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कॉलेज मुखिया और आधारभूत ढांचे के अभाव में शिक्षा लेने को मजबूर 13 हजार विद्यार्थी
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जाटूसाना स्थित स्कूल की कक्षाओं में भरा पानी।
- फोटो : Rewari
रेवाड़ी। कॉलेजों के मुखिया और आधारभूत ढांचे के अभाव में 13 हजार विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। 11 सरकारी कॉलेजों में से महज कोसली राजकीय कॉलेज में डॉ. सुधीर यादव व खरखड़ा कॉलेज में रेणु हुड्डा स्थायी प्रिंसिपल हैं। गुरुग्राम कॉलेेजों के प्रिंसिपल रेवाड़ी के कॉलेजों का अतिरिक्त कार्यभार देख रहे हैं।
बता दें कि जाटूसाना, रेवाड़ी व बावल कॉलेेजों में तीन साल से तीन-तीन कमरों में कक्षाएं चल रही हैं। इन कॉलेजों में पढ़ने वाले एक हजार से अधिक विद्यार्थी इसी सत्र में बगैर लैब व लाइब्रेरी देखे स्नातक की पढ़ाई पूरी कर लेंगे। इन कॉलेजों के हालात ऐसे हैं कि पेयजल से लेकर शौचालय तक की ठीक से व्यवस्था नहीं है। कोएड कॉलेज होने के चलते बेटियों के लिए कॉमन रूम तक नहीं है। ऐसे महज तीन कॉलेज नहीं हैं, जिनके हालात बदतर हैं। जिले के सबसे बड़े सरकारी कॉलेज सेक्टर-18 में 6 माह से ज्यादा प्रिंसिपल नहीं है। गुरुग्राम के एक कॉलेज के प्रिंसिपल को अतिरिक्त प्रभार दिया हुआ है। यहां पर पेयजल से लेकर शौचालय की बड़ी समस्याएं हैं। छात्राएं प्रदर्शन तक कर चुकी हैं। बावजूद इसके कोई समाधान नहीं हुआ है। ऐसे में सवाल है कि जब कॉलेजों में मुखिया ही नहीं है तो बुनियादी ढांचे में सुधार पर काम होने की उम्मीद करना बेमानी है।
स्कूल में हुआ जलभराव तो करना पड़ा बंद, प्राइमरी स्कूल में चल रहा कॉलेज
बीते तीन साल से जाटूसाना में कॉलेज स्कूल के तीन कमरों में चल रहा है। बीते 10 दिन स्कूल में पानी भरने के चलते स्कूल बंद कर दिया गया है। कॉलेजों में परीक्षाएं चल रही हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को पास के एक प्राइमरी स्कूल में परीक्षाएं दिलानी पड़ रही है। हालात ऐसे हैं कि स्कूल में चल रहे कॉलेज के स्टाफ को दो माह से वेतन तक मिलने में परेशानी आ रही थी। क्योंकि प्रिंसिपल की जिम्मेदारी किसी के पास नहीं थी। वहीं दूसरी ओर कॉलेज व स्कूल का शौचालय कॉमन होने के चलते आए दिन परेशानी खड़ी होती है। लैब, लाइब्रेरी व पूरे शिक्षक होना तो दूर की बात है। इसके अलावा बावल कॉलेज भी स्कूल के कमरों में चल रहा है। वहीं रेवाड़ी में राजकीय महाविद्यालय भी भाड़ावास गेट के पास स्थित स्कूल में संचालित है। बुनियादी सुविधाएं तो दूर यहां शिक्षक तक पूरे नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि घोषणा कर क्यों विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
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एक भी कॉलेज के पास ए ग्रेड नहीं
शिक्षा विभाग की ओर से नई शिक्षा नीति लागू कर आमूल-चूल बदलाव के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि जिले में ए ग्रेड होना तो दूूर सी ग्रेड से ऊपर एक भी कॉलेज नहीं है। लैब से लेकर साइंस फैकल्टी भी महज एकाध में हैं। ऐसे में किस तरह से संसाधनों के अभाव में युवा प्रतिस्पर्धा के दौर में दिल्ली व अन्य मेट्रो सिटी के विद्यार्थियों के सामने टिक पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। जिले में उच्च शिक्षा के नाम पर 11 सरकारी, 4 सरकारी सहायता प्राप्त व तीन सेल्फ फाइनेंस कॉलेज हैं। नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रीएडेशन काउंसिल (एनएएसी) की ओर से जारी विश्वविद्यालय व कॉलेजों की रैंक की बात करें तो जिले का एक भी कॉलेज ए श्रेणी में नहीं है। अधिकतर कॉलेजों का जहां सर्टिफिकेशन ही आज तक नहीं हुआ, वहीं जिनको रैंक मिली वे सी श्रेणी में हैं। सी- श्रेणी वाले कॉलेजों में नाहड़, कंवाली व राजकीय कॉलेज बावल शामिल हैं। बाकी अन्य कॉलेजों की कोई रैंक ही नहीं है।
