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संस्मरण: महाभारत के 'युधिष्ठिर' ने बताया- भीम की तलाश कर रहे चोपड़ा सर प्रवीण को देखते ही बोले- ये तो मेरा भीम है..

Wed, 09 Feb 2022 02:38 AM IST
भूपेंद्र सिंह विकास सैनी, अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा)
विकास सैनी, अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Wed, 09 Feb 2022 02:38 AM IST
सार

महाभारत के युधिष्ठिर एवं सुपवा के कुलपति गजेंद्र चौहान ने सहकर्मी एवं भाई प्रवीण कुमार के संस्मरण अमर उजाला के साथ साझा किए।

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Gajendra Chauhan shared the memories of colleague Praveen Kumar
गजेंद्र चौहान (युधिष्ठिर) और महाभारत का दृश्य - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भीम कहूं या प्रवीण कुमार मेरे लिए दोनों एक ही है। उम्र में वह मुझसे बडे़ थे। महाभारत में मेरे छोटे भाई का किरदार निभाया था। वैसा ही सम्मान मुझे देते थे। हमारा 34 साल का रिश्ता था। नकुल (समीर चित्रे) के बाद एक और भाई चला गया। अब तीन रह गए। यह भावुक शब्द महाभारत के युधिष्ठिर एवं सुपवा के कुलपति गजेंद्र चौहान केहैं। वह धारावाहिक महाभारत के अपने अनुज भीम से जुड़ी यादें अमर उजाला से साझा कीं।

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उन्होंने कहा कि वह दिन आज भी याद है। बात उन दिनों की है जब महाभारत बनाने के लिए पात्र चुने जा रहे थे। भीम का किरदार पुनीत इसर को दिया जा रहा था। उन्होंने दुर्योधन का किरदार करने की बात कहते हुए भीम के रोल से मना कर दिया। इसके बाद बलराम का किरदार निभाने वाले सागर सालुके को यह रोल देने की बात चल रही थी।
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इसी दौरान पंजाब का एक हट्टा कट्टा नौजवान चोपड़ा साहब से मिलने उनके ऑफिस में आया था। मैं और चोपड़ा साहब ऑफिस में बैठे थे। प्रवीण कुमार को देखते ही चोपड़ा सर एकदम बोले, यह तो मेरा भीम है.. न डायलॉग, न ऑडिशन। सीधे उन्हें भीम का रोल ऑफर कर दिया। इसके बाद प्रवीण ने भी अपने काम, स्वभाव व मेहनत से उनका ही नहीं, पूरे देश का दिल जीत लिया। 

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Gajendra Chauhan shared the memories of colleague Praveen Kumar
प्रवीण कुमार सोबती - फोटो : twitter

ठेठ पंजाबी व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रहे हैं प्रवीण 

कुलपति ने कहा कि प्रवीण ठेठ (टिपिकल) पंजाबी होने के चलते अक्सर पंजाबी में ही बातचीत करते थे। वह अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रहे हैं। कॉमनवेल्थ व एडियाड में मेडल जीतने के अलावा ओलंपिक में भी देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। खेलों में उनके बेहतर प्रदर्शन के चलते उन्हें अर्जुन अवार्ड भी दिया गया। दिल्ली के खेल गांव में एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया। इसे लेकर मैं और अर्जुन अक्सर मजाक करते थे कि सड़क का नाम तो मरने के बाद रखा जाता है। यहां तो जिंदा आदमी के नाम ही रख दिया है। इस पर प्रवीण हंस कहते, कोई नी सरकार दी मर्जी। 

28 दिसंबर को हुई थी आखिरी बार बातचीत 

प्रवीण कुमार से मेरी आखिरी बार बातचीत 28 दिसंबर को हुई थी। उस दिन प्रवीण का फोन आया था। उन्हें किसी का मोबाइल नंबर चाहिए था। तब उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा था। उस समय उन्होंने कहा कि सब ठीक है। इसके बाद बातचीत नहीं हुई। मंगलवार सुबह हमेशा के लिए बिछड़ने की खबर आई तो घर संपर्क किया, मगर किसी से बात नहीं हो सकी।

उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। उनका निभाया किरदार अविस्मरणीय है। जिस तरह रामायण में हनुमानजी के किरदार के लिए दारा सिंह को नहीं भुलाया जा सकता, उसकी तरह भीम के किरदार के लिए प्रवीण कुमार को नहीं भुलाया जा सकता है। 

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