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साधू का जीवन जितना सरल, उतनी शीघ्रता से होगा आत्मकल्याण : अरुण चंद्र महाराज

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 26 Aug 2025 12:48 AM IST
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The simpler the life of a sadhu, the quicker his self-welfare will happen: Arun Chandra Maharaj
अग्रवाल मंडी में प्रवचन सुनते श्रावक। स्रोत : स्वयं

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अग्रवाल मंडी जैन स्थानक में पर्युषण पर्व के छठे दिन अरुण मुनि ने शिष्य अभिषेक मुनि व अभिनंदन मुनि के साथ दिया प्रवचन
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अग्रवाल मंडी जैन स्थानक में पर्युषण पर्व के छठे दिन अरुण मुनि ने अपने शिष्यों अभिषेक मुनि व अभिनंदन मुनि के साथ प्रवचन दिया। अरुण मुनि ने कहा कि साधू का जीवन जितना सरल और सहज होगा, आत्मकल्याण उतनी शीघ्रता से संभव होगा। स्थानकवासी संत तप और संयम की साधना में जीवन व्यतीत करते हैं। उनके पास केवल झोली, और ओगा होता है और जीवन त्यागमय होता है। महावीर स्वामी के 14 हजार शिष्यों में गौतम स्वामी सबसे बड़े हैं और उनका विशेष महत्व है।
भगवान महावीर के मोक्ष होने के बाद ही गौतम को भी केवल ज्ञान हो गया था और फिर मोक्ष प्राप्त कर लिया था। मुनि ने ऐवंता कुमार की प्रेरणादायी कथा का भावपूर्ण वर्णन किया। केवल आठ वर्ष की आयु में कुमार ने श्रद्धाभाव से गौतम स्वामी को आहार अर्पित किया और उनके साथ भगवान महावीर के चरणों में पहुंचे। प्रभु के दर्शन से उनमें वैराग्य जागृत हुआ और माता-पिता की अनुमति से उन्होंने दीक्षा ग्रहण की। उस नगर में इस दीक्षा का समाचार फैलते ही वातावरण उत्सवमय हो गया। पालकी में बैठे ऐवंता कुमार और उनकी माता की भावनाओं से भक्ति रस छा गया। माता के मुख से निकला गीत चमकेगा अब गगन में, मेरी आंख का सितारा, बन जाएगा प्रभु का, जो अब तक था हमारा।
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जिनवाणी सबके लिए कल्याणकारी : रोहित मुनि
राजाखेड़ी गांव में रोहित मुनि ने पर्युषण पर्व पर प्रवचन दिया। मुनि ने बताया कि जिनवाणी सबके लिए कल्याणकारी है और जीवन को सही दिशा प्रदान करती है। शुभ भाव होंगे तो शुभ परिणाम ही प्राप्त होगा और अशुभ भावों से अशुभ ही मिलेगा। द्वेष, नफरत और ईर्ष्या जीवन का सबसे बड़ा अवरोध है। पर्यूषण पर्व का वास्तविक उद्देश्य आत्मशुद्धि है। महापुरुषों की जीवनियां सुनने से हमें त्याग, संयम और साधना का सही मार्ग समझ में आ सकता है। इसलिए हमें महापुरुषों की जीवन गाथा सुननी चाहिए। छोटे-बड़े नियमों का पालन ही आत्मिक शांति देता है।
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पर्यूषण काल में स्नान का त्याग, बाहर घूमने का त्याग, सिंगार का त्याग, कच्ची पक्की हरि का त्याग, गुस्से और गाली-गलौच से बचना, प्रतिक्रमण जैसे नियम आत्मसंयम की ओर ले जाते हैं। जब पूरा परिवार धर्म-ध्यान में बैठता है तो घर भी मंदिर जैसा पवित्र बन जाता है। पर्यूषण पर्व को केवल धार्मिक उत्सव न मानें बल्कि आत्मा की शुद्धि और साधना का अवसर बनाएं।
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