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Rohtak News: पचास साल बाद भी ताजा हैं आपातकाल की यातनाएं..
Wed, 25 Jun 2025 01:08 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
Updated Wed, 25 Jun 2025 01:08 AM IST
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भाजपा के प्रदेश कार्यालय सचिव गुलशन भाटिया
रोहतक। आपातकाल...एक शब्द नहीं है, यह पूरी कहानी है। इसमें दर्द, त्याग व यातनाएं भरी हुई हैं। इन बातों को 50 साल हो गए हैं। वह 1975 का काला अध्याय था। इसके बाद 19 माह तक अनगिनत यातनाएं सहनी पड़ीं। अब भी सबकुछ ताजा है। उन दिनों टीवी, अखबार व मीडिया के अन्य साधनों पर पूर्व प्रतिबंध था। इसके बावजूद छिप-छिपकर समाचार पत्र तैयार करते।
साइकोस्टाइल से बड़ी मुश्किल से समाचार पत्र तैयार होता था। इसे अगले दिन प्रदेश व साथ लगे राज्यों तक पहुंचाना सबसे मुश्किल काम था। पकड़े जाते तो सीधे जेल जाना पड़ता था। पुलिस की पिटाई अलग सहनी होती। यह कहना है लोकतंत्र सेनानी संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश कत्याल का। आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर अमर उजाला से हुई बातचीत में उन्होंने अपने संघर्ष की कहानी साझा की।
रोहतक डिस्टि्रक्ट केमिस्ट एसोसिएशन के प्रधान डीएलएफ निवासी सतीश कत्याल ने बताया कि उन दिनों मेरी उम्र 25 साल थी। स्नातक पास कर ली थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से सात साल की उम्र में ही जुड़ गया था। प्रधानमंत्री ने 25 जून 1975 की रात आपातकाल घोषित कर दिया गया।
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सभी राजनीतिक दल जेल में डाल दिए गए। जिसने भी विरोध की आवाज उठाई, उसे जेल भेज दिया गया। मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) व डीआईआर (डिफेंस इंडिया रूल) के तहत बगैर किसी तरह की सुनवाई के लोगों को जेल में डाला गया। नसबंदी अभियान भी इसी समय चलाया गया।
लोग डर के कारण छिपकर रहने लगे थे। इन परिस्थितियों में लोगों तक अपनी बात पहुंचाने व उन्हें जागरूक करने के लिए एक समाचार पत्र निकाला गया। इसे पहले तो छापना बड़ा मुश्किल रहता। इसके बाद इसे दूसरी जगह पहुंचाना बड़ी चुनौती होता था।
स्कूटर से गए थे जनसंघ नेता को छुड़वाने
आपातकाल के समय बड़े नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। जनसंघ नेता रामबिलास शर्मा को भी थाने में ले जाया गया। इसके बाद किसी को उनके बारे में कुछ नहीं बताया। यह पता लगने पर आरएसएस के सदस्यों ने साल्हावास का थाना घेर लिया।
अपने नेता को छुड़ाने के लिए रोहतक से वहां तक स्कूटर चलाकर पहुंचा था। रोहतक में प्रदर्शन के दौरान भिवानी स्टैंड पर पुलिस ने हमें पकड़ा था। पहले तीन दिन पुराना शहर थाने में रखा गया। यहां डराया, धमकाया, मारपीट भी हुई। इस पर भी हम नहीं टूटे तो जेल भेज दिया।
दिल्ली से लाए गए पर्चे विधानसभा में फेंकने पर हुए गिरफ्तार
भाजपा के प्रदेश कार्यालय सचिव झंग कॉलोनी निवासी गुलशन भाटिया ने बताया कि 11वीं के बाद वर्ष 1969 में जनसंघ से जुड़ गया था। प्रांतीय कार्यालय रोहतक से करनाल ले जाया गया तो मेरा भी साथ जाना हुआ। यहां संगठन की गतिविधियों के साथ स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
वर्ष 1974 में पूर्व सीएम बंसीलाल को काले झंडे दिखाने पर पहली बार जेल गया। आपातकाल में बड़े नेताओं के गिरफ्तार हाेने के बाद जिम्मेदारी बढ़ गई। साढ़े तीन माह चंडीगढ़ जेल में बिताए तो करीब नौ माह भूमिगत रहकर काम किया। विधानसभा में दिल्ली से लाए गए पर्चे फेंकने पर हमें पकड़ लिया गया। इसके बाद जेल में यातनाएं सहनी पड़ीं। उस समय प्रदेश भर में सबसे ज्यादा प्रवास किया।
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क्या है साइकोस्टाइल
