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#हिंदीहैंहमः हिंदी को देश में ही नहीं, विदेशों में भी मिलने लगा सम्मान, विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने लगी
Mon, 17 Aug 2020 02:20 PM IST
रोहतक ब्यूरो
अमर उजाला, रोहतक
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Published by: रोहतक ब्यूरो
Updated Mon, 17 Aug 2020 02:20 PM IST
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हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
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हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, पहचान भी है। हम अपने दैनिक जीवन का संवाद इसी भाषा में करते हैं। कामकाज और व्यापार भी इसी भाषा में होता है। ऐसे में मातृभाषा का महत्व और बढ़ जाता है। देश की आजादी के 70 साल से ऊपर बीतने के बाद भी हम अपनी मातृभाषा को स्वरूप नहीं दे पाए हैं। जबकि विदेशों में हिंदी पढ़ाई जाने लगी हैं।
वहां के विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग तक बना दिए गए हैं। हमें भी इस ओर सकारात्मक कदम उठाते हुए ध्यान देना चाहिए। अमर उजाला ने हिंदी हैं हम, अभियान के तहत हिंदी को बढ़ावा देने के लिए बुद्धिजीवियों से बातचीत की तो यह सब पता चला। बुद्धिजीवियों ने देश में हिंदी को मान सम्मान दिलाने जाने का पुरजोर समर्थन किया।
हिंदी को मिले मातृभाषा का दर्जा
अपनी मातृभाषा होनी चाहिए। हिंदी को यह दर्जा मिलना चाहिए। देश के ज्यादातर हिस्से में हिंदी का प्रचलन है। हिंदी व्यवहारिक बोलचाल के साथ व्यवसायिक व कामकाजी भाषा के रूप में भी प्रयोग हो रही है। यही भाषा हमारी वाहक है। विचारों का आदान-प्रदान हम इसी भाषा में करते हैं। यह बेहद सहज व सरल भी है। इसमें अपनी बात कहना या समझना-समझाना भी आसान है।
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यूपीएससी सरीखी परीक्षाएं हिंदी में होनी चाहिए। लिटरेचर हों, जिससे हिंदी भाषा को प्रोत्साहन मिलेगा। अनिवार्य विषय के रूप में इसे पढ़ाया जाए। दूसरे देशों में भी हिंदी पढ़ाई जाने लगी है। यह गर्व की बात है। विदेशी विवि में हिंदी विभाग तक बन गए हैं। जबकि हम देश की आजादी के 70 साल से ज्यादा बीतने के बाद भी मातृभाषा को स्वरूप नहीं दे पाए हैं। इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
- डॉ. एलएन दहिया, पूर्व कुलपति, एमडीयू
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वहां के विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग तक बना दिए गए हैं। हमें भी इस ओर सकारात्मक कदम उठाते हुए ध्यान देना चाहिए। अमर उजाला ने हिंदी हैं हम, अभियान के तहत हिंदी को बढ़ावा देने के लिए बुद्धिजीवियों से बातचीत की तो यह सब पता चला। बुद्धिजीवियों ने देश में हिंदी को मान सम्मान दिलाने जाने का पुरजोर समर्थन किया।
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हिंदी को मिले मातृभाषा का दर्जा
अपनी मातृभाषा होनी चाहिए। हिंदी को यह दर्जा मिलना चाहिए। देश के ज्यादातर हिस्से में हिंदी का प्रचलन है। हिंदी व्यवहारिक बोलचाल के साथ व्यवसायिक व कामकाजी भाषा के रूप में भी प्रयोग हो रही है। यही भाषा हमारी वाहक है। विचारों का आदान-प्रदान हम इसी भाषा में करते हैं। यह बेहद सहज व सरल भी है। इसमें अपनी बात कहना या समझना-समझाना भी आसान है।
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यूपीएससी सरीखी परीक्षाएं हिंदी में होनी चाहिए। लिटरेचर हों, जिससे हिंदी भाषा को प्रोत्साहन मिलेगा। अनिवार्य विषय के रूप में इसे पढ़ाया जाए। दूसरे देशों में भी हिंदी पढ़ाई जाने लगी है। यह गर्व की बात है। विदेशी विवि में हिंदी विभाग तक बन गए हैं। जबकि हम देश की आजादी के 70 साल से ज्यादा बीतने के बाद भी मातृभाषा को स्वरूप नहीं दे पाए हैं। इस ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
- डॉ. एलएन दहिया, पूर्व कुलपति, एमडीयू
