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‘बंकरों में छिपकर करते थे हनुमान चालीसा का पाठ’
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युक्रेन से लौटा शुभम परिजनों के साथ। विज्ञप्ति
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रोहतक। 24 फरवरी को सुबह से धमाकों की शुरुआत हो गई थी। रुक रुक कर धमाके हो रहे थे। सुबह पांच बजे पहला धमाका हुआ तो हॉस्टल में रहने वाले 86 छात्र दहल गए। कुछ देर बाद दूसरा धमाका हुआ तो दहशत बढ़ गई। छात्र हॉस्टल के नीचे बने बंकरों में छिप गए। कई दिन ऐसा चला। कुछ तो हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे। शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। भारतीय दूतावास के अधिकारियों से संपर्क में रहे और सरकार के प्रयासों से ही आज सुरक्षित वतन वापसी हो गई। शनिवार को जिले के आठ छात्र यूक्रेन से लौटे हैं। इसके साथ ही वहां से लौटने वालों की संख्या 59 हो गई है।
शहर के पुरानी अनाज मंडी के तंबाकू व्यापारी अनिल कुमार अग्रवाल का बेटा शुभम शनिवार को यूक्रेन के ओडेशा शहर से लौटा। अनिल वहां एमबीबीएस चतुर्थ वर्ष का छात्र है। उसने बताया कि रूस और यूक्रेन के बीच तनातनी का माहौल शुरू होते ही उन्हें घबराहट होने लगी थी लेकिन लगा था कि शायद युद्ध के हालात नही बनेंगे। 24 फरवरी की सुबह पांच बजे तेज धमाका हुआ तो दहशत से आंखें खुल गई। कुछ समझ पाते तभी दूसरा धमाका हुआ। रूस के हमले का शोर मच गया। छात्र हॉस्टल के नीचे बंकर में जाकर छिपने लगे। उनके आसपास रहने वाले 86 छात्र बंकरों में छिपे थे। शाम हो गई तो भूख से बुरा हाल हो गया। दिन छिपा तो हिम्मत कर बंकर से निकलकर कुछ छात्र अपने कमरों में गए और जल्दबाजी के मैगी, दाल जो भी घर में था उसे बनाकर बंकर में लाकर खाया। भारतीय दूतावास के अधिकारी छात्रों के संपर्क में थे। हम पांच भारतीय छात्र जिसमें दो एमपी, दो दिल्ली के भी थे। एक बस करके रोमानिया के बॉर्डर के गांव मल्दोबा तक गए। भारतीय दूतावास ने वहां से रोमानिया में प्रवेश के लिए पहले ही बात कर ली थी। इसलिए उन्हें रोमानिया में अपने पासपोर्ट आदि कागजात चेक करने के बाद बतौर शरणार्थी प्रवेश मिला। दो दिन तक रेडक्रॉस सोसायटी के कैंप में रहे। दूतावास ने उनके टिकट कराए और शुक्रवार रात को वे सरकार के विशेष विमान से दिल्ली एयरपोर्ट लौटे। परिवार के लोग वहां उसे लेने गए। शहर निवासी दिनेश कुमार की बेटी सिमरन भी यूक्रेन से अपने घर पहुंची। परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था। इसके अलावा लौटने वालों में अरविंद, परमजीत, गौरव धीरज, रीतू और अक्षयदीप शामिल हैं।
खाने पीने का समान लेने के लिए भी दो घंटे में आया नंबर
महम के भैणी सूरजण निवासी अजीत सिंह का बेटा गौरव भी शनिवार को खारकी से लौटा। गौरव वहां एमबीबीएस के तीसरे साल का छात्र था। गौरव ने बताया कि 24 फरवरी को धमाके शुरू होते ही बाजार से लोग खाने पीने का सामान खरीदने लगे। वो भी बाजार गया तो इतनी लंबी भीड़ थी कि दो घंटे से अधिक समय में नंबर आया। उसने सब्जी, दाल, चावल, फल आदि सामान खरीदा लेकिन जरूरत से कम मिला। धमाकों की आवाज बढ़ती गई तो युद्ध के डर से बंकर में छिप गए। बंकर में नेटवर्क नहीं मिल रहे थे तो परिजनों से बातचीत में भी दिक्कत आई। किसी