40 छात्रों पर एक प्रोफेसर जरूरी
1976 में स्थापित कंवाली कॉलेज अपनी उच्च क्वालिटी की शिक्षा के लिए जाना जाता है। यहां बीएससी नॉन-मेडिकल के तीन बैच चल रहे हैं। यहां पर फिजिक्स में 02, मैथ में 03 एवं केमेस्ट्री में 04 प्रोफेसर तैनात हैं। जबकि प्रत्येक विषय पर कम से कम चार प्रोफेसर होना जरूरी है। शिक्षाविदों के अनुसार क्वालिटी एजुकेशन के लिए एक प्रोफेसर एक महीने में 30 पीरियड ले सकता है। कंवाली कॉलेज में फिजिक्स के लिए चार प्रोफेसर की पोस्ट प्रस्तावित है, लेकिन भर्ती लंबे समय नहीं हुए हैं। नियमानुसार 40 विद्यार्थियों पर एक प्रोफेसर होना जरूरी है।
सेक्टर-18 में शिक्षक एक, जरूरत 12 की
रेवाड़ी महिला कॉलेज में मेडिकल व नॉन मेडिकल की कक्षाएं चल रही हैं। 480 बच्चों पर फिजिक्स के 01, केमेस्ट्री के 03, जुलोजी के 01 एवं मैथ के तीन शिक्षक तैनात हैं। जबकि यहां पर लोड के हिसाब से कम एक सब्जेक्ट के लिए 12 प्रोफेसर की नियुक्ति जरूरी है। महिला राजकीय कॉलेज पाली में बीएससी नॉन-मेडिकल के तीन बैच पर फिजिक्स-1, मैथ-3 एवं केमेस्ट्री-4 शिक्षकों की नियुक्ति ही हो पाई है।
रिटायर्ड प्रिंसिपल प्रो. आरएस यादव ने कहा कि जिम्मेदारों की ओर से वादे करना अलग बात है और जमीन पर व्यवस्थाओं को मजबूत करना अलग बात है। बावल में महिला कॉलेज, रेवाड़ी व जाटूसाना के कॉलेजों के बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं। ऐसे में विद्यार्थियों के लिए भवन तक उपलब्ध नहीं होना गंभीर विषय है। यह बात सही है कि किसी भी व्यवस्था को चलाने के लिए मुखिया जरूरी होता है। उसके अभाव में धक्के से व्यवस्थाएं चल रही हैं। सरकारी को घोषणाओं की बजाय बुनियादी स्तर पर काम करना होगा।
इधर, कोसली राजकीय कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. सुधीर यादव कुछ दिन पहले ही चार कॉलेजों की जिम्मा मुझे सौंपा गया है। कोसली व खरखड़ा में दो स्थायी प्रिंसिपल हैं। कुछ कॉलेजों का जिम्मा गुरुग्राम के प्रिंसिपल को दिया गया है। हमारी ओर से व्यवस्थाओं बेहतर करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। छात्रों के हित में सभी प्रयास किए जाएंगे।
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बता दें कि जाटूसाना, रेवाड़ी व बावल कॉलेेजों में तीन साल से तीन-तीन कमरों में कक्षाएं चल रही हैं। इन कॉलेजों में पढ़ने वाले एक हजार से अधिक विद्यार्थी इसी सत्र में बगैर लैब व लाइब्रेरी देखे स्नातक की पढ़ाई पूरी कर लेंगे। इन कॉलेजों के हालात ऐसे हैं कि पेयजल से लेकर शौचालय तक की ठीक से व्यवस्था नहीं है। कोएड कॉलेज होने के चलते बेटियों के लिए कॉमन रूम तक नहीं है। ऐसे महज तीन कॉलेज नहीं हैं, जिनके हालात बदतर हैं। जिले के सबसे बड़े सरकारी कॉलेज सेक्टर-18 में 6 माह से ज्यादा प्रिंसिपल नहीं है। गुरुग्राम के एक कॉलेज के प्रिंसिपल को अतिरिक्त प्रभार दिया हुआ है। यहां पर पेयजल से लेकर शौचालय की बड़ी समस्याएं हैं। छात्राएं प्रदर्शन तक कर चुकी हैं। बावजूद इसके कोई समाधान नहीं हुआ है। ऐसे में सवाल है कि जब कॉलेजों में मुखिया ही नहीं है तो बुनियादी ढांचे में सुधार पर काम होने की उम्मीद करना बेमानी है।
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स्कूल में हुआ जलभराव तो करना पड़ा बंद, प्राइमरी स्कूल में चल रहा कॉलेज
