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Haryana: हरियाणवी बोली को प्रमोट करने के लिए अपने गांव पहुंचे नीरज चोपड़ा, पेरिस ओलंपिक को लेकर कही ये बात

Sun, 26 Nov 2023 02:18 PM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, थर्मल, पानीपत (हरियाणा)
अमर उजाला ब्यूरो, थर्मल, पानीपत (हरियाणा) Published by: भूपेंद्र सिंह Updated Sun, 26 Nov 2023 02:18 PM IST
सार

नीरज चोपड़ा ने कहा कि युवाओं को शिक्षा के साथ अपनी बोली व संस्कृति को भी मजबूत बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने पेरिस ओलंपिक की तैयारियों के बारे में भी बात की।

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Neeraj Chopra reached his village to promote Haryanvi dialect
नीरज चोपड़ा - फोटो : संवाद

विस्तार

जेवलिन थ्रो में लोगों की दिल की धड़कन बने गोल्ड मेडलिस्ट नीरज चोपड़ा हरियाणवी बोली को प्रमोट करने के लिए आगे आए हैं। उनका कहना है कि हरियाणा प्रदेश के युवा व लोग हर क्षेत्र में आगे हैं, लेकिन वह अपनी बोली को कॉन्फिडेंस की कमी मानते हैं। जबकि यह गलत है। प्रत्येक व्यक्ति को अन्य भाषाएं सीखना चाहिए, लेकिन कभी भी अपनी बोली को नहीं छोड़ना चाहिए। वह खुद भी देश व विदेश में हरियाणवी बोली को खुलकर बोलते हैं और कभी भी इस बोली को बोलने में नहीं बचते।

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नीरज चोपड़ा ने यह बात रविवार को अपने पैतृक गांव खंडरा स्थित संस्कृति स्कूल में एक समारोह के दौरान कही। नीरज चोपड़ा यहां मंच पर आए तो उनका पहला शब्द सबको नमस्ते और राम-राम रहा। उन्होंने कहा कि गांव में आकर उनको बहुत अच्छा लगता है कुछ लोगों का मानना है कि वह अपनी बोली की वजह से सफल नहीं है। उनको अपना डर खत्म करना होगा और अपनी हरियाणवी बोली को कॉन्फिडेंस के साथ बोलना होगा। वह अकेले नहीं बल्कि देश व विदेश में कई ऐसे उदाहरण हैं जो अपनी बोली को आज भी अपनाए हुए हैं।
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उन्होंने प्रसिद्ध खिलाड़ी मैसी का भी उदाहरण दिया उन्होंने कहा कि मैसी जबरदस्त खिलाड़ी हैं, लेकिन वह अपनी बोली आज भी बोलते हैं। व्यक्ति को अपने बोली व कल्चर को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। मातृभाषा ही नहीं मातृ बोली भी लोगों को अपनानी चाहिए। कई बार इस तरह की बातें महसूस होती हैं लेकिन उनको कभी भी दिल पर नहीं लेना चाहिए।

बोली पर लाज नहीं नाज करो
नीरज ने कहा कि हमें अपनी बोली में अपनापन नजर आता है। इसमें किसी प्रकार की शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मेरी इंग्लिश बहुत कमजोर थी। अब कुछ सुधार है। वह इन सबके बीच आज भी अपनी बोली को पसंद करते हैं। हरियाणवी बोली को अपने लिए बोलो। ये मत सोचो सामने वाले को कितनी समझ आ रही है। यह विषय नहीं है बल्कि मैं अपनी बोली को कितने कॉन्फिडेंस के साथ बोलता हूं यह जरूरी है। नीरज चोपड़ा ने कहा कि अपनी बोली पर लाज नहीं ने नाज होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने काम पर कॉन्फिडेंस होना चाहिए और लक्ष्य पर नजर होनी चाहिए। जिसको सुनने और समझने की जरूरत होगी, वह डिक्शनरी की तलाश करेगा। नीरज चोपड़ा ने कहा कि एक पेड़ जब ऊंचा होता है लेकिन कभी भी अपनी जड़ नहीं छोड़ता। उसकी जड़ जितनी मजबूत होगी वह पेड़ उतना ही मजबूत होगा और विकट परिस्थितियों में मजबूती के साथ खड़ा रहेगा। इसी प्रकार व्यक्ति की बोली भी उसकी जड़ है। वह अपनी बोली को जितना ज्यादा मजबूत रखेगा, वह उतना ही आगे बढ़ेगा।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी लैंग्वेज स्किल के लिए है, लेकिन यह जीने का आधार नहीं है। मैं गांव से निकला था और तो हरियाणवी बोलता था अब समय के साथ हिंदी और अंग्रेजी बोलना भी सीख ली। हरियाणवी बोलने के लिए क्रांति लाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हरियाणा की कल्चर देश ही नहीं विदेश में भी धाक है।

हरियाणा व महाराणा दोनों से जुड़े
उन्होंने कहा कि वह हरियाणा व महाराणा दोनों से जुड़े हुए हैं। महाराणा ने देश के लिए अपने प्राणों को न्योछावर किया और उनके वीरता में भाले का जिक्र होता है मेरी पहचान भी भाले से है। मैं बदलाव व क्रांति लाना चाहता हूं। हम किसी से काम नहीं हैं।


पेरिस ओलंपिक अगला लक्ष्य
नीरज चोपड़ा ने कहा कि उन्होंने पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर लिया है। वह अब इसको लेकर के दिन रात मेहनत कर रहा है और गांव में आने के बाद उन्होंने केवल खान-पान पर ध्यान रखा है। इस वजह से उनका वजन भी पांच से छह किलो बढ़ गया है लेकिन वह प्रैक्टिस शुरू करते ही एक सप्ताह में इस वजन को कम कर लेंगे। पेरिस ओलंपिक के लिए बाहर जाकर तैयारी शुरू करेंगे।

ओलंपिक पर एडी से चोटी तक का पूरा जोर लगाएंगे। उन्होंने कहा कि ओलंपिक 4 साल में आता है और प्रत्येक खिलाड़ी का सपना इसमें स्वर्ण पदक लाने का रहता है। गांव में स्टेडियम को लेकर कहा कि सभी को कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना पड़ेगा। उन्होंने गांव के देसी खाने को भी याद किया। उन्होंने कहा कि युवाओं को लक्ष्य साधकर खेलों में आगे आना चाहिए। एक खेल पर तीन से पांच साल का समय जरूर देना चाहिए। कुछ युवा जल्दबाजी में अधिक प्रैक्टिस कर लेते हैं। इससे उनके गंभीर चोट भी आ जाती है। जिसके चलते सारी उम्र खेलों से भी दूर हो जाते हैं। उन्होंने अभिभावकों को भी सलाह दी कि बच्चों को खेलने का और आगे बढ़ने का पूरा मौका दें। उनको अपनी बोली से और संस्कृति से जोड़कर रखें।

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