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Panipat News: काइरोप्रैक्टिक शिविर में उपचार के लिए लगी श्रद्धालुओं की कतार
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समालखा। निरंकारी संत समागम में हर सेवादार अपनी क्षमता के अनुसार सेवा में जुटा हुआ है। इसमें विदेश से आए 25 काइरोप्रैक्टिक चिकित्सकों सहित सात भारतीयों की टीम भी शामिल है। जो श्रद्धालुओं की रीढ़, घुटने, सर्वाइकल आदि की जांच करने में समर्पण भाव से लगे हुए हैं। शिविर में प्रतिदिन दो से ढाई हजार लोगों का उपचार किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि काइरोप्रैक्टिक एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है, जो पेशीकंकाल तंत्र (रीढ़) के यांत्रिक विकारों के निवारण, निदान तथा उपचार पर बल देता है। इस पद्धति के अनुसार शरीर में किसी तरह का विकार होने पर तंत्रिका तंत्र के माध्यम से स्वास्थ्य की अन्य समस्याएं जन्म लेती हैं। समागम में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को इन परेशानियों से राहत दिलाने के लिए मिशन द्वारा काइरोप्रैक्टिक शिविर लगाया गया है। शिविर के प्रभारी कनाडा से आए डाॅ. जिम्मी नंदा ने बताया कि यह एसएनसीएफ की ओर से संचालित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रीढ़ में किसी तरह की परेशानी हो तो उसका असर पूरे शरीर पर पड़ता है। क्योंकि रीढ़ से काफी सारी नसें निकलती हैं। इस पद्धति के माध्यम से रीढ़ के विकार को दूर करने का प्रयास किया जाता है। डाॅ. जिम्मी नंदा का जन्म कनाडा में हुआ है और वे मिशन में सेवा के लिए आते हैं।
25 विदेशी चिकित्सक कर रहे उपचार
शिविर में श्रद्धालुओं के उपचार के लिए भारत सहित इंग्लैंड, अमेरिका, स्पेन, फ्रांस, कनाडा आदि कई देशों से 25 डाॅक्टरों व सात भारतीयों की टीम उपचार करने में लगी है। शिविर में करीब 70 बेड की व्यवस्था की गई है। कई चिकित्सक अपने साथ ही बेड लेकर आए हैं। पहले भारतीय काइरोप्रैक्टिक विशेष मुंबई से डाॅ. तन्मैय ने बताया कि देश में इस पद्धति की शिक्षा नहीं है। उन्होंने अमेरिका से इसमें एमबीबीएस की है। उनका परिवार निरंकारी मिशन से जुड़ा है और वह दो वर्ष से शिविर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
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उपचार में लगते पांच से सात मिनट
एक व्यक्ति के उपचार में चिकित्सक को पांच से सात मिनट का औसत समय लगता है। विदेशी चिकित्सक को अपनी समस्या के बारे में श्रद्धालु सही ढंग से बता सके और सही उपचार हो इसके लिए मिशन द्वारा ट्रांसलेटर सहयोगी की व्यवस्था भी की गई है।
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उल्लेखनीय है कि काइरोप्रैक्टिक एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है, जो पेशीकंकाल तंत्र (रीढ़) के यांत्रिक विकारों के निवारण, निदान तथा उपचार पर बल देता है। इस पद्धति के अनुसार शरीर में किसी तरह का विकार होने पर तंत्रिका तंत्र के माध्यम से स्वास्थ्य की अन्य समस्याएं जन्म लेती हैं। समागम में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को इन परेशानियों से राहत दिलाने के लिए मिशन द्वारा काइरोप्रैक्टिक शिविर लगाया गया है। शिविर के प्रभारी कनाडा से आए डाॅ. जिम्मी नंदा ने बताया कि यह एसएनसीएफ की ओर से संचालित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि रीढ़ में किसी तरह की परेशानी हो तो उसका असर पूरे शरीर पर पड़ता है। क्योंकि रीढ़ से काफी सारी नसें निकलती हैं। इस पद्धति के माध्यम से रीढ़ के विकार को दूर करने का प्रयास किया जाता है। डाॅ. जिम्मी नंदा का जन्म कनाडा में हुआ है और वे मिशन में सेवा के लिए आते हैं।
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25 विदेशी चिकित्सक कर रहे उपचार
शिविर में श्रद्धालुओं के उपचार के लिए भारत सहित इंग्लैंड, अमेरिका, स्पेन, फ्रांस, कनाडा आदि कई देशों से 25 डाॅक्टरों व सात भारतीयों की टीम उपचार करने में लगी है। शिविर में करीब 70 बेड की व्यवस्था की गई है। कई चिकित्सक अपने साथ ही बेड लेकर आए हैं। पहले भारतीय काइरोप्रैक्टिक विशेष मुंबई से डाॅ. तन्मैय ने बताया कि देश में इस पद्धति की शिक्षा नहीं है। उन्होंने अमेरिका से इसमें एमबीबीएस की है। उनका परिवार निरंकारी मिशन से जुड़ा है और वह दो वर्ष से शिविर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
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उपचार में लगते पांच से सात मिनट
एक व्यक्ति के उपचार में चिकित्सक को पांच से सात मिनट का औसत समय लगता है। विदेशी चिकित्सक को अपनी समस्या के बारे में श्रद्धालु सही ढंग से बता सके और सही उपचार हो इसके लिए मिशन द्वारा ट्रांसलेटर सहयोगी की व्यवस्था भी की गई है।