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नागरिक अस्पताल में गर्भवती को छह घंटे करना पड़ा इंतजार
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नागरिक अस्पताल रेवाड़ी
- फोटो : Rewari
गर्भवती महिलाओं के लिए मातृत्व सुरक्षा जैसी योजनाएं जिले में मजाक बनकर रह गई हैं। हकीकत ये है कि यदि सार्वजनिक अवकाश के दिन अथवा किसी भी रात गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) हो जाएं तो नागरिक अस्पताल में एक ही जवाब मिलता है, अल्ट्रासाउंड के लिए रेडियालॉजिस्ट व गायनी सर्जन छुट्टी पर है रोहतक पीजीआई ले जाओ।
बुधवार अल सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ, शहर के रामपुरा से एक महिला को आठ महीने के बाद ही लेबर पेन होने पर भर्ती कराया गया। महिला दर्द से करहाती रही, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बताया गया कि अल्ट्रासाउंड जरूरी है, लेकिन बकरीद की छुट्टी है। डिलिवरी सीजेरियन होनी है ऐसे में गॉयनी सर्जन का 6 घंटे इंतजार के बाद बताया गया कि छुट्टी के चलते डॉक्टर नहीं आ सकते और पीजीआई रेफर करने की पर्ची थमा दी गई। जरूरतमंद परिवार के सामने निजी अस्पताल में जाने के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन निजी अस्पताल में सिजेरियन की बजाय नार्मल डिलीवरी हो गई।
जिले की 12 लाख की आबादी पर महज एक डॉक्टर (गॉयनोलॉजिस्ट) तैनात है। जिले के पांच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 13 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 113 सब सेंटर पर एक भी महिला विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात नहीं हैं। ऐसे में दूर-दराज स्थित गांवों के साथ समीपवर्ती राजस्थान की महिलाओं का जिम्मा भी रेवाड़ी स्थित 100 बेड वाले नागरिक अस्पताल पर है। इस अस्पताल में आने वाली हर दूसरी गर्भवती महिला को रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में समय पर सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण कई बार दो जानों की जिंदगी पर खतरा बना रहता है।
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रात के समय राम भरोसे रहती है प्रसूता की जान
नागरिक अस्पताल में चार शिफ्टों में चार महिला विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती होनी चाहिए। गॉयनोलॉजिस्ट डॉ. अर्चना पर ही चारों शिफ्ट का भार है। दिन के समय किसी तरह से डॉ. अर्चना से काम चल जाता है लेकिन रात के समय यदि यहां भर्ती प्रसूूता को विशेषज्ञ डॉक्टर की जरूरत पड़ जाए तो उसकी जान राम-भरोसे ही रहती है। कई बार विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं होने पर गर्भवती को रोहतक या निजी अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है। नियमानुसार चार विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ करीब आठ एमबीबीएस महिला डॉक्टरों का होना जरूरी है, लेकिन नागरिक अस्पताल में महज तीन एमबीबीएस डॉक्टर ही तैनात हैं। ऐसे में गर्भवती महिलाओं की देखरेख किस तरह होती होगी। आसानी से समझा जा सकता है।
तीस फीसदी सीजेरियन होती हैं डिलिवरी
नागरिक अस्पताल में एक महीने में औसतन 350-400 डिलिवरी होती है। इनमें से तीस फीसदी बच्चों का जन्म ऑपरेशन (सीजेरियन) से होता है। अर्थात प्रतिदिन 3-4 डिलिवरी ऑपरेशन से हो रही हैं। मेडिकल के अनुसार सीजेरियन डिलिवरी गायनोकॉलोजिस्ट ही करा सकती हैं। अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं होने के कारण परेशानी बढ़ रही है। धीरे-धीरे लोगों का सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से विश्वास उठ रहा है।
जिले में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल
नागरिक अस्पताल में 100 बेड के हिसाब से 25 डॉक्टर, 64 स्टाफ नर्स व 9 नर्सिंग सिस्टर की पोस्ट चार साल में स्वास्थ्य विभाग नहीं भर पाया। 5 मई को स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल को 100 से बढ़ाकर 200 बेड करने की घोषणा के बाद निर्माण की अधिकारिक अनुमति भी मिल चुकी है। लेकिन यहां बड़ा सवाल है कि बेसिक सुविधाओं के अभाव में मरीजों को किस तरह से बेहतर उपचार मिल पाएगा। स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टर के बाद स्टाफ नर्स नींव होती हैं। लेकिन रेवाड़ी में पहले से ही नींव हिली हुई है। रेवाड़ी में स्टाफ नर्स की 90 पोस्ट प्रस्तावित हैं, लेकिन कार्यरत महज 26 हैं। डॉक्टर की बात करें तो यहां पर 55 मेडिकल ऑफिसर (एमओ) की जरूरत है, लेकिन कार्यरत महज 30 ही हैं। क्योंकि अब अस्पताल 200 बेड का हो चुका है, ऐसे में स्टाफ नर्स की प्रस्तावित पोस्ट बढ़कर 180 व डॉक्टर की 110 हो जाएगी। लेकिन ऐसा कब होगा ये बड़ा सवाल है। ऐसा ही हाल नर्सिंग सिस्टर का है। यहां पर इनके लिए 10 पोस्ट प्रस्तावित है, लेकिन कार्यरत महज दो हैं। ऐसे में 8 पोस्ट खाली होने का खामियाजा यहां पर भर्ती मरीजों को उठाना पड़ रहा है।
रोजाना औसतन 1500 मरीजों की ओपीडी
शहर के नागरिक अस्पताल में हर रोज औसतन नए और पुराने 1500 मरीजों की ओपीडी होती है। नागरिक अस्पताल में दवाओं की कमी से मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ती है। ठंड के मौसम के चलते अस्पताल में खांसी-जुकाम व मौसमी बीमारी के ज्यादा बीमार पहुंचते हैं। छोटी बीमारियों के लिए पूरी दवाएं नहीं मिलती गंभीर उपचार के लिए रेफर ही सहारा है।
ट्रॉमा सेंटर भी बना रेफरल सेंटर
जिले से तीन नेशनल हाईवे- 48, 11 व 71 होकर गुजरते हैं। पटौदी रोड को भी हाईवे में तब्दील करने पर कार्य चल रहा है। ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं के हर रोज शहर के ट्रॉमा सेंटर में 10-12 केस पहुंचते हैं। ट्रॉमा सेंटर में व्यवस्थाएं नहीं होने से हर रोज 80 फीसदी घायलों को रेफर कर दिया जाता है। इसका बड़ा कारण यह है कि आज तक ट्रॉमा सेंटर में स्थायी चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। नागरिक अस्पताल के डॉक्टरों की ड्यूटी ही ट्रॉमा सेंटर में लगाई जाती है।
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बुधवार अल सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ, शहर के रामपुरा से एक महिला को आठ महीने के बाद ही लेबर पेन होने पर भर्ती कराया गया। महिला दर्द से करहाती रही, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। बताया गया कि अल्ट्रासाउंड जरूरी है, लेकिन बकरीद की छुट्टी है। डिलिवरी सीजेरियन होनी है ऐसे में गॉयनी सर्जन का 6 घंटे इंतजार के बाद बताया गया कि छुट्टी के चलते डॉक्टर नहीं आ सकते और पीजीआई रेफर करने की पर्ची थमा दी गई। जरूरतमंद परिवार के सामने निजी अस्पताल में जाने के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन निजी अस्पताल में सिजेरियन की बजाय नार्मल डिलीवरी हो गई।
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जिले की 12 लाख की आबादी पर महज एक डॉक्टर (गॉयनोलॉजिस्ट) तैनात है। जिले के पांच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 13 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 113 सब सेंटर पर एक भी महिला विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात नहीं हैं। ऐसे में दूर-दराज स्थित गांवों के साथ समीपवर्ती राजस्थान की महिलाओं का जिम्मा भी रेवाड़ी स्थित 100 बेड वाले नागरिक अस्पताल पर है। इस अस्पताल में आने वाली हर दूसरी गर्भवती महिला को रेफर कर दिया जाता है। ऐसे में समय पर सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण कई बार दो जानों की जिंदगी पर खतरा बना रहता है।
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रात के समय राम भरोसे रहती है प्रसूता की जान