यह प्रिंटिंग की पुरानी तकनीक है। इसमें टाइप राइटर पर एक स्टैंसिल तैयार की जाती है। अक्षरों की बनावट वाली कागज पर उकेरी गई कटिंग को साइकोस्टल पर लगाया जाता है। इसके बाद इसे घुमाकर अखबार छापा जाता था। मशीन पर लगी स्याही से कुछ ही देर में 100 या 200 अखबार छप जाते थे। इन्हें बाद में छिपाकर दूसरी जगह पहुंचाया जाता था। रोहतक में समाचार पत्र छापने के लिए जनसंघ कार्यालय करनाल में साइकोस्टाइल मशीन लाई गई थी। गुलशन भाटिया ने बताया कि इस मशीन काे अपने पुराने घर पर छिपाकर रखा था। बाद में यह पार्टी कार्यालय में 1990 तक खूब प्रयोग हुई।
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साइकोस्टाइल से बड़ी मुश्किल से समाचार पत्र तैयार होता था। इसे अगले दिन प्रदेश व साथ लगे राज्यों तक पहुंचाना सबसे मुश्किल काम था। पकड़े जाते तो सीधे जेल जाना पड़ता था। पुलिस की पिटाई अलग सहनी होती। यह कहना है लोकतंत्र सेनानी संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश कत्याल का। आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर अमर उजाला से हुई बातचीत में उन्होंने अपने संघर्ष की कहानी साझा की।
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रोहतक डिस्टि्रक्ट केमिस्ट एसोसिएशन के प्रधान डीएलएफ निवासी सतीश कत्याल ने बताया कि उन दिनों मेरी उम्र 25 साल थी। स्नातक पास कर ली थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से सात साल की उम्र में ही जुड़ गया था। प्रधानमंत्री ने 25 जून 1975 की रात आपातकाल घोषित कर दिया गया।
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सभी राजनीतिक दल जेल में डाल दिए गए। जिसने भी विरोध की आवाज उठाई, उसे जेल भेज दिया गया। मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) व डीआईआर (डिफेंस इंडिया रूल) के तहत बगैर किसी तरह की सुनवाई के लोगों को जेल में डाला गया। नसबंदी अभियान भी इसी समय चलाया गया।
लोग डर के कारण छिपकर रहने लगे थे। इन परिस्थितियों में लोगों तक अपनी बात पहुंचाने व उन्हें जागरूक करने के लिए एक समाचार पत्र निकाला गया। इसे पहले तो छापना बड़ा मुश्किल रहता। इसके बाद इसे दूसरी जगह पहुंचाना बड़ी चुनौती होता था।
स्कूटर से गए थे जनसंघ नेता को छुड़वाने
आपातकाल के समय बड़े नेताओं को जेलों में डाल दिया गया। जनसंघ नेता रामबिलास शर्मा को भी थाने में ले जाया गया। इसके बाद किसी को उनके बारे में कुछ नहीं बताया। यह पता लगने पर आरएसएस के सदस्यों ने साल्हावास का थाना घेर लिया।
अपने नेता को छुड़ाने के लिए रोहतक से वहां तक स्कूटर चलाकर पहुंचा था। रोहतक में प्रदर्शन के दौरान भिवानी स्टैंड पर पुलिस ने हमें पकड़ा था। पहले तीन दिन पुराना शहर थाने में रखा गया। यहां डराया, धमकाया, मारपीट भी हुई। इस पर भी हम नहीं टूटे तो जेल भेज दिया।
दिल्ली से लाए गए पर्चे विधानसभा में फेंकने पर हुए गिरफ्तार
भाजपा के प्रदेश कार्यालय सचिव झंग कॉलोनी निवासी गुलशन भाटिया ने बताया कि 11वीं के बाद वर्ष 1969 में जनसंघ से जुड़ गया था। प्रांतीय कार्यालय रोहतक से करनाल ले जाया गया तो मेरा भी साथ जाना हुआ। यहां संगठन की गतिविधियों के साथ स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
वर्ष 1974 में पूर्व सीएम बंसीलाल को काले झंडे दिखाने पर पहली बार जेल गया। आपातकाल में बड़े नेताओं के गिरफ्तार हाेने के बाद जिम्मेदारी बढ़ गई। साढ़े तीन माह चंडीगढ़ जेल में बिताए तो करीब नौ माह भूमिगत रहकर काम किया। विधानसभा में दिल्ली से लाए गए पर्चे फेंकने पर हमें पकड़ लिया गया। इसके बाद जेल में यातनाएं सहनी पड़ीं। उस समय प्रदेश भर में सबसे ज्यादा प्रवास किया।
क्या है साइकोस्टाइल
यह प्रिंटिंग की पुरानी तकनीक है। इसमें टाइप राइटर पर एक स्टैंसिल तैयार की जाती है। अक्षरों की बनावट वाली कागज पर उकेरी गई कटिंग को साइकोस्टल पर लगाया जाता है। इसके बाद इसे घुमाकर अखबार छापा जाता था। मशीन पर लगी स्याही से कुछ ही देर में 100 या 200 अखबार छप जाते थे। इन्हें बाद में छिपाकर दूसरी जगह पहुंचाया जाता था। रोहतक में समाचार पत्र छापने के लिए जनसंघ कार्यालय करनाल में साइकोस्टाइल मशीन लाई गई थी। गुलशन भाटिया ने बताया कि इस मशीन काे अपने पुराने घर पर छिपाकर रखा था। बाद में यह पार्टी कार्यालय में 1990 तक खूब प्रयोग हुई।

भाजपा के प्रदेश कार्यालय सचिव गुलशन भाटिया