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यूक्रेन संकट: हरियाणा सरकार के हेल्पलाइन पर मिल रहा जवाब- ‘हम कोशिश कर रहे हैं, वरिष्ठों से भी बात कर रहे हैं’

Mon, 28 Feb 2022 12:23 AM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, रोहतक (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Mon, 28 Feb 2022 12:23 AM IST
सार

प्रदेश सरकार के हेल्पलाइन नंबर से यूक्रेन में फंसे युवाओं के परिजन फोन कर रहे हैं। युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है, बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता हो रही है। 

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Families of children trapped in Ukraine are seeking help on the helpline numbers of the Haryana government
ओमैक्स सिटी में आशुतोष के माता-पिता, छात्र आशुतोष। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

हरियाणा सरकार ने हेल्पलाइन नंबर तो चालू कर दिया है, लेकिन वहां रटारटाया जवाब ‘हम कोशिश कर रहे हैं, वरिष्ठों से भी बात कर रहे हैं’ ही मिलता है। युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है, बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता हो रही है। यह दर्द यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा के लिए गए विद्यार्थियों के हर परिजन का है। हर पल सांसें थमी रहती हैं कि उनके घर के चिराग की क्या दशा होगी। 

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ओमैक्स सिटी में रह रहे सत्यवान और उनकी पत्नी अपने बेटे आशुतोष की सुरक्षा को लेकर परेशान हैं। सत्यवान ने बताया कि उनका बेटा आशुतोष डेनीप्रो में एमबीबीएस की शिक्षा ले रहा है। पत्नी किडनी की मरीज है, लेकिन रो-रोकर बुरा हाल है। रिश्तेदारों के फोन आते हैं कि सरकार बच्चों को ला रही है, वह क्यों नहीं बुला रहे अपने बेटे को।
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अब उन्हें कौन बताए कि हमारे रास्ते बंद हो गए हैं। सिर्फ फोन पर बात करने के अलावा कुछ भी हाथ में नहीं है। वहीं आशुतोष ने बताया कि प्रदेश के सभी विद्यार्थी यहां एक साथ हॉस्टल में हैं। हमारे पास भारत आने का रास्ता नहीं है।
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पोलैंड व हंगरी तक जाना संभव नहीं हो रहा है। बॉर्डर पर बुरा हाल है, कोई मदद नहीं मिल रही है। जो बॉर्डर तक पहुंच गए हैं, उन्हें भी सुविधा नहीं मिल रही है। हॉस्टल में अभी सुरक्षित हैं, आगे का पता नहीं है। यदि युद्ध लंबा चलता है तो समस्या होना तय है। सायरन बजते ही दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं। 


सीमा पर अमानवीय व्यवहार हो रहा विद्यार्थियों के साथ
यूक्रेन से निकलने का प्रयास कर रही एक छात्रा ने अमर उजाला को फोन पर बताया कि सीमा पर पुलिस भी अमानवीय व्यवहार कर रही है। लड़कों को बुरी तरह पीटा जा रहा है। माइनस पांच डिग्री तापमान में बाहर खडे़ रहने को मजबूर हैं। न खाने को है और न ही पीने को। घंटों का सफर करने के बाद भी राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। हमारी सरकार भी कुछ नहीं कर रही है, परिवार वाले सिवाय परेशान होने के क्या कर सकते हैं। दूतावास भी मदद नहीं कर रहा है। सिर्फ यही कहा जा रहा है कि जहां हो, वहीं रहो। 

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