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मोह माया छोड़ मंदिर में बैठे हनुमान स्वरूप
अमर उजाला, पानीपत
Updated Wed, 18 Sep 2013 12:07 AM IST
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पानीपत में आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान के पास फुर्सत के दो क्षण
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नहीं होते। लेकिन ऐसे में अगर कोई हनुमान स्वरूप में व्रत धारण कर 20 या 40
दिन तक सब कामकाज छोड़कर मंदिर में जाकर बैठे तो बड़ी बात है।
स्वरूप धारण करने के पीछे उनका उद्देश्य पवन-पुत्र हनुमान के आदर्शों का प्रचार-प्रसार कर समाज में फैली कुरीतियाें को दूर करना है। अकेले पानीपत में 500 से ज्यादा लोग ब्रह्मचर्य जैसे कठोर नियमाें का पालन करते हुए हनुमान स्वरूप बनकर मंदिराें में बैठे हैं और इसमें हर आयु के लोग शामिल हैं।
तत्कालीन पाकिस्तान के लैय्या जिले से 80 साल से भी अधिक समय पहले शुरू हुई हनुमान स्वरूप धारण करने की परंपरा पानीपत में खासकर लैय्या बिरादरी की देन है। इस समाज में हनुमान स्वरूप को सम्मान की नजर से देखा जाता है। यही वजह है कि इस दौरान कठिन नियमाें का पालन करने की शर्त भी लोगों को डिगा नहीं पाती। आलम यह है कि हर आयु वर्ग के 500 से अधिक लोग लाल लंगोट कस कर मंदिर में बैठे हैं।
जमीन पर पड़ता है सोना
हनुमान स्वरूप दशहरा से ठीक 40 दिन पहले धारण किया जाता है। मगर समय के अभाव में कुछ 20 दिन पहले इसकी शुरूआत करते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य का सख्ती से पालन, जमीन या लकड़ी के तख्त पर सोना, 24 घंटे में एक बार अन्न ग्रहण कराना, नंगे पैर रहना, हनुमान की लाल लंगोट कसने पर ध्यान दिया जाता है। इस अवधि में मंदिर ही उनका ठिकाना होता है।
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अष्टमी सेे लेकर दशहरे के अगले दिन भरत मिलाप पर नगर परिक्रमा का दौर चलता है और इस दौरान हनुमान स्वरूप ढोल नगाड़ों के साथ भक्तों के घर जाते हैं। भक्त अपनी पिछली मन्नत पूरी होने पर उन्हें घर पर आमंत्रित कर उनका खूब सम्मान करते हैं। इन चार दिनाें में हनुमान स्वरूप पूरी तरह से अन्न का भी त्याग कर देते हैं। दशहरे से ठीक दो दिन बाद हरिद्वार पहुंचकर गंगा किनारे हवन-यज्ञ के साथ इसका समापन हो जाता है।
34 साल से धर रहे हैं रूप
पाकिस्तान में इस परंपरा की शुरूआत करने वालाें में से एक भक्त मूलचंद ने 14 वर्ष की आयु में हनुमान स्वरूप धारण किया था और मृत्यु पर्यंत इसे निभाते रहे। अपने पिता के समय में ही उनके बेटे जीवन प्रकाश ने परिवार की परंपरा को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और आज पिछले 34 साल से पूरी शुद्धि के साथ इसे निभाते चले आ रहे हैं।
उनका परिवार पिछले 80 साल से अधिक समय से इस परंपरा का पालन करता चला आ रहा है। उन्होंने बताया कि व्यस्तता की वजह से समय की कमी के चलते कुछ लोग 20 दिन का भी व्रत रखते हैं।
1974 से चला आ रहा है सिलसिला
पं. अशोक वशिष्ठ ने 1974 में हनुमान की मूर्ति उठाना शुरू किया था। वे बताते हैं कि मूूर्ति उठाने से पहले 40 दिन का व्रत रख हनुमान स्वरूप धारण किया जाता है। कठोर तपस्या के दौरान आसपास के घराें में जाकर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं। इंसार बाजार स्थित श्री संकट मोचन हनुमत धाम में बैैठे पं. अशोक वशिष्ठ पूरे दिन भजन व पाठ में लगे रहते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य भी ऐसा रखते हैं कि खाना भी महिला नहीं बल्कि पुरुष द्वारा तैयार किया खाते हैं।
1947 में दो और आज 500 के पार
महावीर बाजार स्थित हनुमान मंदिर में 40 दिन के व्रत के साथ हनुमान स्वरूप धारण कर बेहद अल-मस्त अंदाज में बैठे जीवन प्रकाश ने बताया कि 1947 से अगले कई साल तक पानीपत में सिर्फ भक्त मूलचंद और दुलीचंद हनुमान स्वरूप धारण करते थे। मगर बाद में धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती चली गई।
