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यही हालात रहे तो लुप्त हो जाएगा मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों का काम
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If this situation continues, then the work of potters who make earthen lamps will disappear.
- फोटो : Panipat
पानीपत। इस आधुनिक युग में दिवाली पर्व पर भी अगर सब इलेक्ट्रानिक वस्तुएं खरीदते रहे तो कुम्हार जाति सिर्फ नाम की ही रह जाएगी और इन हाथ के दस्तकारों का काम भी लुप्त हो जाएगा। मौजूदा समय में कुम्हार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। उनके इस काम में उन्हें अब आर्थिक रूप से भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई देता। इसलिए अब उनका कोई बच्चा भी इस काम को सीखने के लिए आगे नहीं आता।
इस महंगाई के समय में कुम्हार के काम से घर का खर्चा तक नहीं चल पाता। सरकार को कुम्हारों और इनके कामों के विषय में जरूर सोचना चाहिए। उन्हें आर्थिक व तकनीकी मदद देनी चाहिए। ये सब बातें गांव सौदापुर के कुम्हार रामधन ने अपने कुम्हार जीवन और काम के अनुभव सांझा करते हुए कही।
महंगाई बढ़ी लेकिन उनके रेट अभी भी पुराने
उन्होंने बताया कि अब भी लोग उनके सामान को उसी मूल्य पर लेते है जो पहले हुआ करता था। दाम बढ़ाने पर लोग सामान खरीदते समय हिचकिचाने लगते है और बाजार से रेडीमेेड सामान लेने की बातें बोलने लगते हैं। जिससे कम दाम पर ही उन्हें सामान बेचना पड़ता है। दूसरी तरफ मिट्टी के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। जो मिट्टी पहले 2500 रुपये तक की थी अब लॉकडाउन के चलते 5 हजार तक की हो गई है। इसके अलावा बर्तन पकाने के लिए प्रयोग होने वाले ईंधन के दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं। समय और मेहनत ज्यादा हो जाती है जबकि उसका फल बहुत कम मिलता है। यही कारण है कि अब बहुत से कुम्हार अपने पुश्तैनी काम को छोड़ भी रहे हैं। आर्थिक रूप से सक्षम होने के लिए उन्हें दूसरे कामों का सहारा लेना पड़ रहा है।
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अब नहीं सीखता कोई ये काम, घटती जा रही संख्या
उन्होंने बताया कि आज के समय ऐसा कुम्हार तो मुश्किल से ही मिलेगा जो सिर्फ अपने कुम्हार के काम से ही अपना घर चला रहा हो। ऐसी हालात हो चुके हैं कि अब कोई नया बच्चा भी ये काम नहीं सीखता। बड़ी तेजी से कुम्हार जाति के लोग भी दूसरे कामों को सीख रहे हैं। जिससे कुम्हारों में मिट्टी के बर्तन बनाने वालों की संख्या भी घट रही है। ऐसे ही चलता रहा तो कुम्हार लोग सिर्फ नाम से ही रह जाएंगे। उनका काम तो लुप्त ही हो जाएगा।
पहले साल भर चलता था काम, अब दो तीन महीने ही
अब मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने तक काम भी लगातार कम होता जा रहा है। पहले ये काम पूरे साल चलता था। अब साल के दो-तीन महीने ही काम चल पाता है। कुछ त्योहारों के सीजन में व कुछ गर्मी में मटके की बिक्री से काम चलता है। इसके अलावा बाकी के दिन दूसरे कामों का सहारा लेना पड़ता है।
सरकार ले संज्ञान