नागरिक अस्पताल में चार शिफ्टों में चार महिला विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती होनी चाहिए। गॉयनोलॉजिस्ट डॉ. अर्चना पर ही चारों शिफ्ट का भार है। दिन के समय किसी तरह से डॉ. अर्चना से काम चल जाता है लेकिन रात के समय यदि यहां भर्ती प्रसूूता को विशेषज्ञ डॉक्टर की जरूरत पड़ जाए तो उसकी जान राम-भरोसे ही रहती है। कई बार विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं होने पर गर्भवती को रोहतक या निजी अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है। नियमानुसार चार विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ करीब आठ एमबीबीएस महिला डॉक्टरों का होना जरूरी है, लेकिन नागरिक अस्पताल में महज तीन एमबीबीएस डॉक्टर ही तैनात हैं। ऐसे में गर्भवती महिलाओं की देखरेख किस तरह होती होगी। आसानी से समझा जा सकता है।
तीस फीसदी सीजेरियन होती हैं डिलिवरी
नागरिक अस्पताल में एक महीने में औसतन 350-400 डिलिवरी होती है। इनमें से तीस फीसदी बच्चों का जन्म ऑपरेशन (सीजेरियन) से होता है। अर्थात प्रतिदिन 3-4 डिलिवरी ऑपरेशन से हो रही हैं। मेडिकल के अनुसार सीजेरियन डिलिवरी गायनोकॉलोजिस्ट ही करा सकती हैं। अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं होने के कारण परेशानी बढ़ रही है। धीरे-धीरे लोगों का सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से विश्वास उठ रहा है।
जिले में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल
नागरिक अस्पताल में 100 बेड के हिसाब से 25 डॉक्टर, 64 स्टाफ नर्स व 9 नर्सिंग सिस्टर की पोस्ट चार साल में स्वास्थ्य विभाग नहीं भर पाया। 5 मई को स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल को 100 से बढ़ाकर 200 बेड करने की घोषणा के बाद निर्माण की अधिकारिक अनुमति भी मिल चुकी है। लेकिन यहां बड़ा सवाल है कि बेसिक सुविधाओं के अभाव में मरीजों को किस तरह से बेहतर उपचार मिल पाएगा। स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टर के बाद स्टाफ नर्स नींव होती हैं। लेकिन रेवाड़ी में पहले से ही नींव हिली हुई है। रेवाड़ी में स्टाफ नर्स की 90 पोस्ट प्रस्तावित हैं, लेकिन कार्यरत महज 26 हैं। डॉक्टर की बात करें तो यहां पर 55 मेडिकल ऑफिसर (एमओ) की जरूरत है, लेकिन कार्यरत महज 30 ही हैं। क्योंकि अब अस्पताल 200 बेड का हो चुका है, ऐसे में स्टाफ नर्स की प्रस्तावित पोस्ट बढ़कर 180 व डॉक्टर की 110 हो जाएगी। लेकिन ऐसा कब होगा ये बड़ा सवाल है। ऐसा ही हाल नर्सिंग सिस्टर का है। यहां पर इनके लिए 10 पोस्ट प्रस्तावित है, लेकिन कार्यरत महज दो हैं। ऐसे में 8 पोस्ट खाली होने का खामियाजा यहां पर भर्ती मरीजों को उठाना पड़ रहा है।
रोजाना औसतन 1500 मरीजों की ओपीडी
शहर के नागरिक अस्पताल में हर रोज औसतन नए और पुराने 1500 मरीजों की ओपीडी होती है। नागरिक अस्पताल में दवाओं की कमी से मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ती है। ठंड के मौसम के चलते अस्पताल में खांसी-जुकाम व मौसमी बीमारी के ज्यादा बीमार पहुंचते हैं। छोटी बीमारियों के लिए पूरी दवाएं नहीं मिलती गंभीर उपचार के लिए रेफर ही सहारा है।
ट्रॉमा सेंटर भी बना रेफरल सेंटर
जिले से तीन नेशनल हाईवे- 48, 11 व 71 होकर गुजरते हैं। पटौदी रोड को भी हाईवे में तब्दील करने पर कार्य चल रहा है। ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं के हर रोज शहर के ट्रॉमा सेंटर में 10-12 केस पहुंचते हैं। ट्रॉमा सेंटर में व्यवस्थाएं नहीं होने से हर रोज 80 फीसदी घायलों को रेफर कर दिया जाता है। इसका बड़ा कारण यह है कि आज तक ट्रॉमा सेंटर में स्थायी चिकित्सकों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। नागरिक अस्पताल के डॉक्टरों की ड्यूटी ही ट्रॉमा सेंटर में लगाई जाती है।