तरह बाहर आकर बात की। दूतावास के अधिकारियों ने संपर्क बनाए रखा। दूतावास के अधिकारियों ने कहा कि वे किसी तरह यूक्रेन के पड़ोसी देश पोलैंड, हंगरी या रोमानिया के बॉर्डर पर पहुंच जाए। वहां की सरकार से दूतावास की बात हो चुकी थी। वो कुछ छात्रों के साथ किसी तरह पोलैंड के बॉर्डर के गांव पहुंचे और वहां पोलैंड में पासपोर्ट के आधार पर उन्हें प्रवेश मिल गया। वहां दो दिन दूतावास ने एक होटल में रहने की व्यवस्था की। शुक्रवार रात को वे विमान से चले और शनिवार सुबह दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे और इसके बाद परिजन गांव में लाए।
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युद्ध की आहट होते ही कर ली थी पैकिंग
वापस लौटे मेडिकल छात्रों ने बताया कि यूक्रेन में हजारों भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। रूस के हमले का पता चलते ही सभी अलर्ट हो गए थे और उन्होंने अपना सामान भी समेटना शुरू कर दिया था। अपनी पढ़ाई के कागजात, पासपोर्ट और प्रमाण पत्रों को पैक करके एक जगह रख लिया था। सामान भी पैक करना शुरू कर दिया था। उन्हें लगा था कि कभी भी देश छोड़ना पड़ सकता है, लेकिन रूस के हमले बढ़ते रहे और माहौल ऐसा बना कि वे केवल अपने कागजी दस्तावेज और मुख्य किताबें लेकर ही देश लौटे, बाकी सामान वहीं रह गया।
शाकाहारी छात्रों को आई परेशानी
वापस लौटे छात्रों ने बताया कि यूक्रेन में अधिकांश लोग मांसाहारी हैं। युद्ध के माहौल में बाजार में उन्हें फल सब्जी आदि समान नहीं मिला। वहां के लोग तो मांसाहार लेते रहे लेकिन फल आदि भी कम थे। महंगे भी हो गए थे। उन्होंने वही फल आदि खाकर गुजरा किया। शाकाहारी होने की वजह से उन्हें परेशानी आई। पर शुक्र है कि सरकार के प्रयासों से उनकी घर वापसी हुई।
वर्जन
यूक्रेन में जिले के 101 छात्रों की सूचना अब तक है। शनिवार को जिले के आठ छात्र लौटें है। अब तक कुल 59 की वापसी हो चुकी है। बाकी को लाने के भी सरकारी स्तर से प्रयास चल रहे हैं। संभावना है कि ये भी जल्द आएंगे।
- राकेश कुमार एसडीएम
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शहर के पुरानी अनाज मंडी के तंबाकू व्यापारी अनिल कुमार अग्रवाल का बेटा शुभम शनिवार को यूक्रेन के ओडेशा शहर से लौटा। अनिल वहां एमबीबीएस चतुर्थ वर्ष का छात्र है। उसने बताया कि रूस और यूक्रेन के बीच तनातनी का माहौल शुरू होते ही उन्हें घबराहट होने लगी थी लेकिन लगा था कि शायद युद्ध के हालात नही बनेंगे। 24 फरवरी की सुबह पांच बजे तेज धमाका हुआ तो दहशत से आंखें खुल गई। कुछ समझ पाते तभी दूसरा धमाका हुआ। रूस के हमले का शोर मच गया। छात्र हॉस्टल के नीचे बंकर में जाकर छिपने लगे। उनके आसपास रहने वाले 86 छात्र बंकरों में छिपे थे। शाम हो गई तो भूख से बुरा हाल हो गया। दिन छिपा तो हिम्मत कर बंकर से निकलकर कुछ छात्र अपने कमरों में गए और जल्दबाजी के मैगी, दाल जो भी घर में था उसे बनाकर बंकर में लाकर खाया। भारतीय दूतावास के अधिकारी छात्रों के संपर्क में थे। हम पांच भारतीय छात्र जिसमें दो एमपी, दो दिल्ली के भी थे। एक बस करके रोमानिया के बॉर्डर के गांव मल्दोबा तक गए। भारतीय दूतावास ने वहां से रोमानिया में प्रवेश के लिए पहले ही बात कर ली थी। इसलिए उन्हें रोमानिया में अपने पासपोर्ट आदि कागजात