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पंचतत्व ही मानवता के वास्तविक औषधालय : डॉ. धर्मवीर
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व्याख्यान के दौरान एक मंच पर आए विद्यार्थी। स्रोत : विवि
- फोटो : फिरोजाबाद बस स्टैंड पर निरीक्षण करते आरएम व एआरएम। विभाग स्रोत
रेवाड़ी। मीरपुर स्थित इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय के योग विभाग की ओर से प्राकृतिक चिकित्सा दिवस के उपलक्ष्य में इस वर्ष की थीम नेचर क्योर टू क्योर नेचर विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया गया।
योग विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. जयपाल सिंह राजपूत ने कहा कि विश्वविद्यालय में नेचुरोपैथी को एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और वर्तमान युग में मानवता के समक्ष सबसे बड़ी आवश्यकता प्रकृति की ओर लौटने की है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब समाज प्रकृति के समीप रहेगा, तभी स्वस्थ, संस्कारित और खुशहाल भारत का निर्माण संभव होगा। योगाचार्य डॉ. धर्मवीर ने पंचतत्वों मिट्टी, पानी, धूप, हवा और आकाश की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि मानव शरीर इन्हीं तत्वों से बना है और इनका असंतुलन ही रोगों का कारण बनता है।
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प्राकृतिक चिकित्सा इन पंचतत्वों के संतुलन को स्थापित करने का माध्यम है। उनके अनुसार पंचतत्व ही मानवता के वास्तविक औषधालय हैं। योग शिक्षक अमित ने आधुनिक जीवनशैली में पंचतत्वों से दूर होते मानव व्यवहार की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि प्राचीन काल में प्रकृति के साथ सामंजस्य रखने से लोग अधिक स्वस्थ और संतुलित जीवन जीते थे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अमनदीप ने कुशलता से किया। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा की विभिन्न विधियों और दैनिक जीवन में उसके व्यावहारिक प्रयोगों पर उपयोगी जानकारी दी। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में प्राकृतिक चिकित्सा अपनाते हुए समाज में इसके प्रचार-प्रसार का कार्य करेंगे।
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योग विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. जयपाल सिंह राजपूत ने कहा कि विश्वविद्यालय में नेचुरोपैथी को एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और वर्तमान युग में मानवता के समक्ष सबसे बड़ी आवश्यकता प्रकृति की ओर लौटने की है।
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उन्होंने स्पष्ट किया कि जब समाज प्रकृति के समीप रहेगा, तभी स्वस्थ, संस्कारित और खुशहाल भारत का निर्माण संभव होगा। योगाचार्य डॉ. धर्मवीर ने पंचतत्वों मिट्टी, पानी, धूप, हवा और आकाश की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि मानव शरीर इन्हीं तत्वों से बना है और इनका असंतुलन ही रोगों का कारण बनता है।
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प्राकृतिक चिकित्सा इन पंचतत्वों के संतुलन को स्थापित करने का माध्यम है। उनके अनुसार पंचतत्व ही मानवता के वास्तविक औषधालय हैं। योग शिक्षक अमित ने आधुनिक जीवनशैली में पंचतत्वों से दूर होते मानव व्यवहार की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि प्राचीन काल में प्रकृति के साथ सामंजस्य रखने से लोग अधिक स्वस्थ और संतुलित जीवन जीते थे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अमनदीप ने कुशलता से किया। उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा की विभिन्न विधियों और दैनिक जीवन में उसके व्यावहारिक प्रयोगों पर उपयोगी जानकारी दी। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में प्राकृतिक चिकित्सा अपनाते हुए समाज में इसके प्रचार-प्रसार का कार्य करेंगे।