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जन्म के एक घंटे में 15.4% शिशुओं को ही मां का दूध
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पानीपत। जन्म के एक घंटे के अंदर जिले में महज 15.4 प्रतिशत शिशुओं को ही मां का दूध मिल पाता है, जबकि यह बेहद जरूरी है। पहले एक घंटे में मां का दूध शिशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर उन्हें बीमारियों से दूर रखने में कारगर होता है। यह बीमारियों के प्रति शिशुओं के शरीर में एंटीबॉडीज बना देता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक जीटी बेल्ट छह जिलों में पानीपत ही शिशुओं को मां का दूध पिलाए जाने के मामले में पीछे है, जबकि बाकी जिलों के हालत कहीं बेहतर हैं।
पानीपत में शहरी क्षेत्र के हालात ग्रामीण क्षेत्र से भी खराब हैं। शहरी में तीन वर्ष की उम्र तक ऐसे बच्चों की संख्या महज 11.9 प्रतिशत है, जिन्हें उनके जन्म के पहले घंटे मां का दूध मिला, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 18.9 फीसदी है। हालांकि छह माह से कम उम्र के ऐसे शिशुओं का आंकड़ा जिले में 40.6 हैं, जिन्हें सिर्फ मां का दूध ही पिलाया जाता रहा है। मां के दूध के साथ ही कोई ठोस पदार्थ नहीं दिया गया। यह आंकड़ा भी कम हैं क्योंकि 59.4 प्रतिशत बच्चों को छह माह उम्र होने से पहले ही माताएं ठोस या अर्थ ठोस आहर देने लगीं।
मां का दूध न मिलने पर बच्चों के शारीरिक विकास पर पड़ रहा असर
जिले में पांच वर्ष से कम उम्र के 44.6 प्रतिशत बच्चों की उम्र के हिसाब से लंबाई नहीं है। शहर क्षेत्र में यह आंकड़ा 48.7 और ग्रामीण क्षेत्र में 40.1 प्रतिशत है। इस तरह पांच वर्ष से कम उम्र के 25.1 प्रतिशत बच्चों की लंबाई तो है, लेकिन उसके हिसाब से वजन कम है। शहरी क्षेत्र में यह आंकड़ा 18.6 और ग्रामीण क्षेत्र में 31.9 प्रतिशत है। वहीं लंबाई के लिहाज से अत्यधिक वजन कम होने वाली बच्चों की संख्या 11.8 प्रतिशत है। आमतौर पर जिन बच्चों का वजन कम ही है, वे 40.8 प्रतिशत हैं।
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जीटी बेल्ट के अन्य जिलों के हालात
जन्म के पहले घंटे में अंबाला में 56.2, करनाल में 54.2, कैथल में 49.7, कुरुक्षेत्र में 43.3 और यमुनानगर में 42.9 प्रतिशत बच्चों को मां का दूध मिल जाता है। इसी तरह छह माह से कम उम्र के अंबाला के 35, कैथल के 41.1, कुरुक्षेत्र के 38.1 और यमुना नगर के 49.2 प्रतिशत शिशुओं को इस उम्र तक सिर्फ मां का दूध मिल पाता है। जबकि शिशु को पहले छह माह तक सिर्फ मां का दूध ही मिलना चाहिए।
एक नजर हरियाणा पर
जन्म के पहले घंटे में 42.4 बच्चों का मां का दूध मिल पाता है, शहरी में यह 38.3 और ग्रामीण क्षेत्र में 44.6 प्रतिशत है। छह माह से कम उम्र के 50.3 फीसदी बच्चों को ही सिर्फ मां का दूध आहार के तौर पर दिया जाता है, शहरी क्षेत्र में 46.6 और ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 52.4 प्रतिशत है। छह से आठ माह के 35.9 प्रतिशत बच्चों को मां के दूध के साथ ही ठोस या अर्ध ठोस आहार दिया जा रहा है।
प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 2178 महिलाओं को दी जा चुकी हैं तीनों किस्त
इस स्थिति से निपटने के लिए महिलाओं को पोषण के साथ ही उन्हें जागरूक कर प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना का लाभ गर्भवती एवं स्तनपान करा रहीं माताओं तक पहुंचने पर काम किया जा रहा है। महिलाओं को पोषण के लिए पांच हजार रुपये की नगद राशि तीन किस्तों में दी जा रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग की जिला संयोजक प्रीति कुंडू ने बताया कि इस योजना के तहत पानीपत की 11486 महिलाओं को पहली और दूसरी एवं 2178 महिलाओं को तीनों किस्त दी जा चुकी हैं।
