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Panipat News: तीज पर दिनभर गूंजते थे पारंपरिक गीत
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परढ़ाना गांव की 50 वर्षीय कविता रानी ने बताया कि तीज के लिए महिलाओं में कई दिन पहले ही चाव चढ़ जाता था। वे इस दिन सुबह ही काम निपटाकर झूला झूलने लग जाती थीं। देर शाम तक झूला झूलती थीं। तीज के दिन पूरा आंगन और आस पड़ोस गीतों से गूंज उठते थे। महिलाएं ऊंचे-ऊंचे स्वर में गीत गाती थी। कोई तीज की खुशी तो कोई पेड़ के पत्ते के साथ सासू का नाक तोड़कर लाने का गीत गाती थीं। आज न तो झूले डालतीं और न ही कोई गीत गाती हैं। नई पीढ़ी की महिलाओं को तो गीत आते भी नहीं। वे फिल्मी गीतों पर रील बनाने में मस्त हैं। युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और सभ्यता भूल गई है।
अब झूला झूलने का भी समय नहीं
अंसल की 40 वर्षीय श्वेता मिगलानी ने बताया कि समय के साथ सब कुछ बदल गया है। वे अपनी मां और दादी को तीज के दिन झूल झूलती देखती थीं। मेरी दादी मेरी मां को सुबह कुछ काम नहीं करने देती थी। उनको झूला झूलने जाने के लिए कह देती थीं। वे भी काम में सहयोग करने का प्रयास करती थी। आज झूला झूलने का भी समय नहीं रहा। सामाजिक रूप से दिखावा रह गया है।
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अब झूला झूलने का भी समय नहीं
अंसल की 40 वर्षीय श्वेता मिगलानी ने बताया कि समय के साथ सब कुछ बदल गया है। वे अपनी मां और दादी को तीज के दिन झूल झूलती देखती थीं। मेरी दादी मेरी मां को सुबह कुछ काम नहीं करने देती थी। उनको झूला झूलने जाने के लिए कह देती थीं। वे भी काम में सहयोग करने का प्रयास करती थी। आज झूला झूलने का भी समय नहीं रहा। सामाजिक रूप से दिखावा रह गया है।
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