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नगर परिषद की आय 60 लाख, कैसे होगा शहर का विकास
अमर उजाला ब्यूरो/रेवाड़ी
Updated Fri, 15 Jan 2016 12:14 AM IST
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विकास की बाट जा रही शहरी डेढ़ लाख की जनता को अभी समस्याओं से और जूझना पड़ सकता है। पिछले एक साल में नई ईंट शहर में नहीं लगी। क्योंकि परिषद की जितनी आमदनी हो रही है, उससे कहीं ज्यादा खर्च नगर परिषद कर्मचारियों के वेतन पर ही खर्च हो रहा है।
यानी यूं कहें कि जिन सुविधाओं को लेकर शहरवासी विभिन्न टैक्स भर रहे हैं, उससे कर्मचारी और अधिकारी केवल अपना काम चला रहे हैं। फिलहाल विभिन्न मदों के तहत नगर परिषद की आय प्रति माह लगभग 60 लाख रुपये हो रही है जबकि कर्मचारियों के वेतन पर उसे एक करोड़ रुपये देने होते हैं।
ऐसे में नप चालीस लाख का घाटा झेलकर कैसे शहर का विकास कर पाएगी। नप की यह हालत स्टांप ड्यूटी में भारी गिरावट व प्रॉपर्टी टैक्स के साथ अन्य कई कारणों से हो रही है।
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वहीं शहरी सरकार के बीच साल भर से चल रहीं खींचतान की वजह से भी कोई विकास कार्य नहीं हो पा रहा है। आलम यह है कि नप के कर्मचारियों का वेतन लोन लेकर चुकाया जा रहा है। शहर में तीन सौ से ज्यादा सफाई कर्मचारियों के वेतन पर ही तीस लाख से ज्यादा का खर्च होता है।
इन वजहों से आय आई जमीन पर ....
स्टांप ड्यूटी में चालीस फीसदी की गिरावट
लोगों द्वारा जमीन की खरीद-फरोख्त में लगने वाली स्टांप ड्यूटी में दो फीसदी हिस्सेदारी नप की होती है। एक साल पहले तक नप को हर 70-80 लाख रुपये की आमदनी इससे होती थी, लेकिन यह अब घटकर 35-40 लाख तक पहुंच गई है। क्योंकि ऑन लाइन किए जाने से रजिस्ट्री कम होने लगी है। जिसका साइड इफेक्ट हमारे शहर पर भी पड़ रहा है।
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प्रॉपर्टी टैक्स का कलेक्शन मात्र पचास फीसदी होना
नगर परिषद को प्रॉपर्टी टैक्स से ही लगभग दो करोड़ की सालान आमदनी होती है, लेकिन पिछले सालों से नप को केवल पचास फीसदी है प्रॉपर्टी टैक्स मिल रहा है। कई बार तारीख बढ़ाने के बावजूद भी प्रॉपर्टी टैक्स का कलेक्शन नहीं हो पा रहा है। नगर परिषद की ओर से छूट भी दी गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हाल तो यहां तक कि है कि नगर परिषद के पास इसका भी पूरा रिकॉर्ड नहीं है कि कुल कितना टैक्स बाकी है।
लाइसेंस एवं रेंट ब्रांच का लचीला रवैया
शहर में नगर परिषद क्षेत्र में व्यापार करने वाले सभी छोटे-बड़े व्यापारियों को लाइसेंस लेना होता है, जिसके लिए उसे नप के पास सालाना फीस जमा करनी होती है। वहीं हजारों व्यापारियों के बावजूद नप केवल गिनतीके लोगों का ही लाइसेंस बना पाई है। नप कर्मचारियों की सुस्ती के चलते पूरा रेंट तक नहीं वसूला जा रहा है।
शहरी सरकार की आपसी खींचतान
प्रदेश में भाजपा की सत्ता आते ही नप के पार्षद दो खेमों में बंटना भी नप का रसातल में जाने के बड़ा कारण है। एक साल से शहर के विकास कार्यो कें लिए शहरी सरकार ने कभी गंभीरता नहीं दिखाई। एक-दो जो बैठकें हुई, उसमें किसी ने बायकाट किया तो किसी ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाया। जिन पार्षदों को जनता ने चुना, उन्होंने भी कभी ठोस आवाज नहीं उठाई। मात्र कुर्सी की खींचतान में लगे हुए हैं। ऐसे में नप में की आय व खर्चों के बारे के कैसे चर्चा हो सकती थी।
वर्जन-
नप के पास संसाधनों की कमी नहीं है, जरूरी है उनके सदुपयोग की। आय बढ़ाने के लिए रेंट व लाइसेंस ब्रांच को कार्रवाई के आदेश दे दिए गए हैं। प्रॉपर्टी टैक्स आधा भी नहीं जमा हो पा रहा है, लोगों से अपील है कि वह इस टैक्स को भरकर शहर के विकास में सहयोग दें।
-डॉ. अरविंद बाल्याण, ईओ,नप
