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Rewari News: संक्रांति पर लौटेगा गुल्ली-डंडा, गलियों में गूंजेगा बचपन

Mon, 12 Jan 2026 11:49 PM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी Updated Mon, 12 Jan 2026 11:49 PM IST
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Gulli-Danda will return on Sankranti, childhood will echo in the streets
फोटो: 14रेवाड़ी। सोलहराही तालाब में गुल्ली-डंडा खेलते युवा। संवाद
रेवाड़ी। मुंशी प्रेमचंद की कहानी गुल्ली डंडा आपको याद है? अगर नहीं तो इस मकर संक्रांति पर शहर और गांवों के खुले मैदानों में लोक-खेलों की वही रौनक लौटेगी।
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संक्रांति के मौके पर रेवाड़ी जिले में पारंपरिक खेलों की वापसी हो रही है। मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स के दौर में इस बार गुल्ली-डंडा युवाओं को मैदान की ओर खींचेगा। स्थानीय स्तर पर आयोजित मुकाबलों के जरिए लोक-खेलों को फिर से लोकप्रिय बनाने की पहल की जा रही है। इसमें बड़ी संख्या में बच्चों और युवाओं के शामिल होने की उम्मीद है।
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स्थानीय लोगों का मानना है कि गुल्ली-डंडा केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत है जो सामाजिक समरसता और पारंपरिक मूल्यों को सहेजने का काम करती है। संक्रांति नजदीक आते ही चौपालों, खेतों की मेड़ों और खुले मैदानों में युवा गुल्ली-डंडा खेलते नजर आते हैं। इसके लिए खास तौर पर लकड़ी की गुल्ली और डंडा खुद तैयार करते हैं।
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खेल के दौरान खिलाड़ी अपनी फुर्ती, संतुलन और निशानेबाजी का प्रदर्शन करते हैं। वहीं आसपास खड़े लोग तालियों और उत्साहवर्धन के साथ खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाते हैं। कई गांवों में इस मौके पर आपसी मुकाबले भी आयोजित करने की तैयारी है। इससे उत्सव का माहौल और अधिक रंगीन हो जाएगा।
त्योहार के साथ खेल का है विशेष महत्व

बुजुर्ग जयपाल व राजकिशोर ने बताया कि गुल्ली-डंडा जैसे खेल शारीरिक स्पूर्ति के साथ-साथ टीम भावना, धैर्य और अनुशासन भी सिखाते हैं। शिक्षाविद डॉ. बलबीर अग्रवाल ने बताया कि मकर संक्रांति का धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टि से विशेष महत्व है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। इससे मौसम में धीरे-धीरे गर्माहट आने लगती है। इसके साथ ही दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। गुल्ली डंडा जैसे पारंपरिक खेल खेले जाते हैं।


पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देना समय की जरूरत



दिनेश कपूर व रमेश सचदेवा ने बताया कि गुल्ली-डंडा जैसे पारंपरिक खेलों को बढ़ावा देना समय की जरूरत है ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहे। रेवाड़ी अंचल में दिखाई देने वाला यह उत्साह और परंपरा इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के बावजूद लोकसंस्कृति आज भी प्रासंगिक के बाद है।
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