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Rohtak News: बच्चों पर न आए थैलेसीमिया की आंच...शादी से पहले करा लें खून की जांच
Wed, 08 May 2024 04:27 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
Updated Wed, 08 May 2024 04:27 AM IST
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डॉ. अहिभूषण, बाल रोग विशेषज्ञ, नागरिक अस्पताल बहादुरगढ़।
बहादुरगढ़। थैलेसीमिया आनुवांशिक रक्त रोग है और थैलेसिमिया बच्चे को जन्म से उम्र भर रक्त चढ़ाना पड़ता है। इस घातक बीमारी से बच्चे को बचाना है तो शादी से पहले युवक-युवती को रक्त की जांच करा लेनी चाहिए, ताकि पता चल जाए कि उनमें थैलेसीमिया के लक्षण तो नहीं हैं। इस बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से हर वर्ष 8 मई को थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है।
नागरिक अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अहिभूषण ने बताया कि इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है, इसके कारण रक्त क्षीणता के लक्षण प्रकट होते हैं। इसकी पहचान छह माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की कमी होने लगती है, इसके कारण बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि साल भर में इस तरह के 4-5 मरीज आते हैं।
पीड़ित मरीज का शरीर दुर्बल और अशक्त
डॉ. अहिभूषण ने बताया कि सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है। परंतु थैलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर महज 20 दिन की हो जाती है। इसका सीधा असर शरीर में मौजूद हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाने से शरीर दुर्बल हो जाता है और अशक्त होकर हमेशा किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहता है। मरीज को हर 15 से 30 दिन में खून बदलवाना पड़ता है।
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थैलेसीमिया के लक्षण
- बच्चों की त्वचा और नाखूनों में पीलापन आने लगता है।
- आंखें और जीभ भी पीली पड़ने लगती हैं।
- ऊपरी जबड़े में दोष आ जाता है।
- आंतों में विषमताएं आने लगती हैं।
- दांत निकलने में काफी कठिनाई होने लगती है।
- बच्चे का विकास एकदम रुक जाता है।
ऐसे करें बचाव
- रक्त परीक्षण करवाकर इस रोग की उपस्थिति की पहचान करा लेनी चाहिए।
- शादी करने से पूर्व लड़का एवं लड़की के रक्त का परीक्षण करवाएं।
- गर्भधारण के चार महीने के अंदर भू्रण का परीक्षण कराना चाहिए।
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नागरिक अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अहिभूषण ने बताया कि इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है, इसके कारण रक्त क्षीणता के लक्षण प्रकट होते हैं। इसकी पहचान छह माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की कमी होने लगती है, इसके कारण बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि साल भर में इस तरह के 4-5 मरीज आते हैं।
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पीड़ित मरीज का शरीर दुर्बल और अशक्त
डॉ. अहिभूषण ने बताया कि सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है। परंतु थैलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर महज 20 दिन की हो जाती है। इसका सीधा असर शरीर में मौजूद हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाने से शरीर दुर्बल हो जाता है और अशक्त होकर हमेशा किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहता है। मरीज को हर 15 से 30 दिन में खून बदलवाना पड़ता है।
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थैलेसीमिया के लक्षण
- बच्चों की त्वचा और नाखूनों में पीलापन आने लगता है।
- आंखें और जीभ भी पीली पड़ने लगती हैं।
- ऊपरी जबड़े में दोष आ जाता है।
- आंतों में विषमताएं आने लगती हैं।
- दांत निकलने में काफी कठिनाई होने लगती है।
- बच्चे का विकास एकदम रुक जाता है।
ऐसे करें बचाव
- रक्त परीक्षण करवाकर इस रोग की उपस्थिति की पहचान करा लेनी चाहिए।
- शादी करने से पूर्व लड़का एवं लड़की के रक्त का परीक्षण करवाएं।
- गर्भधारण के चार महीने के अंदर भू्रण का परीक्षण कराना चाहिए।