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जीवन में अंहकार और मोह का त्याग जरूरी : आचार्य लालमणि पांडेय
Sun, 31 May 2026 01:08 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
Updated Sun, 31 May 2026 01:08 AM IST
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कांशीगिरी मंदिर में कथा सुनते श्रद्धालु। स्रोत : सभा
पानीपत। कांशीगिरी मंदिर में साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा का शनिवार को छठा दिन रहा। कथावाचक आचार्य लालमणि पांडेय ने जीवन में अहंकार और मोह के त्याग का संदेश दिया। उन्होंने कथा में भगवान कृष्ण और गोपियों की रास लीला का प्रसंग सुनाया। साथ ही बताया कि कंस के अहंकार के कारण ही भगवान कृष्ण ने उनका वध किया और समाज को अहंकार त्याग करने का संदेश दिया।
आचार्य लालमणि पांडेय ने कहा कि भगवान ने गोपियों को अपने लोक का दर्शन कराया। इसके बाद प्रभु बांसुरी बजाकर गोपियों को बुलाते हैं और उनके साथ रास लीला करते हैं। रास करते समय भगवान कृष्ण अंतरध्यान हो जाते हैं। जब गोपियां भगवान कृष्ण को अपने पास नहीं पाती हैं तो वे रोने लगती है। फिर भी जो गोपियों ने कहा वह गोपी गीत हो गया। इस दशम स्कन्ध में चार गीता गाए गए हैं वेजू गीत, गोपी गीत, चुगल गीत और भ्रमर गीत। ये चारों गीत गोपियों ने भगवान कृष्ण के लिए गाया। रुदन गोपियों का सुनकर प्रभु प्रकट होकर महारास करते हैं जिसमें सभी को प्रभु धन्य करते हैं। भगवान शिव भी गोपी बनकर आए तभी से भगवान शिव का एक नाम गोपेश्वर हुआ है। भगवान फिर अक्रूर के साथ रथ पर बैठकर मथुरा आकर कंस का उद्धार करते हैं और जगत को शिक्षा देते हैं कि अहंकार का हमेशा अंत ही होता है इसलिए जीवन में अहंकार का भाव नहीं रखना चाहिए और माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। फिर गुरु सांदीवनि के यहां उज्जैन में 64 दिन में 64 प्रकार की शिक्षा प्राप्त करके सुदामा से मित्रता करके गुरु को दक्षिणा में उनके पुत्र को लौटाकर वापिस मथुरा आ जाते हैं। मथुरा में भगवान का जन्म नक्षत्र मनाया जाता है। भगवान कृष्ण को वृंदावन धाम की याद आती है और उद्धव को धाम वृंदावन भेजते हैं। माता-पिता और गोपियों से उद्धव मिलकर प्रेम भक्ति के रंग में रंग जाते हैं। बलराम का विवाह रेवती के साथ होता है और धूमधाम से फिर भगवान कृष्ण का विवाह रुक्मिणी के साथ संपन्न होता है। कथा में कथा के बाद महिला भजन मंडली ने भजन-कीर्तन किया और भगवान कृष्ण के भजनों का गुणगान किया। समापन पर सबको प्रसाद वितरित किया गया।
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आचार्य लालमणि पांडेय ने कहा कि भगवान ने गोपियों को अपने लोक का दर्शन कराया। इसके बाद प्रभु बांसुरी बजाकर गोपियों को बुलाते हैं और उनके साथ रास लीला करते हैं। रास करते समय भगवान कृष्ण अंतरध्यान हो जाते हैं। जब गोपियां भगवान कृष्ण को अपने पास नहीं पाती हैं तो वे रोने लगती है। फिर भी जो गोपियों ने कहा वह गोपी गीत हो गया। इस दशम स्कन्ध में चार गीता गाए गए हैं वेजू गीत, गोपी गीत, चुगल गीत और भ्रमर गीत। ये चारों गीत गोपियों ने भगवान कृष्ण के लिए गाया। रुदन गोपियों का सुनकर प्रभु प्रकट होकर महारास करते हैं जिसमें सभी को प्रभु धन्य करते हैं। भगवान शिव भी गोपी बनकर आए तभी से भगवान शिव का एक नाम गोपेश्वर हुआ है। भगवान फिर अक्रूर के साथ रथ पर बैठकर मथुरा आकर कंस का उद्धार करते हैं और जगत को शिक्षा देते हैं कि अहंकार का हमेशा अंत ही होता है इसलिए जीवन में अहंकार का भाव नहीं रखना चाहिए और माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। फिर गुरु सांदीवनि के यहां उज्जैन में 64 दिन में 64 प्रकार की शिक्षा प्राप्त करके सुदामा से मित्रता करके गुरु को दक्षिणा में उनके पुत्र को लौटाकर वापिस मथुरा आ जाते हैं। मथुरा में भगवान का जन्म नक्षत्र मनाया जाता है। भगवान कृष्ण को वृंदावन धाम की याद आती है और उद्धव को धाम वृंदावन भेजते हैं। माता-पिता और गोपियों से उद्धव मिलकर प्रेम भक्ति के रंग में रंग जाते हैं। बलराम का विवाह रेवती के साथ होता है और धूमधाम से फिर भगवान कृष्ण का विवाह रुक्मिणी के साथ संपन्न होता है। कथा में कथा के बाद महिला भजन मंडली ने भजन-कीर्तन किया और भगवान कृष्ण के भजनों का गुणगान किया। समापन पर सबको प्रसाद वितरित किया गया।
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कांशीगिरी मंदिर में कथा सुनते श्रद्धालु। स्रोत : सभा
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