{"_id":"5a8881124f1c1b514a8b9e4b","slug":"91518895378-rewari-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अभिभावकों का आइना हैं बच्चे : कुलप्रीत यादव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अभिभावकों का आइना हैं बच्चे : कुलप्रीत यादव
Updated Sun, 18 Feb 2018 12:52 AM IST
विज्ञापन
अभिभावकों का आइना हैं बच्चे : कुलप्रीत यादव
अमर उजाला ब्यूरो
रेवाड़ी।
बच्चे ही अभिभावकों का आइना होते हैं, उन पर कुछ थोपने की बजाय उनके स्तर पर जाकर उन्हें समझने की आवश्यकता है। यह विचार अंग्रेजी उपन्यासकार कुलप्रीत यादव ने व्यक्त किए। वह जैन पब्लिक स्कूल में बच्चों की परवरिश (पैरेंटिंग) विषय पर आयोजित कार्यशाला में अभिभावकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को मोबाइल और टीवी से हटाकर पुस्तकों से जोड़ने व नैतिक कहानियों के उदाहरण समझाने की अपील की।
स्कूल के सभागार विद्या शरणालय में आयोजित कार्यशाला में पहुंचने पर मुख्य अध्यापिका विजय गुप्ता ने उपन्यासकार यादव का स्वागत किया। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के अभिभावकों को पैरेंटिंग के सुझाव देकर उन्होंने कहा कि आज सभी अभिभावकों के सामने यही प्रश्न है कि अपने बच्चे को लायक कैसे बनाएं। इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी सोच सकारात्मक करनी होगी कि हमारा बच्चा दुनिया में सबसे अलग है। जिस प्रकार भगवान ने सभी के थम एक्सप्रेशन अलग बनाए हैं, उसी प्रकार आपका बच्चा भी सर्वश्रेष्ठ है। बच्चे माता-पिता का आइना होते हैं, इसलिए उसके सर्वांगीण विकास में अभिभावकों की भूमिका भी सबसे महत्वपूर्ण है। हम उसे अच्छी शिक्षा के साथ-साथ सकारात्मक सोच, संतुलित आहार, अच्छा स्वास्थ्य एवं रचनात्मकता की दिशा में भी मोडे़ं। अपने बच्चे की किसी से तुलना करने की बजाय उसके गुणों को उभारकर सच्चे मार्गदर्शक बनें। बच्चों को अधिक बंदिश में रखने की बजाय उसे स्वयं सीखने के लिए प्रेरित करें। इसके लिए कहानी की पुस्तकें सच्ची सहायक सिद्ध हो सकती है। अभिभावकों की ओर से बच्चों के जिद करने, उनके न पढ़ने, गुस्सा करने, बात न मानने, हर बात में अपनी शर्त थोपने आदि के प्रश्नों का उत्तर देकर कहा कि बच्चों को अधिक से अधिक समय दें। उसे टीवी व मोबाइल की दुनिया से बाहर निकालकर पुस्तकों से जोड़ें और यात्रा पर ले जाएं, ताकि प्राकृतिक रूप से वह स्वयं सीखने के लिए उत्साहित हो। पंचतंत्र, रामायण, महाभारत, हैरीपॉटर आदि पुस्तकों से बच्चों को जोडे़ं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माता-पिता धैर्य रखें और अपने जमाने से तुलना करने की बजाय उसे वर्तमान में जीने के लिए तैयार करें। उसे छोटे-छोटे घर के काम स्वयं करने की आदत डालें और उसकी असफलता पर भी बाहों में भरकर प्रोत्साहित करेंगे तो वह स्वयं अपनी कमियों को जानकर अच्छा करने का प्रयास करेगा।
विज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो
रेवाड़ी।
बच्चे ही अभिभावकों का आइना होते हैं, उन पर कुछ थोपने की बजाय उनके स्तर पर जाकर उन्हें समझने की आवश्यकता है। यह विचार अंग्रेजी उपन्यासकार कुलप्रीत यादव ने व्यक्त किए। वह जैन पब्लिक स्कूल में बच्चों की परवरिश (पैरेंटिंग) विषय पर आयोजित कार्यशाला में अभिभावकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को मोबाइल और टीवी से हटाकर पुस्तकों से जोड़ने व नैतिक कहानियों के उदाहरण समझाने की अपील की।
स्कूल के सभागार विद्या शरणालय में आयोजित कार्यशाला में पहुंचने पर मुख्य अध्यापिका विजय गुप्ता ने उपन्यासकार यादव का स्वागत किया। प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के अभिभावकों को पैरेंटिंग के सुझाव देकर उन्होंने कहा कि आज सभी अभिभावकों के सामने यही प्रश्न है कि अपने बच्चे को लायक कैसे बनाएं। इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी सोच सकारात्मक करनी होगी कि हमारा बच्चा दुनिया में सबसे अलग है। जिस प्रकार भगवान ने सभी के थम एक्सप्रेशन अलग बनाए हैं, उसी प्रकार आपका बच्चा भी सर्वश्रेष्ठ है। बच्चे माता-पिता का आइना होते हैं, इसलिए उसके सर्वांगीण विकास में अभिभावकों की भूमिका भी सबसे महत्वपूर्ण है। हम उसे अच्छी शिक्षा के साथ-साथ सकारात्मक सोच, संतुलित आहार, अच्छा स्वास्थ्य एवं रचनात्मकता की दिशा में भी मोडे़ं। अपने बच्चे की किसी से तुलना करने की बजाय उसके गुणों को उभारकर सच्चे मार्गदर्शक बनें। बच्चों को अधिक बंदिश में रखने की बजाय उसे स्वयं सीखने के लिए प्रेरित करें। इसके लिए कहानी की पुस्तकें सच्ची सहायक सिद्ध हो सकती है। अभिभावकों की ओर से बच्चों के जिद करने, उनके न पढ़ने, गुस्सा करने, बात न मानने, हर बात में अपनी शर्त थोपने आदि के प्रश्नों का उत्तर देकर कहा कि बच्चों को अधिक से अधिक समय दें। उसे टीवी व मोबाइल की दुनिया से बाहर निकालकर पुस्तकों से जोड़ें और यात्रा पर ले जाएं, ताकि प्राकृतिक रूप से वह स्वयं सीखने के लिए उत्साहित हो। पंचतंत्र, रामायण, महाभारत, हैरीपॉटर आदि पुस्तकों से बच्चों को जोडे़ं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माता-पिता धैर्य रखें और अपने जमाने से तुलना करने की बजाय उसे वर्तमान में जीने के लिए तैयार करें। उसे छोटे-छोटे घर के काम स्वयं करने की आदत डालें और उसकी असफलता पर भी बाहों में भरकर प्रोत्साहित करेंगे तो वह स्वयं अपनी कमियों को जानकर अच्छा करने का प्रयास करेगा।
विज्ञापन