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पर्यावरण संरक्षण प्राचीन परंपरा रही है : डॉ. मंजू
Wed, 25 Feb 2026 10:28 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Wed, 25 Feb 2026 10:28 PM IST
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हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी पंचकूला के उपाध्यक्ष प्रोफेसर कुलदीप चंद अग्निहोत्री संबोधि
रेवाड़ी। मीरपुर स्थित इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की तरफ से भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण संरक्षण विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर असीम मिगलानी ने की। हरियाणा साहित्य और संस्कृति अकादमी पंचकूला के उपाध्यक्ष प्रोफेसर कुलदीप चंद अग्निहोत्री कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे
इस संगोष्ठी को ऑनलाइन एवं ऑफलाइन संचालित किया गया। 21 राज्यों के 25 विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों से 210 शोधपत्र प्राप्त हुए। इन्हें अलग-अलग समानांतर रूप से चलाए गए तकनीकी सत्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। संगोष्ठी संयोजिका और डॉ. मंजू पुरी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण प्राचीन परंपरा रही है।
दोहन, शोषण और वैभव, विलास की रीति नीति ने पर्यावरण को नष्ट कर दिया है। समाधान के लिए अपनी विरासत को संभालना होगा। हमने इस आयोजन में केवल साहित्य को ही नहीं बल्कि योग वाणिज्य कंप्यूटर साइंस और समाज विज्ञान जैसे विविध विषयों को एक धरातल पर लाने का प्रयास किया है। पर्यावरण चिंतन केवल एक वैज्ञानिक चिंता नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक दायित्व है।
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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर कुलदीप सिंह अग्निहोत्री ने कहा कि विश्वविद्यालय आसपास की बेटियों की उच्च शिक्षा के लिए वरदान साबित हुआ है। क्योंकि उन्हें घर से बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। कहा की हमें परंपराओं के मूल में जाने और मौलिक सोच रखने की जरूरत है। भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सभी पौराणिक ग्रंथ संस्कृत में हैं। इसलिए सभी विषयों में प्रवीणता तभी हासिल हो सकती है यदि संस्कृत भाषा को मुख्य धारा में शामिल किया जाए और हर विषय के संबंध में अलग-अलग भारतीय ज्ञान परंपराओं को खोजा जाए। मानव सभ्यता के इतिहास में ज्ञान और प्रकृति कभी अलग नहीं रहे।
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इस संगोष्ठी को ऑनलाइन एवं ऑफलाइन संचालित किया गया। 21 राज्यों के 25 विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों से 210 शोधपत्र प्राप्त हुए। इन्हें अलग-अलग समानांतर रूप से चलाए गए तकनीकी सत्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। संगोष्ठी संयोजिका और डॉ. मंजू पुरी ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण प्राचीन परंपरा रही है।
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दोहन, शोषण और वैभव, विलास की रीति नीति ने पर्यावरण को नष्ट कर दिया है। समाधान के लिए अपनी विरासत को संभालना होगा। हमने इस आयोजन में केवल साहित्य को ही नहीं बल्कि योग वाणिज्य कंप्यूटर साइंस और समाज विज्ञान जैसे विविध विषयों को एक धरातल पर लाने का प्रयास किया है। पर्यावरण चिंतन केवल एक वैज्ञानिक चिंता नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक दायित्व है।
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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर कुलदीप सिंह अग्निहोत्री ने कहा कि विश्वविद्यालय आसपास की बेटियों की उच्च शिक्षा के लिए वरदान साबित हुआ है। क्योंकि उन्हें घर से बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। कहा की हमें परंपराओं के मूल में जाने और मौलिक सोच रखने की जरूरत है। भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सभी पौराणिक ग्रंथ संस्कृत में हैं। इसलिए सभी विषयों में प्रवीणता तभी हासिल हो सकती है यदि संस्कृत भाषा को मुख्य धारा में शामिल किया जाए और हर विषय के संबंध में अलग-अलग भारतीय ज्ञान परंपराओं को खोजा जाए। मानव सभ्यता के इतिहास में ज्ञान और प्रकृति कभी अलग नहीं रहे।