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धोखाधड़ी के दोषी अंग्रेजी प्रवक्ता को 2 साल कैद
ब्यूरो /अमर उजाला
Updated Fri, 13 Jan 2017 12:47 AM IST
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न्यायाधीश योगेश चौधरी की कोर्ट ने मार्किंग ड्यूटी और स्कूल से गैर हाजिर रहते हुए वेतन लेने के मामले में धोखाधड़ी के दोषी अंग्रेजी प्रवक्ता को 2 साल कैद की सजा सुनाई है। उस पर 9 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया गया है। गांव खड़गवास निवासी एक सेवानिवृत्त अध्यापक ओमप्रकाश यादव ने धोखाधड़ी का ये मामला 24 जून 2011 को थाना मॉडल टाउन में दर्ज कराया था। दोषी प्रवक्ता भाड़ावास रोड स्थित एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाते थे।
ओमप्रकाश यादव का आरोप था कि वर्ष 2010 में भाड़ावास रोड स्थित राजकीय बाल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में अंग्रेजी प्रवक्ता के तौर पर कार्यरत और गांव भुरथला-जाहिदपुर निवासी सतेन्द्र सिंह ने न तो मार्किंग ड्यूटी में हिस्सा लिया था और न ही स्कूल में उपस्थित रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने 15 दिन का वेतन ले लिया था। 24 जून 2011 को सतेन्द्र के खिलाफ मॉडल टाउन थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया। यह मामला पुलिस के इकॉनॉमिकल सेल को जांच के लिए सौंप दिया गया था।
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फर्जी निकला था हाजिरी का प्रमाण
सतेन्द्र सिंह ने अपने बचाव में पुलिस को एक उपस्थिति प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया। इस पर तत्कालीन प्राचार्य मुकेश यादव के हस्ताक्षर थे। इस प्रमाण पत्र को ओमप्रकाश ने फर्जी बता प्राचार्य के हस्ताक्षरों की जांच कराने की मांग की थी। प्रमाण पत्र प्राचार्य के असली हस्ताक्षरों के लिए एफएसएल जांच के लिए भेजा गया तो असलियत उजागर हुए और हस्ताक्षर फर्जी पाए गए।
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ओमप्रकाश यादव का आरोप था कि वर्ष 2010 में भाड़ावास रोड स्थित राजकीय बाल वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में अंग्रेजी प्रवक्ता के तौर पर कार्यरत और गांव भुरथला-जाहिदपुर निवासी सतेन्द्र सिंह ने न तो मार्किंग ड्यूटी में हिस्सा लिया था और न ही स्कूल में उपस्थित रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने 15 दिन का वेतन ले लिया था। 24 जून 2011 को सतेन्द्र के खिलाफ मॉडल टाउन थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया। यह मामला पुलिस के इकॉनॉमिकल सेल को जांच के लिए सौंप दिया गया था।
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फर्जी निकला था हाजिरी का प्रमाण
सतेन्द्र सिंह ने अपने बचाव में पुलिस को एक उपस्थिति प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया। इस पर तत्कालीन प्राचार्य मुकेश यादव के हस्ताक्षर थे। इस प्रमाण पत्र को ओमप्रकाश ने फर्जी बता प्राचार्य के हस्ताक्षरों की जांच कराने की मांग की थी। प्रमाण पत्र प्राचार्य के असली हस्ताक्षरों के लिए एफएसएल जांच के लिए भेजा गया तो असलियत उजागर हुए और हस्ताक्षर फर्जी पाए गए।
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