इस साल इनकी संख्या बढ़कर 500 का आंकड़ा पार कर चुकी है। उन्हाेंने बताया कि इसके पीछे का मकसद हनुमान के आदर्शों का प्रचार-प्रसार करते हुए समाज में फैली सामाजिक कुरीतियों को दूर करना है।
स्वरूप धारण करने के पीछे उनका उद्देश्य पवन-पुत्र हनुमान के आदर्शों का प्रचार-प्रसार कर समाज में फैली कुरीतियाें को दूर करना है। अकेले पानीपत में 500 से ज्यादा लोग ब्रह्मचर्य जैसे कठोर नियमाें का पालन करते हुए हनुमान स्वरूप बनकर मंदिराें में बैठे हैं और इसमें हर आयु के लोग शामिल हैं।
तत्कालीन पाकिस्तान के लैय्या जिले से 80 साल से भी अधिक समय पहले शुरू हुई हनुमान स्वरूप धारण करने की परंपरा पानीपत में खासकर लैय्या बिरादरी की देन है। इस समाज में हनुमान स्वरूप को सम्मान की नजर से देखा जाता है। यही वजह है कि इस दौरान कठिन नियमाें का पालन करने की शर्त भी लोगों को डिगा नहीं पाती। आलम यह है कि हर आयु वर्ग के 500 से अधिक लोग लाल लंगोट कस कर मंदिर में बैठे हैं।
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जमीन पर पड़ता है सोना
हनुमान स्वरूप दशहरा से ठीक 40 दिन पहले धारण किया जाता है। मगर समय के अभाव में कुछ 20 दिन पहले इसकी शुरूआत करते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य का सख्ती से पालन, जमीन या लकड़ी के तख्त पर सोना, 24 घंटे में एक बार अन्न ग्रहण कराना, नंगे पैर रहना, हनुमान की लाल लंगोट कसने पर ध्यान दिया जाता है। इस अवधि में मंदिर ही उनका ठिकाना होता है।
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अष्टमी सेे लेकर दशहरे के अगले दिन भरत मिलाप पर नगर परिक्रमा का दौर चलता है और इस दौरान हनुमान स्वरूप ढोल नगाड़ों के साथ भक्तों के घर जाते हैं। भक्त अपनी पिछली मन्नत पूरी होने पर उन्हें घर पर आमंत्रित कर उनका खूब सम्मान करते हैं। इन चार दिनाें में हनुमान स्वरूप पूरी तरह से अन्न का भी त्याग कर देते हैं। दशहरे से ठीक दो दिन बाद हरिद्वार पहुंचकर गंगा किनारे हवन-यज्ञ के साथ इसका समापन हो जाता है।
34 साल से धर रहे हैं रूप
पाकिस्तान में इस परंपरा की शुरूआत करने वालाें में से एक भक्त मूलचंद ने 14 वर्ष की आयु में हनुमान स्वरूप धारण किया था और मृत्यु पर्यंत इसे निभाते रहे। अपने पिता के समय में ही उनके बेटे जीवन प्रकाश ने परिवार की परंपरा को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और आज पिछले 34 साल से पूरी शुद्धि के साथ इसे निभाते चले आ रहे हैं।
उनका परिवार पिछले 80 साल से अधिक समय से इस परंपरा का पालन करता चला आ रहा है। उन्होंने बताया कि व्यस्तता की वजह से समय की कमी के चलते कुछ लोग 20 दिन का भी व्रत रखते हैं।
1974 से चला आ रहा है सिलसिला
पं. अशोक वशिष्ठ ने 1974 में हनुमान की मूर्ति उठाना शुरू किया था। वे बताते हैं कि मूूर्ति उठाने से पहले 40 दिन का व्रत रख हनुमान स्वरूप धारण किया जाता है। कठोर तपस्या के दौरान आसपास के घराें में जाकर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हैं। इंसार बाजार स्थित श्री संकट मोचन हनुमत धाम में बैैठे पं. अशोक वशिष्ठ पूरे दिन भजन व पाठ में लगे रहते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य भी ऐसा रखते हैं कि खाना भी महिला नहीं बल्कि पुरुष द्वारा तैयार किया खाते हैं।
1947 में दो और आज 500 के पार
महावीर बाजार स्थित हनुमान मंदिर में 40 दिन के व्रत के साथ हनुमान स्वरूप धारण कर बेहद अल-मस्त अंदाज में बैठे जीवन प्रकाश ने बताया कि 1947 से अगले कई साल तक पानीपत में सिर्फ भक्त मूलचंद और दुलीचंद हनुमान स्वरूप धारण करते थे। मगर बाद में धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती चली गई।
इस साल इनकी संख्या बढ़कर 500 का आंकड़ा पार कर चुकी है। उन्हाेंने बताया कि इसके पीछे का मकसद हनुमान के आदर्शों का प्रचार-प्रसार करते हुए समाज में फैली सामाजिक कुरीतियों को दूर करना है।