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Rewari News: गहरा रहा भूजल संकट, डार्क जोन की तरफ बढ़ रहा रेवाड़ी जिला
Thu, 16 Mar 2023 11:52 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Thu, 16 Mar 2023 11:52 PM IST
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भूजल का स्तर गिरने की वजह से सूखा पड़ा हैंडपंप।
संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। जिले में भूजल स्तर हर साल लगातार गिरता जा रहा है। पिछले एक दशक के दौरान 300 फुट तक भूजल स्तर गिरा है। जिले के खोल क्षेत्र में पानी इतनी गहराई में जा चुका है कि यहां डार्क जोन घोषित करना पड़ा। कमोबेश यही स्थिति बावल और कोसली क्षेत्र की भी बनती जा रही है। आलम यह है कि हैंडपंप ठप हो गए हैं तथा कुएं भी सूख गए हैं।
जिले में जिस प्रकार की स्थिति बन रही है आगामी पीढ़ी पानी की बूंद-बूंद को तरसेगी। हर साल गहराता भू-जल स्तर चेतावनी दे रहा है कि पानी को बचाओ, लेकिन आमजन से लेकर प्रशासन भी नींद में सोया हुआ है। जिले में फिलहाल 400 से 500 फुट गहराई पर पानी उपलब्ध है। बता दें कि बावल, धारूहेड़ा और रेवाड़ी में तेजी से औद्योगीकरण हुआ है जिससे पानी की खपत बढ़ी है। खेती के पैटर्न में बदलाव अब रेवाड़ी जिले को ही भारी पड़ने लगा है। भूजल स्तर के लगातार नीचे जाने के कारण तलाशे गए तो पता चला कि बारिश में भूमिगत जल में जितना सुधार होता है। उससे कहीं ज्यादा उसका दोहन कर लिया जाता है।
रखरखाव के अभाव में सूखे जोहड़, तालाब और कुएं
जिले के किसान खेती के लिए 90 प्रतिशत भू जल का प्रयोग करते हैं। अधिकांश के पास ट्यूबवेल हैं, लेकिन पिछले सालों में ट्यूबवेल घटते भूजल स्तर के कारण ठप हो गए हैं। गर्मी के रफ्तार पकड़ते ही सूखते जोहड़, तालाब और कुएं इस बात के संकेत दे रहें हैं कि जलसंकट बढ़ेगा। जिले का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां कुएं का प्रयोग पानी के लिये होता होगा। ठप पड़े कुओं ही नहीं, जोहड़ों की हालत भी खराब होती जा रही है। जलाशय बनाने के नाम पर पंचायतों द्वारा करोड़ों रुपये हर साल खर्च किया जा रहा है। हालांकि उसका लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा। कई कुएं व जोहड़ तो केवल कूड़ा फेंकने के काम आ रहे हैं।
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अलग-अलग जगहों पर भू-जल की स्थिति
क्षेत्र का नाम-- -- भूजल की स्थिति
खोल-- -500 फुट
बावल-- -300 फुट
कोसली-- -250 फुट
रेवाड़ी-- -200 से 300 फुट
धारूहेड़ा-- -250 फुट
डहीना-- -400 फुट
भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। जिले में ट्यूबवेलों की संख्या बढ़ने से भूमि का दोहन अधिक हो रहा है। जिले से होकर गुजरने वाली नदियां भी बंद हो गई हैं। इसके अलावा जिले में खेती पूरी तरह ट्यूबवेलों पर ही निर्भर है। ड्रिप सिंचाई व स्प्रिंग सिंचाई बेहद कारगर साबित हो सकती है। इसके अलावा जलाश्यों में भी पानी को जमा किया जाए तो भी लाभदायक साबित हो सकते हैं।
-डॉ कंवर सिंह, भूजल वैज्ञानिक व रिसर्चकर्ता।
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रेवाड़ी। जिले में भूजल स्तर हर साल लगातार गिरता जा रहा है। पिछले एक दशक के दौरान 300 फुट तक भूजल स्तर गिरा है। जिले के खोल क्षेत्र में पानी इतनी गहराई में जा चुका है कि यहां डार्क जोन घोषित करना पड़ा। कमोबेश यही स्थिति बावल और कोसली क्षेत्र की भी बनती जा रही है। आलम यह है कि हैंडपंप ठप हो गए हैं तथा कुएं भी सूख गए हैं।
जिले में जिस प्रकार की स्थिति बन रही है आगामी पीढ़ी पानी की बूंद-बूंद को तरसेगी। हर साल गहराता भू-जल स्तर चेतावनी दे रहा है कि पानी को बचाओ, लेकिन आमजन से लेकर प्रशासन भी नींद में सोया हुआ है। जिले में फिलहाल 400 से 500 फुट गहराई पर पानी उपलब्ध है। बता दें कि बावल, धारूहेड़ा और रेवाड़ी में तेजी से औद्योगीकरण हुआ है जिससे पानी की खपत बढ़ी है। खेती के पैटर्न में बदलाव अब रेवाड़ी जिले को ही भारी पड़ने लगा है। भूजल स्तर के लगातार नीचे जाने के कारण तलाशे गए तो पता चला कि बारिश में भूमिगत जल में जितना सुधार होता है। उससे कहीं ज्यादा उसका दोहन कर लिया जाता है।
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रखरखाव के अभाव में सूखे जोहड़, तालाब और कुएं
जिले के किसान खेती के लिए 90 प्रतिशत भू जल का प्रयोग करते हैं। अधिकांश के पास ट्यूबवेल हैं, लेकिन पिछले सालों में ट्यूबवेल घटते भूजल स्तर के कारण ठप हो गए हैं। गर्मी के रफ्तार पकड़ते ही सूखते जोहड़, तालाब और कुएं इस बात के संकेत दे रहें हैं कि जलसंकट बढ़ेगा। जिले का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां कुएं का प्रयोग पानी के लिये होता होगा। ठप पड़े कुओं ही नहीं, जोहड़ों की हालत भी खराब होती जा रही है। जलाशय बनाने के नाम पर पंचायतों द्वारा करोड़ों रुपये हर साल खर्च किया जा रहा है। हालांकि उसका लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा। कई कुएं व जोहड़ तो केवल कूड़ा फेंकने के काम आ रहे हैं।
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अलग-अलग जगहों पर भू-जल की स्थिति
क्षेत्र का नाम
खोल
बावल
कोसली
रेवाड़ी
धारूहेड़ा
डहीना
भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। जिले में ट्यूबवेलों की संख्या बढ़ने से भूमि का दोहन अधिक हो रहा है। जिले से होकर गुजरने वाली नदियां भी बंद हो गई हैं। इसके अलावा जिले में खेती पूरी तरह ट्यूबवेलों पर ही निर्भर है। ड्रिप सिंचाई व स्प्रिंग सिंचाई बेहद कारगर साबित हो सकती है। इसके अलावा जलाश्यों में भी पानी को जमा किया जाए तो भी लाभदायक साबित हो सकते हैं।
-डॉ कंवर सिंह, भूजल वैज्ञानिक व रिसर्चकर्ता।