मातृभाषा के रूप में हिंदी को आगे बढ़ाने की जरूरत
हिंदी हमारी मातृभाषा है। इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए कार्यालयों में कामकाजी भाषा के रूप में इस्तेमाल किया जाए। दस्तावेजों पर टिप्पणी अंग्रेजी के बजाय हिंदी की जाए। बच्चों को हिंदी के बजाय अंग्रेजी में गिनती समझ आती है। यह व्यवस्था मातृभाषा से भावी पीढ़ी को दूर कर रही है।
इसलिए हिंदी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हिंदी से नई पीढ़ी को रूबरू कराने व उसमें पारंगत बनाने की ओर विशेष प्रावधान करने की जरूरत है। लोगों में अपनी भाषा के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ उन्हें प्रोत्साहित भी करना होगा। फ्रांस व चीन सरीखे देश अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं। वहां अंग्रेजी भाषा जरूरत के आधार पर सीखी व सिखाई जाती है। दूसरे देशों की तरह हमें भी अपनी राष्ट्र भाषा को महत्व देना चाहिए। हमें हिंदी के प्रचार-प्रसार पर ध्यान देना होगा। इसी से हमारी मातृभाषा को पहचान मिलेगी।
- प्रो. भारती शर्मा, पूर्व कुलसचिव, सुपवा
हिंदी के प्रति लोगों में पैदा करनी होगी रुचि
हिंदी को मातृभाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसके लिए दबाव नहीं, बल्कि आमजन की रुचि बढ़ानी होगी। छोटी कक्षा में हिंदी को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। मोबाइल पर संदेश का आदान-प्रदान हिंदी में करें। समूह बना कर लोगों में रुचि बनाने का प्रयास करें। लोगों में रुचि बनाकर राष्ट्र भाषा का तेजी से प्रसार करना संभव है। हिंदी में वाद-विवाद, प्रतियोगिताएं, शब्द पांडित्य किया जाए। ऐसे दूसरे प्रयासों को भी प्रोत्साहन दिया जाए, जिनसे हिंदी को बढ़ावा मिले। अखबार, टीवी, फिल्मों के जरिये सकारात्मक प्रचार किया जाए। फिल्म प्रभावी हो तो हिंदी नहीं जानने वाले भी उसे समझने का प्रयास करते हैं। रोजमर्रा की भाषा में हिंदी के प्रयोग पर जोर देने की जरूरत है। बच्चों में रुचि पैदा करनी होगी। साहित्यकारों, कवियों, लेखकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए शोध करने की जरूरत है।
- डॉ. डीपी गोयल, प्राचार्य, वैश्य महाविद्यालय
इसलिए हिंदी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हिंदी से नई पीढ़ी को रूबरू कराने व उसमें पारंगत बनाने की ओर विशेष प्रावधान करने की जरूरत है। लोगों में अपनी भाषा के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ उन्हें प्रोत्साहित भी करना होगा। फ्रांस व चीन सरीखे देश अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं। वहां अंग्रेजी भाषा जरूरत के आधार पर सीखी व सिखाई जाती है। दूसरे देशों की तरह हमें भी अपनी राष्ट्र भाषा को महत्व देना चाहिए। हमें हिंदी के प्रचार-प्रसार पर ध्यान देना होगा। इसी से हमारी मातृभाषा को पहचान मिलेगी।
- प्रो. भारती शर्मा, पूर्व कुलसचिव, सुपवा
हिंदी के प्रति लोगों में पैदा करनी होगी रुचि
हिंदी को मातृभाषा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसके लिए दबाव नहीं, बल्कि आमजन की रुचि बढ़ानी होगी। छोटी कक्षा में हिंदी को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। मोबाइल पर संदेश का आदान-प्रदान हिंदी में करें। समूह बना कर लोगों में रुचि बनाने का प्रयास करें। लोगों में रुचि बनाकर राष्ट्र भाषा का तेजी से प्रसार करना संभव है। हिंदी में वाद-विवाद, प्रतियोगिताएं, शब्द पांडित्य किया जाए। ऐसे दूसरे प्रयासों को भी प्रोत्साहन दिया जाए, जिनसे हिंदी को बढ़ावा मिले। अखबार, टीवी, फिल्मों के जरिये सकारात्मक प्रचार किया जाए। फिल्म प्रभावी हो तो हिंदी नहीं जानने वाले भी उसे समझने का प्रयास करते हैं। रोजमर्रा की भाषा में हिंदी के प्रयोग पर जोर देने की जरूरत है। बच्चों में रुचि पैदा करनी होगी। साहित्यकारों, कवियों, लेखकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए शोध करने की जरूरत है।
- डॉ. डीपी गोयल, प्राचार्य, वैश्य महाविद्यालय