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यह बात सही है कि नप के खर्चे ज्यादा हैं, आय कम। पंचायत चुनाव के बाद सभी अधिकारियों व पार्षदों की मीटिंग बुलाकर व्यवस्था को पटरी पर लाया जाएगा।
-रणधीर सिंह कापड़ीवास, विधायक,रेवाड़ी
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यानी यूं कहें कि जिन सुविधाओं को लेकर शहरवासी विभिन्न टैक्स भर रहे हैं, उससे कर्मचारी और अधिकारी केवल अपना काम चला रहे हैं। फिलहाल विभिन्न मदों के तहत नगर परिषद की आय प्रति माह लगभग 60 लाख रुपये हो रही है जबकि कर्मचारियों के वेतन पर उसे एक करोड़ रुपये देने होते हैं।
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ऐसे में नप चालीस लाख का घाटा झेलकर कैसे शहर का विकास कर पाएगी। नप की यह हालत स्टांप ड्यूटी में भारी गिरावट व प्रॉपर्टी टैक्स के साथ अन्य कई कारणों से हो रही है।
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वहीं शहरी सरकार के बीच साल भर से चल रहीं खींचतान की वजह से भी कोई विकास कार्य नहीं हो पा रहा है। आलम यह है कि नप के कर्मचारियों का वेतन लोन लेकर चुकाया जा रहा है। शहर में तीन सौ से ज्यादा सफाई कर्मचारियों के वेतन पर ही तीस लाख से ज्यादा का खर्च होता है।
इन वजहों से आय आई जमीन पर ....
स्टांप ड्यूटी में चालीस फीसदी की गिरावट
लोगों द्वारा जमीन की खरीद-फरोख्त में लगने वाली स्टांप ड्यूटी में दो फीसदी हिस्सेदारी नप की होती है। एक साल पहले तक नप को हर 70-80 लाख रुपये की आमदनी इससे होती थी, लेकिन यह अब घटकर 35-40 लाख तक पहुंच गई है। क्योंकि ऑन लाइन किए जाने से रजिस्ट्री कम होने लगी है। जिसका साइड इफेक्ट हमारे शहर पर भी पड़ रहा है।
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प्रॉपर्टी टैक्स का कलेक्शन मात्र पचास फीसदी होना
नगर परिषद को प्रॉपर्टी टैक्स से ही लगभग दो करोड़ की सालान आमदनी होती है, लेकिन पिछले सालों से नप को केवल पचास फीसदी है प्रॉपर्टी टैक्स मिल रहा है। कई बार तारीख बढ़ाने के बावजूद भी प्रॉपर्टी टैक्स का कलेक्शन नहीं हो पा रहा है। नगर परिषद की ओर से छूट भी दी गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हाल तो यहां तक कि है कि नगर परिषद के पास इसका भी पूरा रिकॉर्ड नहीं है कि कुल कितना टैक्स बाकी है।
लाइसेंस एवं रेंट ब्रांच का लचीला रवैया
शहर में नगर परिषद क्षेत्र में व्यापार करने वाले सभी छोटे-बड़े व्यापारियों को लाइसेंस लेना होता है, जिसके लिए उसे नप के पास सालाना फीस जमा करनी होती है। वहीं हजारों व्यापारियों के बावजूद नप केवल गिनतीके लोगों का ही लाइसेंस बना पाई है। नप कर्मचारियों की सुस्ती के चलते पूरा रेंट तक नहीं वसूला जा रहा है।
शहरी सरकार की आपसी खींचतान
प्रदेश में भाजपा की सत्ता आते ही नप के पार्षद दो खेमों में बंटना भी नप का रसातल में जाने के बड़ा कारण है। एक साल से शहर के विकास कार्यो कें लिए शहरी सरकार ने कभी गंभीरता नहीं दिखाई। एक-दो जो बैठकें हुई, उसमें किसी ने बायकाट किया तो किसी ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाया। जिन पार्षदों को जनता ने चुना, उन्होंने भी कभी ठोस आवाज नहीं उठाई। मात्र कुर्सी की खींचतान में लगे हुए हैं। ऐसे में नप में की आय व खर्चों के बारे के कैसे चर्चा हो सकती थी।
वर्जन-
नप के पास संसाधनों की कमी नहीं है, जरूरी है उनके सदुपयोग की। आय बढ़ाने के लिए रेंट व लाइसेंस ब्रांच को कार्रवाई के आदेश दे दिए गए हैं। प्रॉपर्टी टैक्स आधा भी नहीं जमा हो पा रहा है, लोगों से अपील है कि वह इस टैक्स को भरकर शहर के विकास में सहयोग दें।
-डॉ. अरविंद बाल्याण, ईओ,नप
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यह बात सही है कि नप के खर्चे ज्यादा हैं, आय कम। पंचायत चुनाव के बाद सभी अधिकारियों व पार्षदों की मीटिंग बुलाकर व्यवस्था को पटरी पर लाया जाएगा।
-रणधीर सिंह कापड़ीवास, विधायक,रेवाड़ी