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Rohtak News: बिना मेडिकल रिपोर्ट के नहीं होगी धारा 308 में गिरफ्तारी, एडीजे कोर्ट ने खारिज की पुलिस की अपील
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रोहतक। जिला पुलिस अब बिना मेडिकल रिपोर्ट के आईपीसी की धारा 308 में आरोपी की गिरफ्तारी नहीं कर सकेगी, यदि गिरफ्तारी हुई तो जांच अधिकारी और थाना प्रभारी जिम्मेदार होंगे। एसीजेएम मंगलेश चौबे की अदालत के इस फैसले को पुलिस ने सेशन कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन शनिवार को एएसजे महेश कुमार की अदालत ने पुलिस की अपील को खारिज कर दिया।
वकील सुरेंद्र लौरा ने बताया कि बाबरा मोहल्ला निवासी प्रीति ने सिटी थाने में शिकायत दी थी कि वह इंद्रा कॉलोनी स्थित पांडव नगर में किराये पर रहती है। उसका पति प्रदीप पांडव नगर में चौक पर चाउमिन की रेहड़ी लगाता है। रात करीब साढ़े नौ बजे राकेश उसके पति से मारपीट कर रहा था। इसी बीच रमन ने चकुली वस्तु से वार किया। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ 323, 324, 308, 506 व 34 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया था। बचाव पक्ष की तरफ से एसीजेएम मंगलेश कुमार चौबे की अदालत में बताया गया कि धारा 308 गलत लगाई गई है। क्योंकि घायल को सामान्य चोटें लगी थीं, जबकि धारा 308 में सेशन कोर्ट ही जमानत ले सकती है। साथ ही बचाव पक्ष ने सु्प्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया।
एडीजे महेश कुमार की अदालत ने खारिज की पुलिस की अपील
पुलिस की अर्जी पर 31 अगस्त को एडीजे महेश कुमार की अदालत में सुनवाई हुई। अदालत में जिला बार प्रधान लोकेंद्र फौगाट, सुरेंद्र लौरा, आरके पांडे, शक्ति सिंह खत्री, राजबीर फौगाट, रेणू शास्त्री व वरुण कौशिक पेश हुए। बार प्रधान ने कहा कि निचली अदालत का फैसला सही है। कोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस के बाद शनिवार को अपना फैसला सुनाते हुए पुलिस की अर्जी खारिज कर दी।
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बार प्रधान बोले, अब तक की वकालत में दूसरा केस लड़ा
बार प्रधान लोकेंद्र फौगाट उर्फ जोजो ने बताया कि अब की वकालत में उन्होंने पहला केस 1999 में मारपीट का लड़ा था। दूसरा केस अब 2023 में लड़ा है, जिसके लिए एक रुपये फीस ली है। जिला बार में परंपरा है कि प्रधान सामान्य तौर पर वकालत से दूर रहता है।
क्या मतलब है धारा 308 का
वकील सुरेंद्र का कहना है कि गंभीर चोट मारने पर पुलिस जानलेवा हमले की धारा 307 लगाती है, जिसमें इरादा हत्या का होता है। लड़ाई- झगड़े के केस में पुलिस धारा 308 लगा सकती है, जिसमें अगर डॉक्टर लिखकर दे कि चोट से जान जा सकती थी। अगर चोट सामान्य है तो मारपीट की धारा 323 लगती है। धारा 323 के तहत दर्ज केस में जमानत निचली कोर्ट से भी मिल सकती है, जबकि धारा 308 में जमानत सेशन कोर्ट से ही हो सकती है।
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वकील सुरेंद्र लौरा ने बताया कि बाबरा मोहल्ला निवासी प्रीति ने सिटी थाने में शिकायत दी थी कि वह इंद्रा कॉलोनी स्थित पांडव नगर में किराये पर रहती है। उसका पति प्रदीप पांडव नगर में चौक पर चाउमिन की रेहड़ी लगाता है। रात करीब साढ़े नौ बजे राकेश उसके पति से मारपीट कर रहा था। इसी बीच रमन ने चकुली वस्तु से वार किया। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ 323, 324, 308, 506 व 34 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया था। बचाव पक्ष की तरफ से एसीजेएम मंगलेश कुमार चौबे की अदालत में बताया गया कि धारा 308 गलत लगाई गई है। क्योंकि घायल को सामान्य चोटें लगी थीं, जबकि धारा 308 में सेशन कोर्ट ही जमानत ले सकती है। साथ ही बचाव पक्ष ने सु्प्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया।
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एडीजे महेश कुमार की अदालत ने खारिज की पुलिस की अपील
पुलिस की अर्जी पर 31 अगस्त को एडीजे महेश कुमार की अदालत में सुनवाई हुई। अदालत में जिला बार प्रधान लोकेंद्र फौगाट, सुरेंद्र लौरा, आरके पांडे, शक्ति सिंह खत्री, राजबीर फौगाट, रेणू शास्त्री व वरुण कौशिक पेश हुए। बार प्रधान ने कहा कि निचली अदालत का फैसला सही है। कोर्ट ने दोनों पक्षों की बहस के बाद शनिवार को अपना फैसला सुनाते हुए पुलिस की अर्जी खारिज कर दी।
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बार प्रधान बोले, अब तक की वकालत में दूसरा केस लड़ा
बार प्रधान लोकेंद्र फौगाट उर्फ जोजो ने बताया कि अब की वकालत में उन्होंने पहला केस 1999 में मारपीट का लड़ा था। दूसरा केस अब 2023 में लड़ा है, जिसके लिए एक रुपये फीस ली है। जिला बार में परंपरा है कि प्रधान सामान्य तौर पर वकालत से दूर रहता है।
क्या मतलब है धारा 308 का
वकील सुरेंद्र का कहना है कि गंभीर चोट मारने पर पुलिस जानलेवा हमले की धारा 307 लगाती है, जिसमें इरादा हत्या का होता है। लड़ाई- झगड़े के केस में पुलिस धारा 308 लगा सकती है, जिसमें अगर डॉक्टर लिखकर दे कि चोट से जान जा सकती थी। अगर चोट सामान्य है तो मारपीट की धारा 323 लगती है। धारा 323 के तहत दर्ज केस में जमानत निचली कोर्ट से भी मिल सकती है, जबकि धारा 308 में जमानत सेशन कोर्ट से ही हो सकती है।