते ही ऐसे लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी माना है।

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