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जैन धर्म कर्मकांड नहीं, आत्मिक अनुभव का मार्ग : अरुण
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प्रवचन सुनते श्रावक। स्रोत : सोशल मीडिया
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अग्रवाल मंडी में चल रहे चातुर्मास में युवा प्रेरक जैन मुनि अरुण चंद्र महाराज ने आत्मा की अनुभूति व कायोत्सर्ग की दिव्य साधना के बारे में बतलाया। मुनि ने वृक्ष से यूं पीला पत्ता टूट जाता है, एक पल में यूं ही जीवन छूट जाता है... पंक्तियां सुनाईं तो श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
अरुण मुनि महाराज ने कहा कि यह केवल एक क्रिया नहीं बल्कि शरीर और आत्मा के भेद को पहचानने का जीवंत अनुभव है। कायोत्सर्ग मोह के बोझ को उतारने की साधना जब तक मनुष्य मोह और अतीत का बोझ नहीं उतारेगा। तब तक आत्मा के स्वरूप की पहचान नहीं हो सकती। जैन धर्म का कायोत्सर्ग।
शरीर की निष्क्रियता और आत्मा की जागरूकता एक वैज्ञानिक, आत्म-शोध की पद्धति है जो हजारों वर्षों से जैन परंपरा में जीवित है। अतीत से चिपके रहने वाले कभी भी वर्तमान की ऊर्जा को नहीं पकड़ सकते। ध्यान, मौन और आत्म निरीक्षण ही कायोत्सर्ग की नींव हैं। किसी को भगवान की वाणी पर श्रद्धा हो तो वह संसार के सभी मोह से सहज मुक्त हो सकता है।
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गुरु की भक्ति का रस जो चख ले वह जीवन में नया प्रकाश अनुभव करता है। जैन धर्म कर्मकांड नहीं बल्कि आत्मिक अनुभव का मार्ग है। जैन धर्म से प्रभावित होकर बड़े-बड़े राजा नतमस्तक हुए। यह धर्म अंधकार में प्रकाश और दुख में समाधान देने वाला मार्ग है। कायोत्सर्ग आत्मा और शरीर को अलग देखने का आत्मिक प्रयोग है। अतीत से मुक्त होकर वर्तमान में जीना ही मोक्ष की दिशा है। ध्यान और मौन से ही आत्मा का असली स्वरूप जाना जा सकता है।
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पानीपत। अग्रवाल मंडी में चल रहे चातुर्मास में युवा प्रेरक जैन मुनि अरुण चंद्र महाराज ने आत्मा की अनुभूति व कायोत्सर्ग की दिव्य साधना के बारे में बतलाया। मुनि ने वृक्ष से यूं पीला पत्ता टूट जाता है, एक पल में यूं ही जीवन छूट जाता है... पंक्तियां सुनाईं तो श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
अरुण मुनि महाराज ने कहा कि यह केवल एक क्रिया नहीं बल्कि शरीर और आत्मा के भेद को पहचानने का जीवंत अनुभव है। कायोत्सर्ग मोह के बोझ को उतारने की साधना जब तक मनुष्य मोह और अतीत का बोझ नहीं उतारेगा। तब तक आत्मा के स्वरूप की पहचान नहीं हो सकती। जैन धर्म का कायोत्सर्ग।
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शरीर की निष्क्रियता और आत्मा की जागरूकता एक वैज्ञानिक, आत्म-शोध की पद्धति है जो हजारों वर्षों से जैन परंपरा में जीवित है। अतीत से चिपके रहने वाले कभी भी वर्तमान की ऊर्जा को नहीं पकड़ सकते। ध्यान, मौन और आत्म निरीक्षण ही कायोत्सर्ग की नींव हैं। किसी को भगवान की वाणी पर श्रद्धा हो तो वह संसार के सभी मोह से सहज मुक्त हो सकता है।
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गुरु की भक्ति का रस जो चख ले वह जीवन में नया प्रकाश अनुभव करता है। जैन धर्म कर्मकांड नहीं बल्कि आत्मिक अनुभव का मार्ग है। जैन धर्म से प्रभावित होकर बड़े-बड़े राजा नतमस्तक हुए। यह धर्म अंधकार में प्रकाश और दुख में समाधान देने वाला मार्ग है। कायोत्सर्ग आत्मा और शरीर को अलग देखने का आत्मिक प्रयोग है। अतीत से मुक्त होकर वर्तमान में जीना ही मोक्ष की दिशा है। ध्यान और मौन से ही आत्मा का असली स्वरूप जाना जा सकता है।