बीते तीन साल से जाटूसाना में कॉलेज स्कूल के तीन कमरों में चल रहा है। बीते 10 दिन स्कूल में पानी भरने के चलते स्कूल बंद कर दिया गया है। कॉलेजों में परीक्षाएं चल रही हैं। ऐसे में विद्यार्थियों को पास के एक प्राइमरी स्कूल में परीक्षाएं दिलानी पड़ रही है। हालात ऐसे हैं कि स्कूल में चल रहे कॉलेज के स्टाफ को दो माह से वेतन तक मिलने में परेशानी आ रही थी। क्योंकि प्रिंसिपल की जिम्मेदारी किसी के पास नहीं थी। वहीं दूसरी ओर कॉलेज व स्कूल का शौचालय कॉमन होने के चलते आए दिन परेशानी खड़ी होती है। लैब, लाइब्रेरी व पूरे शिक्षक होना तो दूर की बात है। इसके अलावा बावल कॉलेज भी स्कूल के कमरों में चल रहा है। वहीं रेवाड़ी में राजकीय महाविद्यालय भी भाड़ावास गेट के पास स्थित स्कूल में संचालित है। बुनियादी सुविधाएं तो दूर यहां शिक्षक तक पूरे नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि घोषणा कर क्यों विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
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एक भी कॉलेज के पास ए ग्रेड नहीं
शिक्षा विभाग की ओर से नई शिक्षा नीति लागू कर आमूल-चूल बदलाव के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि जिले में ए ग्रेड होना तो दूूर सी ग्रेड से ऊपर एक भी कॉलेज नहीं है। लैब से लेकर साइंस फैकल्टी भी महज एकाध में हैं। ऐसे में किस तरह से संसाधनों के अभाव में युवा प्रतिस्पर्धा के दौर में दिल्ली व अन्य मेट्रो सिटी के विद्यार्थियों के सामने टिक पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। जिले में उच्च शिक्षा के नाम पर 11 सरकारी, 4 सरकारी सहायता प्राप्त व तीन सेल्फ फाइनेंस कॉलेज हैं। नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रीएडेशन काउंसिल (एनएएसी) की ओर से जारी विश्वविद्यालय व कॉलेजों की रैंक की बात करें तो जिले का एक भी कॉलेज ए श्रेणी में नहीं है। अधिकतर कॉलेजों का जहां सर्टिफिकेशन ही आज तक नहीं हुआ, वहीं जिनको रैंक मिली वे सी श्रेणी में हैं। सी- श्रेणी वाले कॉलेजों में नाहड़, कंवाली व राजकीय कॉलेज बावल शामिल हैं। बाकी अन्य कॉलेजों की कोई रैंक ही नहीं है।
40 छात्रों पर एक प्रोफेसर जरूरी
1976 में स्थापित कंवाली कॉलेज अपनी उच्च क्वालिटी की शिक्षा के लिए जाना जाता है। यहां बीएससी नॉन-मेडिकल के तीन बैच चल रहे हैं। यहां पर फिजिक्स में 02, मैथ में 03 एवं केमेस्ट्री में 04 प्रोफेसर तैनात हैं। जबकि प्रत्येक विषय पर कम से कम चार प्रोफेसर होना जरूरी है। शिक्षाविदों के अनुसार क्वालिटी एजुकेशन के लिए एक प्रोफेसर एक महीने में 30 पीरियड ले सकता है। कंवाली कॉलेज में फिजिक्स के लिए चार प्रोफेसर की पोस्ट प्रस्तावित है, लेकिन भर्ती लंबे समय नहीं हुए हैं। नियमानुसार 40 विद्यार्थियों पर एक प्रोफेसर होना जरूरी है।
सेक्टर-18 में शिक्षक एक, जरूरत 12 की
रेवाड़ी महिला कॉलेज में मेडिकल व नॉन मेडिकल की कक्षाएं चल रही हैं। 480 बच्चों पर फिजिक्स के 01, केमेस्ट्री के 03, जुलोजी के 01 एवं मैथ के तीन शिक्षक तैनात हैं। जबकि यहां पर लोड के हिसाब से कम एक सब्जेक्ट के लिए 12 प्रोफेसर की नियुक्ति जरूरी है। महिला राजकीय कॉलेज पाली में बीएससी नॉन-मेडिकल के तीन बैच पर फिजिक्स-1, मैथ-3 एवं केमेस्ट्री-4 शिक्षकों की नियुक्ति ही हो पाई है।
रिटायर्ड प्रिंसिपल प्रो. आरएस यादव ने कहा कि जिम्मेदारों की ओर से वादे करना अलग बात है और जमीन पर व्यवस्थाओं को मजबूत करना अलग बात है। बावल में महिला कॉलेज, रेवाड़ी व जाटूसाना के कॉलेजों के बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं। ऐसे में विद्यार्थियों के लिए भवन तक उपलब्ध नहीं होना गंभीर विषय है। यह बात सही है कि किसी भी व्यवस्था को चलाने के लिए मुखिया जरूरी होता है। उसके अभाव में धक्के से व्यवस्थाएं चल रही हैं। सरकारी को घोषणाओं की बजाय बुनियादी स्तर पर काम करना होगा।
इधर, कोसली राजकीय कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. सुधीर यादव कुछ दिन पहले ही चार कॉलेजों की जिम्मा मुझे सौंपा गया है। कोसली व खरखड़ा में दो स्थायी प्रिंसिपल हैं। कुछ कॉलेजों का जिम्मा गुरुग्राम के प्रिंसिपल को दिया गया है। हमारी ओर से व्यवस्थाओं बेहतर करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। छात्रों के हित में सभी प्रयास किए जाएंगे।