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वचन देता हूं, फिर बचाऊंगा तुम्हें अपनी जान देकर, मजदूर था, शायद इसीलिए मजबूर था... से दर्शाए मजदूर और डॉक्टर के हालात

Wed, 01 Apr 2020 10:27 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Wed, 01 Apr 2020 10:27 PM IST
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I promise, I will save you by giving up my life, I was a laborer, probably forcing
कोरोना वायरस को लेकर अब पूरा देश सतर्क है। सब अपने-अपने अंदाज में एक-दूसरे का मनोबल बढ़ा रहे हैं। इसी बीच शहर के कुछ ख्याति प्राप्त कवियों ने अपने-अपने अंदाज में लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए कोरोना को लेकर लिखी रचनाएं व्हाट्सएप और फेसबुक पर शेयर की हैं। हास्य कवियों ने चुटीले अंदाज में कविताओं के जरिये आज के परिवेश को जीवंत किया है। जबकि कुछ ने काव्यात्मक अंदाज में अपनी रचनाओं के जरिये इस महामारी की विभीषिका से बचने की सलाह दी है।
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कोरोना से जिंदगी को मात न मिले.... कैसी ये बेबसी, कैसे है सिलसिले, अपने ही चाह रहे है कि आपस में न मिलें, हर कोई मांग रहा खैरियत जहान की, उठ रहे हाथ दुआ में, पर हाथ न मिलें, जो सोचते थे कि दुनिया हम चला रहे, आज उनकी अर्थी को भी साथ न मिले, अब भी मौका है संभल जाओ यारो, दुआ करो फिर कभी ये हालात न मिले, कर रहा है कौशिक यही दुआ रब से, कोरोना से किसी जिंदगी को मात न मिले।
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- डॉ. कपिल कौशिक
वचन देता हूं, फिर बचाऊंगा तुम्हें अपनी जान देकर, देखो घर भी नहीं गया मैं और सोया भी नहीं हूं, हिम्मत में हूं अभी, मौत देखकर रोया भी नहीं हूं, कोहराम मचा है, वक्त नहीं है, हालात नहीं हैं, लगा हुआ हूं दिन-रात तुम्हारी बीमारी से जूूझने, लेकिन कोई नहीं आता है मुझसे मेरे हाल पूछने। मैं नहीं डरता तुम्हारी मौत छूने से, तुम्हें बचाने से सुना है तुम हमें निकाल रहे हो अपने आशियाने से। कोई बात नहीं, निकाल दो, पर ये याद रखना मैं वहीं मिलूंगा हंसता हुआ, प्लास्टिक का कोट पहने, तुम आओगे अपनी आंखों में उम्मीद और आंसू लेकर, वचन देता हूं, फिर बचाऊंगा तुम्हें अपनी जान देकर, वचन देता हूं, फिर बचाऊंगा तुम्हें अपनी जान देकर।
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- सचिन अहलावत, आईआरएस, असिस्टेंट कमिश्नर।
इतना मजबूर था... वो चला, वो चला, अपने घर को चला जाना भी दूर था, वो अपने हालात से कितना मजबूर था, थोड़ा रुका, फिर चला, हौसला ना उसका पस्त था, लंबा सफर था, ना ही कोई बंदोबस्त था, खाना खाया, नहीं खाया सिलसिला ये गमों का बदस्तूर था। झोला ही उसका हम साया, वही उसका गुरुर था ना घर था, ना पैसा, बस पैदल चलना ही उसका सुरूर था, मिलों चला, चलता ही रहा, चलना ही उसका सुरूर था, वो देखो, वो चला, जो मेरे देश का मजदूर था, मजदूर था, शायद इसीलिए वो इतना मजबूर था।

- कृष्ण नाटक
इंसान तू हारेगा, इंसान तूने परमाणु बनाए, एक दूसरे को मारने के लिए। आज बचता फिर रहा है, खुद को ही बचाने के लिए। बड़े-बड़े देशों की अर्थव्यवस्था हिला दी, एक ना दिखने वाले अणु ने, सबको सबकी औकात दिखा दी, अब भी संभल जा ए मूर्ख, वरना तेरा ही कर्म तुझे एक दिन मारेगा, कोरोना तो सिर्फ एक इशारा है, कुदरत से जंग होगी तो इंसान तू हारेगा॥
संदीप कुमार, डायरेक्टर, हरियाणा फिल्म ऐंड एलबम इंडस्ट्री
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