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Rewari News: रेजांगला के वीर अहीर शहीदों के सम्मान और सत्य की पुनर्स्थापना को लेकर राष्ट्रव्यापी आवाज हो रही तेज
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डॉ. टीसी राव
रेवाड़ी। 1962 के भारत-चीन युद्ध की ऐतिहासिक रेजांगला लड़ाई में अद्वितीय साहस और बलिदान देने वाले अहीर वीर सैनिकों को उनका वास्तविक और संपूर्ण सम्मान दिलाने की राष्ट्रव्यापी आवाज तेज हो रही है।
कैलाशपुर (धानी जाटूसाना) निवासी डॉ. टीसी राव प्रेस बयान जारी कर बताया कि 18 नवंबर 1962 को 18 हजार फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई इस लड़ाई में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के 120 सैनिकों में से 117 अहीर थे जिन्होंने -40 डिग्री तापमान, सीमित हथियारों और अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद लगभग 1310 दुश्मन सैनिकों को मार गिराया।
अंतिम सांस तक डटे रहे। यह पराक्रम विश्व सैन्य इतिहास की सबसे वीरतापूर्ण लड़ाइयों में दर्ज है। समाज, पूर्व सैनिकों और इतिहासकारों के एक बड़े वर्ग ने चिंता व्यक्त की है कि रेजांगला युद्ध के संबंध में कई ऐतिहासिक दस्तावेजों, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में अहीर वीरों की पहचान एवं योगदान को कई बार कम करके दिखाया गया या अनदेखा किया गया।
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विशेष रूप से वीरता पुरस्कारों की संख्या में असंगत कटौती, राष्ट्रगीतों और फिल्मों में अहीरों का उल्लेख न होना और रेजांगला स्मारक के नवीनीकरण के दौरान अहीर धाम 0 किमी पट्टिका को हटाए जाने की घटनाएं व्यापक रूप से सवालों के घेरे में हैं। इन घटनाओं को न केवल समुदाय विशेष का अपमान माना जा रहा है बल्कि इसे राष्ट्र की सैन्य विरासत पर चोट के रूप में भी देखा जा रहा है।
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फिल्म 120 बहादुर पर उठाए सवाल
डॉ. टीसी राव ने कहा कि हाल के वर्षों में युद्ध आधारित फिल्मों और दृश्य माध्यमों द्वारा रेजांगला की वास्तविकता को विकृत रूप में प्रस्तुत किए जाने पर भी गंभीर आपत्तियां उठाई गई हैं। फिल्म 120 बहादुर को लेकर कहा है कि उसमें 117 अहीर सैनिकों की सामूहिक वीरता को उचित स्थान नहीं दिया गया और कई ऐतिहासिक तथ्यों को बदल दिया गया। प्रतिनिधियों का कहना है कि ऐसी फिल्में राष्ट्र की युवा पीढ़ी की सोच पर सीधा प्रभाव डालती हैं, इसलिए उनमें पूर्ण सत्यता और ऐतिहासिक प्रमाणिकता अनिवार्य है।
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कैलाशपुर (धानी जाटूसाना) निवासी डॉ. टीसी राव प्रेस बयान जारी कर बताया कि 18 नवंबर 1962 को 18 हजार फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई इस लड़ाई में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के 120 सैनिकों में से 117 अहीर थे जिन्होंने -40 डिग्री तापमान, सीमित हथियारों और अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद लगभग 1310 दुश्मन सैनिकों को मार गिराया।
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अंतिम सांस तक डटे रहे। यह पराक्रम विश्व सैन्य इतिहास की सबसे वीरतापूर्ण लड़ाइयों में दर्ज है। समाज, पूर्व सैनिकों और इतिहासकारों के एक बड़े वर्ग ने चिंता व्यक्त की है कि रेजांगला युद्ध के संबंध में कई ऐतिहासिक दस्तावेजों, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में अहीर वीरों की पहचान एवं योगदान को कई बार कम करके दिखाया गया या अनदेखा किया गया।
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विशेष रूप से वीरता पुरस्कारों की संख्या में असंगत कटौती, राष्ट्रगीतों और फिल्मों में अहीरों का उल्लेख न होना और रेजांगला स्मारक के नवीनीकरण के दौरान अहीर धाम 0 किमी पट्टिका को हटाए जाने की घटनाएं व्यापक रूप से सवालों के घेरे में हैं। इन घटनाओं को न केवल समुदाय विशेष का अपमान माना जा रहा है बल्कि इसे राष्ट्र की सैन्य विरासत पर चोट के रूप में भी देखा जा रहा है।
फिल्म 120 बहादुर पर उठाए सवाल
डॉ. टीसी राव ने कहा कि हाल के वर्षों में युद्ध आधारित फिल्मों और दृश्य माध्यमों द्वारा रेजांगला की वास्तविकता को विकृत रूप में प्रस्तुत किए जाने पर भी गंभीर आपत्तियां उठाई गई हैं। फिल्म 120 बहादुर को लेकर कहा है कि उसमें 117 अहीर सैनिकों की सामूहिक वीरता को उचित स्थान नहीं दिया गया और कई ऐतिहासिक तथ्यों को बदल दिया गया। प्रतिनिधियों का कहना है कि ऐसी फिल्में राष्ट्र की युवा पीढ़ी की सोच पर सीधा प्रभाव डालती हैं, इसलिए उनमें पूर्ण सत्यता और ऐतिहासिक प्रमाणिकता अनिवार्य है।