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Panipat News: शहीद के परिवार को शहादत के 26 साल बाद भी नहीं मिली मदद
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बापौली। अत्तोल्लापुर गांव में सुशील कुमार को कारगिल युद्ध में शहीद हुए 26 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन परिवार को सरकार से कोई सुविधा नहीं मिल पाई है। सुशील कुमार के भाई जगबीर ने बताया कि सुशील कुमार का बिस्तर और अन्य सामान सेना के कमांडेंट बग्गा सिंह लेकर 30 अगस्त 1999 को गांव में पहुंचे थे। उनका बेटा कारगिल की लड़ाई में शहीद हो गया, लेकिन उनका पार्थिव शरीर तक उन्हें प्राप्त नहीं हुआ। उसके लिए सेना प्रयास कर रही है। एक वर्ष बाद सुशील का शव बर्फ में दबा हुआ मिला। जैसे ही सुशील के बड़े भाई इसकी जानकारी हुई वह सदमा सहन नहीं कर पाया और यह सुनते ही वह गिर गया। जिससे उसके सिर में गंभीर चोटें आई और उसे लकवा मार गया।
उसकी मांं भी ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रह सकी। सुशील के शहीद होने के कुछ समय बाद ही मां भी चल बसी। भाई जगबीर ने बताया कि सुशील की पत्नी सुशील के शहीद होने के बाद गांव छोड़ कर अपने मायके चली गई। परिवार का कहना है कि आज हमारा परिवार बहुत ही दयनीय स्थिति में है। जगबीर ने बताया कि सरकार ने कहा था कि शहीद सुशील कुमार के नाम से गांव में एक स्मारक बनाया जाएगा। आज 26 साल बीत जाने के बाद भी गांव में स्मारक के नाम एक ईंट भी नहीं लगी। सुशील कुमार की समाधि बनाने के लिए जो पैसा लगा, वह सारा खर्च उनके परिवार ने ही किया।
तीन भाइयों में छोटा था सुशील
सुशील के भाई ने बताया कि हम तीन भाइयों में सुशील सबसे छोटा था। वह कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था। जब सुशील का पार्थिक शरीर गांव में पहुंचा तो सारे गांव में गम का माहौल बन गया था। इसकी सूचना उन्हें सेना के अधिकारियों ने दी थी। गांव में किसी भी घर में चूल्हा तक नहीं जला।
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उसकी मांं भी ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रह सकी। सुशील के शहीद होने के कुछ समय बाद ही मां भी चल बसी। भाई जगबीर ने बताया कि सुशील की पत्नी सुशील के शहीद होने के बाद गांव छोड़ कर अपने मायके चली गई। परिवार का कहना है कि आज हमारा परिवार बहुत ही दयनीय स्थिति में है। जगबीर ने बताया कि सरकार ने कहा था कि शहीद सुशील कुमार के नाम से गांव में एक स्मारक बनाया जाएगा। आज 26 साल बीत जाने के बाद भी गांव में स्मारक के नाम एक ईंट भी नहीं लगी। सुशील कुमार की समाधि बनाने के लिए जो पैसा लगा, वह सारा खर्च उनके परिवार ने ही किया।
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तीन भाइयों में छोटा था सुशील
सुशील के भाई ने बताया कि हम तीन भाइयों में सुशील सबसे छोटा था। वह कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था। जब सुशील का पार्थिक शरीर गांव में पहुंचा तो सारे गांव में गम का माहौल बन गया था। इसकी सूचना उन्हें सेना के अधिकारियों ने दी थी। गांव में किसी भी घर में चूल्हा तक नहीं जला।
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