{"_id":"590ccd2d4f1c1ba273441500","slug":"changement-time-three-teacher-change-govt-school-picture","type":"story","status":"publish","title_hn":"बदलाव की बयार... तीन शिक्षकों ने बदल की सरकारी स्कूलों की तस्वीर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बदलाव की बयार... तीन शिक्षकों ने बदल की सरकारी स्कूलों की तस्वीर
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Sat, 06 May 2017 02:04 AM IST
विज्ञापन
शिक्षिका संतोष पुस्स्कार प्राप्त करते।
- फोटो : amarujala beuro
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना मतलब उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करना...। अभिभावकों के दिल से इस हौवे को निकालने के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षक अब निजी स्कूलों को टक्कर देने में लगे हैं। सेवा का जुनून और कुछ कर गुजरने की तमन्ना का ही नतीजा है कि निजी स्कूलों में पांच वर्षों से पढ़ रहे बच्चे भी अब सरकारी स्कूलोें में पढ़ने को आ रहे हैं। इन शिक्षकों का जुनून ही है कि बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ समाजसेवा भी खूब कर रहे हैं।
बच्चों के भविष्य को संवारने की कोशिश में दिनरात एक कर रहे हैं। कोई रिटायरमेंट के बाद भी स्कूल में पूरा समय पढ़ाता है तो कोई वीकेंड या छुट्टी के बाद इंग्लिश स्पीकिंग क्लास ले रहा है। यही नहीं, कुछ शिक्षक तो दोस्तों की मदद लेकर स्कूल के हालात बदल रहे हैं। सरकारी स्कूलाें के बच्चों को निजी स्कूल की तरह सुविधाएं दिलाने के लिए डायरी, टाई, पहचान पत्र और वाटर कूलर लगाए गए हैं। यहीं जिद और जुनून की वजह से ही आज दूसरों के लिए मिसाल बन रहे हैं।
आखिरी सांस तक बच्चों को दूंगी शिक्षा
अमूमन लोग रिटायरमेंट के बाद परिवार के साथ समय बिताना या अपनी इच्छाओं को पूरा करने के बारे में सोचते हैं। इसके विपरीत शिवाजी कॉलोनी निवासी और प्राइमरी टीचर संतोष दहिया रिटायरमेंट केे बाद भी स्कूल को पूरा समय देती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में 35 साल की सेवाएं देकर मार्च 2016 में रिटायरमेंट हुईं दहिया की दिनचर्या आज भी बदली नहीं है।
विज्ञापन
वह रोजाना स्कूल जाती हैैं। उनका कहना है कि जब तक शरीर साथ देगा, वे ऐसे ही शिक्षा की अलख जलाती रहेंगी। उनका सुनारियां प्राइमरी स्कूल से 12 साल का लगाव है, रिटायरमेंट भी यही से हुई है। इसी ज़ज्बे की वजह से 2006 में राज्य शिक्षक अवार्ड से सम्मानित भी हुईं हैं। पिछले माह ही राज्यपाल ने बेस्ट स्काउट एंड गाइड के पुरस्कार से भी उन्हें नवाजा है। रिटायरमेंट होने के बाद भी राष्ट्रीय बुलबुल में पांच से 10 साल की बेटियों को ट्रेनिंग दे रही हैं।
मॉर्निंग फ्रेंडस की मदद से बदले रिटौली स्कूल के हालात
सरकारी स्कूलों के बच्चों को निजी स्कूलों के बाहर सुविधाएं नहीं मिलने की वजह से ही वे पढ़ने नहीं आते हैं। यह बात अमृत कॉलोनी निवासी और अर्थशास्त्र के लेक्चरर राजबीर सिंह ने समझी। उन्होंने अपने मॉर्निंग फ्रेंडस की मदद लेकर रिटौली ब्वॉयज स्कूल के 400 बच्चों के लिए पहचान पत्र, डायरी, स्टेशनरी, टाई और वाटर कूलर लगाया। घर-घर घूमे और 60 बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में करवाया। इसमें से कुछ बच्चे निजी स्कूलों पढ़ रहे थे। सन 1995 से पढ़ा रहे राजबीर अपनी जिद से सिरसा के मोतीवाली और डबवाली में निजी स्कूल भी बंद करा चुके हैं। अपने प्रयास से 150 बच्चों को सरकारी स्कूल में लेकर आए और अच्छी शिक्षा दी। इन्हें हरियाली से बहुत प्यार है, इसलिए 650 पौधे लगा चुके हैं।
पहले अंग्रेजी समझते नहीं थे, अब देते हैं जवाब
रिटौली गांव के सरकारी स्कूल में पिछले नौ महीने से पढ़ा रही सुरेखा पिलानिया ने भी बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए काफी कोशिश की है। जनता कॉलोनी निवासी सुरेखा ने 2009 में सरकारी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। शुरुआती दौर में जब उन्होंने बच्चों से अंग्रेजी में बात की तो वह समझ नहीं पाए। इसके बाद उन्होंने बदलाव लाने की ठानी। आज विद्यार्थी न केवल अंग्रेजी अच्छे से समझते हैं बल्कि उनका जवाब भी देते हैं।