रामधन कुम्हार ने बताया कि सरकार को भी मिट्टी के बर्तन या दीये बनाने वाले कामगारों के विषय में सोचना चाहिए। उनके लिए सरकारी योजनाएं लागू करनी चाहिए। अब कुम्हारों के काम को आसान करने के लिए नई-नई तकनीकें आई हैं। इलेक्ट्रानिक चाक, इलेक्ट्रिक मिट्टी गूथने की मशीन आदि। ये तकनीकी सामान सरकार की ओर से कुम्हारों को उपलब्ध करवाना चाहिए। मिट्टी के बर्तनों को बढ़ावा देना चाहिए। दैनिक जीवन में मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होगा तभी कुम्हारों को उचित काम मिलेगा और तभी इनका भविष्य उज्जवल हो सकेगा।
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इस महंगाई के समय में कुम्हार के काम से घर का खर्चा तक नहीं चल पाता। सरकार को कुम्हारों और इनके कामों के विषय में जरूर सोचना चाहिए। उन्हें आर्थिक व तकनीकी मदद देनी चाहिए। ये सब बातें गांव सौदापुर के कुम्हार रामधन ने अपने कुम्हार जीवन और काम के अनुभव सांझा करते हुए कही।
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महंगाई बढ़ी लेकिन उनके रेट अभी भी पुराने
उन्होंने बताया कि अब भी लोग उनके सामान को उसी मूल्य पर लेते है जो पहले हुआ करता था। दाम बढ़ाने पर लोग सामान खरीदते समय हिचकिचाने लगते है और बाजार से रेडीमेेड सामान लेने की बातें बोलने लगते हैं। जिससे कम दाम पर ही उन्हें सामान बेचना पड़ता है। दूसरी तरफ मिट्टी के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। जो मिट्टी पहले 2500 रुपये तक की थी अब लॉकडाउन के चलते 5 हजार तक की हो गई है। इसके अलावा बर्तन पकाने के लिए प्रयोग होने वाले ईंधन के दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं। समय और मेहनत ज्यादा हो जाती है जबकि उसका फल बहुत कम मिलता है। यही कारण है कि अब बहुत से कुम्हार अपने पुश्तैनी काम को छोड़ भी रहे हैं। आर्थिक रूप से सक्षम होने के लिए उन्हें दूसरे कामों का सहारा लेना पड़ रहा है।
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अब नहीं सीखता कोई ये काम, घटती जा रही संख्या
उन्होंने बताया कि आज के समय ऐसा कुम्हार तो मुश्किल से ही मिलेगा जो सिर्फ अपने कुम्हार के काम से ही अपना घर चला रहा हो। ऐसी हालात हो चुके हैं कि अब कोई नया बच्चा भी ये काम नहीं सीखता। बड़ी तेजी से कुम्हार जाति के लोग भी दूसरे कामों को सीख रहे हैं। जिससे कुम्हारों में मिट्टी के बर्तन बनाने वालों की संख्या भी घट रही है। ऐसे ही चलता रहा तो कुम्हार लोग सिर्फ नाम से ही रह जाएंगे। उनका काम तो लुप्त ही हो जाएगा।
पहले साल भर चलता था काम, अब दो तीन महीने ही
अब मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने तक काम भी लगातार कम होता जा रहा है। पहले ये काम पूरे साल चलता था। अब साल के दो-तीन महीने ही काम चल पाता है। कुछ त्योहारों के सीजन में व कुछ गर्मी में मटके की बिक्री से काम चलता है। इसके अलावा बाकी के दिन दूसरे कामों का सहारा लेना पड़ता है।
सरकार ले संज्ञान
रामधन कुम्हार ने बताया कि सरकार को भी मिट्टी के बर्तन या दीये बनाने वाले कामगारों के विषय में सोचना चाहिए। उनके लिए सरकारी योजनाएं लागू करनी चाहिए। अब कुम्हारों के काम को आसान करने के लिए नई-नई तकनीकें आई हैं। इलेक्ट्रानिक चाक, इलेक्ट्रिक मिट्टी गूथने की मशीन आदि। ये तकनीकी सामान सरकार की ओर से कुम्हारों को उपलब्ध करवाना चाहिए। मिट्टी के बर्तनों को बढ़ावा देना चाहिए। दैनिक जीवन में मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होगा तभी कुम्हारों को उचित काम मिलेगा और तभी इनका भविष्य उज्जवल हो सकेगा।