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खुद को जलाकर बच्चों का जीवन कर रहे रोशन
अमर उजाला ब्यूरो, पानीपत।
Updated Mon, 05 Sep 2016 12:02 AM IST
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अध्यापक
- फोटो : पानीपत
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पानीपत। गुरु गोबिंद दोऊ खड़े काके लागो पाय, बलिहारी गुरु आपने जिन गोबिंद दियो मिलाय। कवि की इन पंक्तियों में गुरु को भगवान से भी बड़ा दर्जा दिया गया है। वहीं हैं जिन्होंने भगवान को उनसे मिलवाया है। आज शिक्षक दिवस है। अमर उजाला माई सिटी ने जिले के ऐसे गुरु व शिष्यों से बात की। जो विकट परिस्थितियों में बच्चों का सहारा बने और उनको आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।
केमिस्ट्री टीचर ने घर व स्कूल में बनाई लाइब्रेरी, कई को दिखाया रास्ता
आर्य सीसे स्कूल जीटी रोड में केमिस्ट्री लेक्चरर डॉ. आरके गर्ग वर्तमान में एक बेहतरीन गुरु की जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए अपने स्तर पर अपने मकान और स्कूल में लाइब्रेरी तैयार की है। घर पर करीब 400 और स्कूल स्थित लाइब्रेरी में करीब 150 किताब केमिस्ट्री की हैं। उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थी जवाहर लाल नेहरू नेशनल साइंस एग्जीबिशन में आठ बार उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर चुके हैं। डॉ. गर्ग को 2005 में शिक्षक दिवस पर स्टेट अवार्ड से सम्मानित भी किया जा चुका है। डॉ. अजय गर्ग ने बताया कि वे कक्षा में पहले बच्चों को खुद समझते हैं, उसके बाद ही उन्हें समझाते हैं।
वे हमेशा अपने विषय के टॉपिक को बोर्ड पर स्पष्ट लिखते हैं। इसके बाद विद्यार्थियों को उसका अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हैं। बच्चे कई बार बोला हुआ ठीक से नहीं समझ पाते। इसलिए वे सभी टॉपिक को लिखकर समझाते हैं। जरूरतमंद बच्चों को स्कूल में खाली पीरियड या फिर छुट्टी के बाद घर पर समझाते हैं।
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एमबीबीएस डॉक्टर चला रहीं चेतना स्कूल
एमबीबीएस डॉक्टर वंदना पाहुजा ऐसी चिकित्सक हैं, जो मरीजों का इलाज करने के साथ ही चेतना स्कूल और सिलाई केंद्र भी संचालित कर रही है। डॉ. वंदना पाहुजा के चेतना स्कूल में 140 बच्चे प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा सिलाई सेंटर पर 15 से 20 लड़कियों सिलाई सिखाती हैं। वे दोनों ही केंद्रों का खर्च वह खुद वहन करती हैं। डॉ. वंदना पाहुजा ने बताया कि वे चेतना स्कूलों में अक्सर जाती रहती थीं। उनको बच्चों के बीच में जाकर खुशी महसूस होती थी। उन्होंने इसी सोच के साथ चेतना स्कूल शुरू किया। स्कूल में शुरुआत में 40 बच्चे थे।
इस पर वे कॉलोनी में रहने वाले फैक्टरी श्रमिकों के बीच र्गइं और उनको बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक किया। इसके बाद बच्चों ने स्कूल में आना शुरू कर दिया। अब स्कूल में 140 बच्चे पढ़ रहे हैं। इनमें ज्यादातर कूड़ा बीनने वाले या फिर श्रमिकों के बच्चे हैं। वे सुबह से दोपहर तक स्कूल में पढ़ते हैं। उनको पहली से चौथी कक्षा तक चेतना स्कूल में पढ़ाया जाता है। इसके बाद राजकीय स्कूलों में प्रवेश दिला दिया जाता है। राजकीय स्कूलों में प्रवेश दिलाने के बाद भी इन बच्चोें की हर संभव मदद की जाती है। डॉ. वंदना पाहुजा ने बताया कि बेटियों को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई केंद्र शुरू किया।
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केमिस्ट्री टीचर ने घर व स्कूल में बनाई लाइब्रेरी, कई को दिखाया रास्ता
आर्य सीसे स्कूल जीटी रोड में केमिस्ट्री लेक्चरर डॉ. आरके गर्ग वर्तमान में एक बेहतरीन गुरु की जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए अपने स्तर पर अपने मकान और स्कूल में लाइब्रेरी तैयार की है। घर पर करीब 400 और स्कूल स्थित लाइब्रेरी में करीब 150 किताब केमिस्ट्री की हैं। उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थी जवाहर लाल नेहरू नेशनल साइंस एग्जीबिशन में आठ बार उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर चुके हैं। डॉ. गर्ग को 2005 में शिक्षक दिवस पर स्टेट अवार्ड से सम्मानित भी किया जा चुका है। डॉ. अजय गर्ग ने बताया कि वे कक्षा में पहले बच्चों को खुद समझते हैं, उसके बाद ही उन्हें समझाते हैं।
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वे हमेशा अपने विषय के टॉपिक को बोर्ड पर स्पष्ट लिखते हैं। इसके बाद विद्यार्थियों को उसका अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हैं। बच्चे कई बार बोला हुआ ठीक से नहीं समझ पाते। इसलिए वे सभी टॉपिक को लिखकर समझाते हैं। जरूरतमंद बच्चों को स्कूल में खाली पीरियड या फिर छुट्टी के बाद घर पर समझाते हैं।
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एमबीबीएस डॉक्टर चला रहीं चेतना स्कूल
एमबीबीएस डॉक्टर वंदना पाहुजा ऐसी चिकित्सक हैं, जो मरीजों का इलाज करने के साथ ही चेतना स्कूल और सिलाई केंद्र भी संचालित कर रही है। डॉ. वंदना पाहुजा के चेतना स्कूल में 140 बच्चे प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके अलावा सिलाई सेंटर पर 15 से 20 लड़कियों सिलाई सिखाती हैं। वे दोनों ही केंद्रों का खर्च वह खुद वहन करती हैं। डॉ. वंदना पाहुजा ने बताया कि वे चेतना स्कूलों में अक्सर जाती रहती थीं। उनको बच्चों के बीच में जाकर खुशी महसूस होती थी। उन्होंने इसी सोच के साथ चेतना स्कूल शुरू किया। स्कूल में शुरुआत में 40 बच्चे थे।
इस पर वे कॉलोनी में रहने वाले फैक्टरी श्रमिकों के बीच र्गइं और उनको बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक किया। इसके बाद बच्चों ने स्कूल में आना शुरू कर दिया। अब स्कूल में 140 बच्चे पढ़ रहे हैं। इनमें ज्यादातर कूड़ा बीनने वाले या फिर श्रमिकों के बच्चे हैं। वे सुबह से दोपहर तक स्कूल में पढ़ते हैं। उनको पहली से चौथी कक्षा तक चेतना स्कूल में पढ़ाया जाता है। इसके बाद राजकीय स्कूलों में प्रवेश दिला दिया जाता है। राजकीय स्कूलों में प्रवेश दिलाने के बाद भी इन बच्चोें की हर संभव मदद की जाती है। डॉ. वंदना पाहुजा ने बताया कि बेटियों को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई केंद्र शुरू किया।