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चित्र भारती फिल्म फेस्टिवल में छाई सुपवा के विद्यार्थियों की फिल्में चिड़िबाज और वेट

Thu, 27 Feb 2020 02:30 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Thu, 27 Feb 2020 02:30 AM IST
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movie Chidibad and weight of students of Supva at Chitra Bharti Film Festival
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अहमदाबाद में तीन दिन आयोजित हुए चित्र भारती फिल्म फेस्टिवल में सुपवा के विद्यार्थियों की फिल्में छाई। पास आउट विद्यार्थी प्रिंस मेरठिया की फिल्म चिड़िबाज को यहां बेस्ट फिल्म अवॉर्ड और 50 हजार रुपये कैश प्राइज से नवाजा गया। वहीं छात्र बिभांशु की 20 मिनट की डॉक्यूमेंट्री फिल्म वेट का सेकेंड बेेस्ट फिल्म अवॉर्ड और 25 हजार रुपये प्राइज मिला। इसके अलावा चिड़िबाज फिल्म में मानव को कुंडला के किरदार के लिए बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड से नवाजा गया। चिड़िबाज फिल्म की शूटिंग झज्जर के मातनहेल गांव में हुई है और वेट की शूटिंग रोहतक में हरिओम सेवा दल एनजीओ में शूट की गई थी। 21 से 23 फरवरी तक चले इस फिल्म फेस्टिवल में 400 फिल्मों के बीच दोनों छात्रों ने सुपवा का रूतबा बढ़ाया।
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फिल्म चिड़िबाज
डायरेक्टर प्रिंस मेरठिया
एक्टर मानव, जीवन, शशिकांत दहिया
साउंड सूचि सेन
कैमरामैन सौरभ पांडा
यूनिट मैनेजर सचिन हाडा
कहानी : चिड़िबाज फिल्म में जंगल की कहानी को दिखाया है। दो आदिवासी दोस्तों कुंडला और बथूआ का बसेरा जंगल है। जहां एक दिन खबर फैलती है कि एक पक्षी के जंगल में आ जाने से नदियों का पानी खराब हो रहा है और लोग मर रहे हैं। पक्षी के प्रति अंधविश्वास फैलता है और लोग दूसरी जगह पलायन करने लगते हैं। तब कुंडला और बथूआ मिलकर पक्षी को मारने का निर्णय लेते हैं। लेकिन पक्षी को मारने के इस सफर में बथूआ की आंख फूट जाती है और वह लौट जाता है। इसके बावजूद कुंडला अकेले ही सफर को तय करके सच्चाई का पता लगाने का प्रयास करता है। लेकिन तब तक आदिवासी बस्ती के सभी लोग दूसरी जगह पलायन कर चुके होते हैं। वास्तविकता ये है कि हम जंगलों का लगातार दोहन कर रहे हैं, जिसकी वजह से प्रकृति को नुकसान पहुंचता है और पानी खराब होता जा रहा है। बथूआ सभी को संदेश देता है कि किसी पक्षी का कोई अंधविश्वास हमें नहीं मारता, बल्कि जंगलों को क्षति पहुंचाकर हम खुद को मार रहे हैं।
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फिल्म वेट
डायरेक्टर बिभांशु
एडिटर हितेश दुआ
कैमरा शुभम सैनी
कहानी : फिल्म एनजीओ में रहने वाली महिलाओं पर आधारित है। इसमें बिहार की एक लड़की गुम हो जाती है, जो रेलवे स्टेशन पर पुलिस को मिलती है। लेकिन लड़की के घरवाले उसे अपनाने से इंकार देते हैं और लड़की घर जाना चाहती है। इस दौरान पुलिस लड़की को हरिओम सेवा दल एनजीओ में छोड़ देती है। उसी एनजीओ में एक महिला रहती है, जो घरेलू हिंसा से पीड़ित है। महिला अपने शराबी पति से डरती है और घर नहीं जाना चाहती। यह शार्ट डॉक्यूमेंट्री फिल्म दोनों ही पीड़ित महिलाओं की दशा और स्थिति को दर्शाती है।

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