वे बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों मेें अभिभावक आर्थिक रूप से संपन्न नहीं होने के बावजूद कर्ज लेकर बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाते हैं। उनके दिमाग में बैठ गया है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती ही नहीं है। उन्हें भरोसा दिलाकर ही वे निजी स्कूलों के करीब 70 बच्चों को सरकारी स्कूल में लेकर आईं हैं। रोजाना 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों की अंग्रेजी में बातचीत, डिस्कशन आदि गतिविधियां कराती हैं। हर वीकेंड पर इंग्लिश स्पीकिंग की क्लास भी लेती हैं। अभी बच्चों को बेसिक सिखा रही हैं, ताकि ये चीजें उनके कॅरियर में रुकावट न बनें। उनके जीवन का लक्ष्य है कि हर बच्चा अंग्रेजी बोले और समझे।
विज्ञापन
बच्चों के भविष्य को संवारने की कोशिश में दिनरात एक कर रहे हैं। कोई रिटायरमेंट के बाद भी स्कूल में पूरा समय पढ़ाता है तो कोई वीकेंड या छुट्टी के बाद इंग्लिश स्पीकिंग क्लास ले रहा है। यही नहीं, कुछ शिक्षक तो दोस्तों की मदद लेकर स्कूल के हालात बदल रहे हैं। सरकारी स्कूलाें के बच्चों को निजी स्कूल की तरह सुविधाएं दिलाने के लिए डायरी, टाई, पहचान पत्र और वाटर कूलर लगाए गए हैं। यहीं जिद और जुनून की वजह से ही आज दूसरों के लिए मिसाल बन रहे हैं।
विज्ञापन
आखिरी सांस तक बच्चों को दूंगी शिक्षा
अमूमन लोग रिटायरमेंट के बाद परिवार के साथ समय बिताना या अपनी इच्छाओं को पूरा करने के बारे में सोचते हैं। इसके विपरीत शिवाजी कॉलोनी निवासी और प्राइमरी टीचर संतोष दहिया रिटायरमेंट केे बाद भी स्कूल को पूरा समय देती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में 35 साल की सेवाएं देकर मार्च 2016 में रिटायरमेंट हुईं दहिया की दिनचर्या आज भी बदली नहीं है।
विज्ञापन
वह रोजाना स्कूल जाती हैैं। उनका कहना है कि जब तक शरीर साथ देगा, वे ऐसे ही शिक्षा की अलख जलाती रहेंगी। उनका सुनारियां प्राइमरी स्कूल से 12 साल का लगाव है, रिटायरमेंट भी यही से हुई है। इसी ज़ज्बे की वजह से 2006 में राज्य शिक्षक अवार्ड से सम्मानित भी हुईं हैं। पिछले माह ही राज्यपाल ने बेस्ट स्काउट एंड गाइड के पुरस्कार से भी उन्हें नवाजा है। रिटायरमेंट होने के बाद भी राष्ट्रीय बुलबुल में पांच से 10 साल की बेटियों को ट्रेनिंग दे रही हैं।
मॉर्निंग फ्रेंडस की मदद से बदले रिटौली स्कूल के हालात
सरकारी स्कूलों के बच्चों को निजी स्कूलों के बाहर सुविधाएं नहीं मिलने की वजह से ही वे पढ़ने नहीं आते हैं। यह बात अमृत कॉलोनी निवासी और अर्थशास्त्र के लेक्चरर राजबीर सिंह ने समझी। उन्होंने अपने मॉर्निंग फ्रेंडस की मदद लेकर रिटौली ब्वॉयज स्कूल के 400 बच्चों के लिए पहचान पत्र, डायरी, स्टेशनरी, टाई और वाटर कूलर लगाया। घर-घर घूमे और 60 बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में करवाया। इसमें से कुछ बच्चे निजी स्कूलों पढ़ रहे थे। सन 1995 से पढ़ा रहे राजबीर अपनी जिद से सिरसा के मोतीवाली और डबवाली में निजी स्कूल भी बंद करा चुके हैं। अपने प्रयास से 150 बच्चों को सरकारी स्कूल में लेकर आए और अच्छी शिक्षा दी। इन्हें हरियाली से बहुत प्यार है, इसलिए 650 पौधे लगा चुके हैं।
पहले अंग्रेजी समझते नहीं थे, अब देते हैं जवाब
रिटौली गांव के सरकारी स्कूल में पिछले नौ महीने से पढ़ा रही सुरेखा पिलानिया ने भी बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए काफी कोशिश की है। जनता कॉलोनी निवासी सुरेखा ने 2009 में सरकारी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। शुरुआती दौर में जब उन्होंने बच्चों से अंग्रेजी में बात की तो वह समझ नहीं पाए। इसके बाद उन्होंने बदलाव लाने की ठानी। आज विद्यार्थी न केवल अंग्रेजी अच्छे से समझते हैं बल्कि उनका जवाब भी देते हैं।
वे बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों मेें अभिभावक आर्थिक रूप से संपन्न नहीं होने के बावजूद कर्ज लेकर बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाते हैं। उनके दिमाग में बैठ गया है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई होती ही नहीं है। उन्हें भरोसा दिलाकर ही वे निजी स्कूलों के करीब 70 बच्चों को सरकारी स्कूल में लेकर आईं हैं। रोजाना 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों की अंग्रेजी में बातचीत, डिस्कशन आदि गतिविधियां कराती हैं। हर वीकेंड पर इंग्लिश स्पीकिंग की क्लास भी लेती हैं। अभी बच्चों को बेसिक सिखा रही हैं, ताकि ये चीजें उनके कॅरियर में रुकावट न बनें। उनके जीवन का लक्ष्य है कि हर बच्चा अंग्रेजी बोले और समझे।