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Rohtak News: 'कब तक सहूं' ने दिखाया जातीय, महिला व आर्थिक शोषण का संघर्ष
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22सीटीके11....कार्यक्रम में संबोधित करती जगमति सांगवान। स्रोत: स्वयं
रोहतक। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह सोमेश का नवीनतम उपन्यास ''कब तक सहूं'' सामाजिक कुरीतियों, विशेष रूप से जातीय, महिला और आर्थिक शोषण के खिलाफ संघर्ष की कहानी बयां करता है। ''सप्तरंग'' के तत्वाधान में इस उपन्यास पर चर्चा हुई। इसमें एक ओर वर्तमान समाज में जातीय जकड़न बरकरार है तो दूसरी ओर इसके विरुद्ध संघर्ष न केवल तेजी पकड़ रहा है, बल्कि सफल भी हो रहा है। चर्चा में शामिल लोगों ने उपन्यास को सराहते हुए कहा कि यह समाज के यथार्थ को उजागर करता है। प्रेरक संदेश देता है। कार्यक्रम के शुरू में लेखक राजेंद्र सिंह ने उपन्यास के कथानक, उसकी रचना प्रक्रिया, घटनाओं की जानकारी दी।
लेखक राजेंद्र सिंह ने बताया कि उपन्यास ऐसी सच्ची घटनाओं से प्रेरित है। इनसे सामाजिक भेदभाव, जातीय उत्पीड़न, कमजोर तबके की महिलाओं के बारे में समाज की सोच, भेदभावपूर्ण रीति रिवाज और प्रथाओं का पता चलता है। साक्षरता अभियान के दौरान उन्होंने स्वयं गरीब महिला-पुरुषों पर होने वाले प्रत्यक्ष व परोक्ष अत्याचारों, इन तबकों की बेबसी, उनके भीतर चल रही उथल-पुथल, उनके संघर्षों, उनकी इच्छाओं-आकांक्षाओं को करीब से देखा व महसूस किया। उसी को उन्होंने उपन्यास के खाके में पिरोने का प्रयास किया है।
पीजीआई रोहतक के सेवानिवृत्त प्रोफेसर व लेखक डॉ. रणबीर दहिया ने कहा कि महिलाओं के उत्पीड़न के प्रति रोष और उनके संघर्ष के प्रति सम्मान की भावना छुपी नहीं है, परंतु ''कब तक सहूं'' केवल उपदेशात्मक नहीं है। इसमें प्रवाह की रवानगी है। उसका कथानक पाठक को बांधे रखता है। जनवादी महिला समिति से डॉ. जगमति सांगवान ने कहा कि लेखक ने समाज के उस सच को पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है, जिसे आमतौर पर देखा-समझा नहीं जाता। यह उपन्यास मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने में सफल रहा।
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ज्ञान विज्ञान समिति से प्रो. प्रमोद गौरी ने कहा कि उपन्यास न्याय, सामाजिक भूमिका में अवरोध, मारपीट, बलात्कार, छेड़खानी, एक खास वर्ग के नाम, पहनावे, काम, शिक्षा आदि को लेकर लोगों के व्यवहार को उपन्यास में प्रमुखता से उठाया गया है। उपन्यास में न्याय के लिए संघर्ष व प्रतिरोध की चेतना साफ दिखाई देती है। इस मौके पर सप्तरंग के अध्यक्ष राजेंद्र चौधरी, जाट कालेज के पूर्व प्राध्यापक डॉ. रमणीक मोहन, सप्तरंग सचिव अविनाश, प्रो. भगत सिंह, आकाश, सुधीर, जितेंद्र खत्री, प्रीति, लाभसिंह हुड्डा, निशा मौजूद रही।
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लेखक राजेंद्र सिंह ने बताया कि उपन्यास ऐसी सच्ची घटनाओं से प्रेरित है। इनसे सामाजिक भेदभाव, जातीय उत्पीड़न, कमजोर तबके की महिलाओं के बारे में समाज की सोच, भेदभावपूर्ण रीति रिवाज और प्रथाओं का पता चलता है। साक्षरता अभियान के दौरान उन्होंने स्वयं गरीब महिला-पुरुषों पर होने वाले प्रत्यक्ष व परोक्ष अत्याचारों, इन तबकों की बेबसी, उनके भीतर चल रही उथल-पुथल, उनके संघर्षों, उनकी इच्छाओं-आकांक्षाओं को करीब से देखा व महसूस किया। उसी को उन्होंने उपन्यास के खाके में पिरोने का प्रयास किया है।
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पीजीआई रोहतक के सेवानिवृत्त प्रोफेसर व लेखक डॉ. रणबीर दहिया ने कहा कि महिलाओं के उत्पीड़न के प्रति रोष और उनके संघर्ष के प्रति सम्मान की भावना छुपी नहीं है, परंतु ''कब तक सहूं'' केवल उपदेशात्मक नहीं है। इसमें प्रवाह की रवानगी है। उसका कथानक पाठक को बांधे रखता है। जनवादी महिला समिति से डॉ. जगमति सांगवान ने कहा कि लेखक ने समाज के उस सच को पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है, जिसे आमतौर पर देखा-समझा नहीं जाता। यह उपन्यास मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने में सफल रहा।
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ज्ञान विज्ञान समिति से प्रो. प्रमोद गौरी ने कहा कि उपन्यास न्याय, सामाजिक भूमिका में अवरोध, मारपीट, बलात्कार, छेड़खानी, एक खास वर्ग के नाम, पहनावे, काम, शिक्षा आदि को लेकर लोगों के व्यवहार को उपन्यास में प्रमुखता से उठाया गया है। उपन्यास में न्याय के लिए संघर्ष व प्रतिरोध की चेतना साफ दिखाई देती है। इस मौके पर सप्तरंग के अध्यक्ष राजेंद्र चौधरी, जाट कालेज के पूर्व प्राध्यापक डॉ. रमणीक मोहन, सप्तरंग सचिव अविनाश, प्रो. भगत सिंह, आकाश, सुधीर, जितेंद्र खत्री, प्रीति, लाभसिंह हुड्डा, निशा मौजूद रही।