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आर्य कालेज में पत्रिका के नाम पर फर्जीवाड़ा!
अमर उजाला ब्यूरो/पानीपत
Updated Sat, 14 Jun 2014 11:56 PM IST
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पानीपत शहर के आर्य पीजी कालेज में पत्रिका के नाम पर फर्जीवाड़ा सामने आया है। राज्य आयोग ने प्राचार्य पर आरटीआई के तहत मांगी सूचना न देने पर दस हजार रुपये जुर्माना लगाया है।
यही नहीं, आयोग ने प्राचार्य को मांगी गई जानकारी भी एक महीने में उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए हैं। उधर, प्राचार्य ने इसे दाखिलों के समय कालेज की छवि खराब करने की साजिश बताते सामान्य घटना बताई है।
मामला विद्यार्थियों को दी जाने वाली पत्रिका से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों को हर साल पत्रिका दी जाती है और उसके पैसे लिए जाते हैं। इसका कोई प्रमाण नहीं दिया जाता है।
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एडवोकेट सुरेंद्र सिंह ने सूचना के अधिकार के तहत एक फरवरी 2013 को महाविद्यालय से कुछ जानकारी मांगी, लेकिन इसके उत्तर में कोई जानकारी नहीं दी गई।
उन्हाेंने सूचना नहीं मिलने पर उच्चतर शिक्षा विभाग के निदेशक के पास अपील की। प्रबंधन समिति को अपील की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
इसके बाद उन्होंने राज्य सूचना आयोग में फरियाद की। आयोग ने सभी पक्षों को सुना और प्राचार्य पर दस हजार रुपये जुर्माना लगाया।
2009 से लेकर 2012 तक कॉलेज की वार्षिक पत्रिका की जानकारी मांगी
1. कालेज में वार्षिक पत्रिका कितने साल और कब से छप रही है?
2. 2009 से 2012 तक वार्षिक पत्रिका छपी या नहीं।
3. एक विद्यार्थी से पत्रिका के लिए कितना शुल्क लिया गया था और हर साल कितना शुल्क लिया?
4. पत्रिका न छपने की स्थिति में क्या विद्यार्थियों से लिए गए पैसे वापस किए गए, अगर नहीं किए तो कितने बच्चों का बकाया है। अगर विद्यार्थियों को वार्षिक पत्रिका बांटी गई थी तो विद्यार्थियों के रिसीविंग के रिकार्ड की सत्यापित प्रति उपलब्ध करवाई जाए।
5. पत्रिका किस प्रेस में छपी थी। प्रत्येक वर्ष कितनी प्रतियां छपी थीं और कितनी लागत आई थी। प्रेस के बिल की तसदीकशुदा कापी उपलब्ध करवाई जाए।
6. साल 2009-2012 तक की वार्षिक पत्रिकाओं की सत्यापित प्रति उपलब्ध करवाई जाएं।
7. यदि उक्त समय के दौरान पत्रिका नहीं छपी थी तो संपूर्ण ब्यौरा सहित कारण बताएं।
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यही नहीं, आयोग ने प्राचार्य को मांगी गई जानकारी भी एक महीने में उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए हैं। उधर, प्राचार्य ने इसे दाखिलों के समय कालेज की छवि खराब करने की साजिश बताते सामान्य घटना बताई है।
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मामला विद्यार्थियों को दी जाने वाली पत्रिका से जुड़ा हुआ है। विद्यार्थियों को हर साल पत्रिका दी जाती है और उसके पैसे लिए जाते हैं। इसका कोई प्रमाण नहीं दिया जाता है।
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एडवोकेट सुरेंद्र सिंह ने सूचना के अधिकार के तहत एक फरवरी 2013 को महाविद्यालय से कुछ जानकारी मांगी, लेकिन इसके उत्तर में कोई जानकारी नहीं दी गई।
उन्हाेंने सूचना नहीं मिलने पर उच्चतर शिक्षा विभाग के निदेशक के पास अपील की। प्रबंधन समिति को अपील की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
इसके बाद उन्होंने राज्य सूचना आयोग में फरियाद की। आयोग ने सभी पक्षों को सुना और प्राचार्य पर दस हजार रुपये जुर्माना लगाया।
2009 से लेकर 2012 तक कॉलेज की वार्षिक पत्रिका की जानकारी मांगी
1. कालेज में वार्षिक पत्रिका कितने साल और कब से छप रही है?
2. 2009 से 2012 तक वार्षिक पत्रिका छपी या नहीं।
3. एक विद्यार्थी से पत्रिका के लिए कितना शुल्क लिया गया था और हर साल कितना शुल्क लिया?
4. पत्रिका न छपने की स्थिति में क्या विद्यार्थियों से लिए गए पैसे वापस किए गए, अगर नहीं किए तो कितने बच्चों का बकाया है। अगर विद्यार्थियों को वार्षिक पत्रिका बांटी गई थी तो विद्यार्थियों के रिसीविंग के रिकार्ड की सत्यापित प्रति उपलब्ध करवाई जाए।
5. पत्रिका किस प्रेस में छपी थी। प्रत्येक वर्ष कितनी प्रतियां छपी थीं और कितनी लागत आई थी। प्रेस के बिल की तसदीकशुदा कापी उपलब्ध करवाई जाए।
6. साल 2009-2012 तक की वार्षिक पत्रिकाओं की सत्यापित प्रति उपलब्ध करवाई जाएं।
7. यदि उक्त समय के दौरान पत्रिका नहीं छपी थी तो संपूर्ण ब्यौरा सहित कारण बताएं।