मां के दूध में एंटीबॉडीज होती हैं, जो बच्चे में निमोनिया, डायरिया, सेस्टिस, ब्रेन फीवर, संक्रमण आदि की संभावना बढ़ जाती है। स्त्री रोग विशेषज्ञ मनदीप ने कहा कि जो माताएं बच्चों को अपना दूध नहीं पिलाती हैं, उनमें ब्रेस्ट कैंसर, यूटरेस ब्लीडिंग के साथ हारमोनल इम्बैलेंस के साथ ही अन्य बीमारियों की चपेट में आने की भी आशंका रहती है। - डॉ. निहारिका, बाल रोग विशेषज्ञ, सिविल अस्पताल
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पानीपत में शहरी क्षेत्र के हालात ग्रामीण क्षेत्र से भी खराब हैं। शहरी में तीन वर्ष की उम्र तक ऐसे बच्चों की संख्या महज 11.9 प्रतिशत है, जिन्हें उनके जन्म के पहले घंटे मां का दूध मिला, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 18.9 फीसदी है। हालांकि छह माह से कम उम्र के ऐसे शिशुओं का आंकड़ा जिले में 40.6 हैं, जिन्हें सिर्फ मां का दूध ही पिलाया जाता रहा है। मां के दूध के साथ ही कोई ठोस पदार्थ नहीं दिया गया। यह आंकड़ा भी कम हैं क्योंकि 59.4 प्रतिशत बच्चों को छह माह उम्र होने से पहले ही माताएं ठोस या अर्थ ठोस आहर देने लगीं।
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मां का दूध न मिलने पर बच्चों के शारीरिक विकास पर पड़ रहा असर
जिले में पांच वर्ष से कम उम्र के 44.6 प्रतिशत बच्चों की उम्र के हिसाब से लंबाई नहीं है। शहर क्षेत्र में यह आंकड़ा 48.7 और ग्रामीण क्षेत्र में 40.1 प्रतिशत है। इस तरह पांच वर्ष से कम उम्र के 25.1 प्रतिशत बच्चों की लंबाई तो है, लेकिन उसके हिसाब से वजन कम है। शहरी क्षेत्र में यह आंकड़ा 18.6 और ग्रामीण क्षेत्र में 31.9 प्रतिशत है। वहीं लंबाई के लिहाज से अत्यधिक वजन कम होने वाली बच्चों की संख्या 11.8 प्रतिशत है। आमतौर पर जिन बच्चों का वजन कम ही है, वे 40.8 प्रतिशत हैं।
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जीटी बेल्ट के अन्य जिलों के हालात
जन्म के पहले घंटे में अंबाला में 56.2, करनाल में 54.2, कैथल में 49.7, कुरुक्षेत्र में 43.3 और यमुनानगर में 42.9 प्रतिशत बच्चों को मां का दूध मिल जाता है। इसी तरह छह माह से कम उम्र के अंबाला के 35, कैथल के 41.1, कुरुक्षेत्र के 38.1 और यमुना नगर के 49.2 प्रतिशत शिशुओं को इस उम्र तक सिर्फ मां का दूध मिल पाता है। जबकि शिशु को पहले छह माह तक सिर्फ मां का दूध ही मिलना चाहिए।
एक नजर हरियाणा पर
जन्म के पहले घंटे में 42.4 बच्चों का मां का दूध मिल पाता है, शहरी में यह 38.3 और ग्रामीण क्षेत्र में 44.6 प्रतिशत है। छह माह से कम उम्र के 50.3 फीसदी बच्चों को ही सिर्फ मां का दूध आहार के तौर पर दिया जाता है, शहरी क्षेत्र में 46.6 और ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 52.4 प्रतिशत है। छह से आठ माह के 35.9 प्रतिशत बच्चों को मां के दूध के साथ ही ठोस या अर्ध ठोस आहार दिया जा रहा है।
प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 2178 महिलाओं को दी जा चुकी हैं तीनों किस्त
इस स्थिति से निपटने के लिए महिलाओं को पोषण के साथ ही उन्हें जागरूक कर प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना का लाभ गर्भवती एवं स्तनपान करा रहीं माताओं तक पहुंचने पर काम किया जा रहा है। महिलाओं को पोषण के लिए पांच हजार रुपये की नगद राशि तीन किस्तों में दी जा रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग की जिला संयोजक प्रीति कुंडू ने बताया कि इस योजना के तहत पानीपत की 11486 महिलाओं को पहली और दूसरी एवं 2178 महिलाओं को तीनों किस्त दी जा चुकी हैं।
मां के दूध में एंटीबॉडीज होती हैं, जो बच्चे में निमोनिया, डायरिया, सेस्टिस, ब्रेन फीवर, संक्रमण आदि की संभावना बढ़ जाती है। स्त्री रोग विशेषज्ञ मनदीप ने कहा कि जो माताएं बच्चों को अपना दूध नहीं पिलाती हैं, उनमें ब्रेस्ट कैंसर, यूटरेस ब्लीडिंग के साथ हारमोनल इम्बैलेंस के साथ ही अन्य बीमारियों की चपेट में आने की भी आशंका रहती है। - डॉ. निहारिका, बाल रोग विशेषज्ञ, सिविल अस्पताल