चेक करने के बाद बतौर शरणार्थी प्रवेश मिला। दो दिन तक रेडक्रॉस सोसायटी के कैंप में रहे। दूतावास ने उनके टिकट कराए और शुक्रवार रात को वे सरकार के विशेष विमान से दिल्ली एयरपोर्ट लौटे। परिवार के लोग वहां उसे लेने गए। शहर निवासी दिनेश कुमार की बेटी सिमरन भी यूक्रेन से अपने घर पहुंची। परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं था। इसके अलावा लौटने वालों में अरविंद, परमजीत, गौरव धीरज, रीतू और अक्षयदीप शामिल हैं।
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खाने पीने का समान लेने के लिए भी दो घंटे में आया नंबर
महम के भैणी सूरजण निवासी अजीत सिंह का बेटा गौरव भी शनिवार को खारकी से लौटा। गौरव वहां एमबीबीएस के तीसरे साल का छात्र था। गौरव ने बताया कि 24 फरवरी को धमाके शुरू होते ही बाजार से लोग खाने पीने का सामान खरीदने लगे। वो भी बाजार गया तो इतनी लंबी भीड़ थी कि दो घंटे से अधिक समय में नंबर आया। उसने सब्जी, दाल, चावल, फल आदि सामान खरीदा लेकिन जरूरत से कम मिला। धमाकों की आवाज बढ़ती गई तो युद्ध के डर से बंकर में छिप गए। बंकर में नेटवर्क नहीं मिल रहे थे तो परिजनों से बातचीत में भी दिक्कत आई। किसी तरह बाहर आकर बात की। दूतावास के अधिकारियों ने संपर्क बनाए रखा। दूतावास के अधिकारियों ने कहा कि वे किसी तरह यूक्रेन के पड़ोसी देश पोलैंड, हंगरी या रोमानिया के बॉर्डर पर पहुंच जाए। वहां की सरकार से दूतावास की बात हो चुकी थी। वो कुछ छात्रों के साथ किसी तरह पोलैंड के बॉर्डर के गांव पहुंचे और वहां पोलैंड में पासपोर्ट के आधार पर उन्हें प्रवेश मिल गया। वहां दो दिन दूतावास ने एक होटल में रहने की व्यवस्था की। शुक्रवार रात को वे विमान से चले और शनिवार सुबह दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे और इसके बाद परिजन गांव में लाए।
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युद्ध की आहट होते ही कर ली थी पैकिंग
वापस लौटे मेडिकल छात्रों ने बताया कि यूक्रेन में हजारों भारतीय छात्र मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। रूस के हमले का पता चलते ही सभी अलर्ट हो गए थे और उन्होंने अपना सामान भी समेटना शुरू कर दिया था। अपनी पढ़ाई के कागजात, पासपोर्ट और प्रमाण पत्रों को पैक करके एक जगह रख लिया था। सामान भी पैक करना शुरू कर दिया था। उन्हें लगा था कि कभी भी देश छोड़ना पड़ सकता है, लेकिन रूस के हमले बढ़ते रहे और माहौल ऐसा बना कि वे केवल अपने कागजी दस्तावेज और मुख्य किताबें लेकर ही देश लौटे, बाकी सामान वहीं रह गया।
शाकाहारी छात्रों को आई परेशानी
वापस लौटे छात्रों ने बताया कि यूक्रेन में अधिकांश लोग मांसाहारी हैं। युद्ध के माहौल में बाजार में उन्हें फल सब्जी आदि समान नहीं मिला। वहां के लोग तो मांसाहार लेते रहे लेकिन फल आदि भी कम थे। महंगे भी हो गए थे। उन्होंने वही फल आदि खाकर गुजरा किया। शाकाहारी होने की वजह से उन्हें परेशानी आई। पर शुक्र है कि सरकार के प्रयासों से उनकी घर वापसी हुई।
वर्जन
यूक्रेन में जिले के 101 छात्रों की सूचना अब तक है। शनिवार को जिले के आठ छात्र लौटें है। अब तक कुल 59 की वापसी हो चुकी है। बाकी को लाने के भी सरकारी स्तर से प्रयास चल रहे हैं। संभावना है कि ये भी जल्द आएंगे।
- राकेश कुमार एसडीएम