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Panipat News: हथकरघा के शिल्प गुरु खेमराज सुंदरियाल को मिलेगा पदमश्री पुरस्कार
Sun, 21 Jun 2026 03:34 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
Updated Sun, 21 Jun 2026 03:34 AM IST
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खेमराज सुंदरियाल।
पानीपत। देश की हथकरघा और टेपेस्ट्री बुनाई विरासत को वैश्विक पटल पर चमकाने पानीपत के बुनकर खेमराज सुंदरियाल को राष्ट्रपति भवन में 23 जून को आयोजित होने वाले एक विशेष अलंकरण समारोह में पदमश्री से नवाजा जाएगा। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू उन्हें ये सम्मान प्रदान करेंगी। पुरस्कार की घोषणा के बाद उनके परिवार में खुशी का माहौल है।
खेमराज सुंदरियाल ने बताया कि उनका जन्म पांच फरवरी 1943 को उत्तराखंड के सुमरी गांव में एक साधारण परिवार में जन्म हुआ। उत्तराखंड के श्रीनगर स्थित सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान से हथकरघा प्रौद्योगिकी में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने वर्ष 1967 में दिल्ली के बुनकर सेवा केंद्र से बतौर बुनकर कॅरिअर की शुरुआत की। पांच दशकों से अधिक के अपने सफर में भारतीय वस्त्र परिदृश्य की सूरत बदल दी। उन्होंने बताया कि दिल्ली में आयोजित समारोह में उनके साथ उनके बेटे अजय राज और पुत्रवधु कनक भी जाएगी।
तकनीकी नवाचारों से दी हथकरघा को नई दिशा
सुंदरियाल को हथकरघा क्षेत्र में उनके क्रांतिकारी बदलावों के लिए जाना जाता है। उन्होंने पुंजा दरी लूम में हट्टा तकनीक को शामिल कर बुनकरों की कार्यक्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। इसके अलावा 1980 में पेट्रोफिल परियोजना के तहत हथकरघा में पॉलिएस्टर यार्न की शुरुआत की। 1986 में जैक्वार्ड लूम के माध्यम से वस्त्रों पर जानवरों के सजीव आकार उकेरे। 2001 में ऊनी धागे में पारंपरिक जामदानी बुनाई को बढ़ावा दिया। इसमें कला को नई पहचान दी।
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10 हजार से अधिक शिष्यों को बनाया आत्मनिर्भर
वर्ष 2001 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने पानीपत में द विष्णु हैंडलूम पीसीआईएस लिमिटेड सहकारी समिति की स्थापना की। उन्होंने ललित कला अकादमी और आईआईसीडी जयपुर जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में अतिथि व्याख्याता बनकर 10 हजार से अधिक बुनकरों और छात्रों को प्रशिक्षित किया।
हथकरघा क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए मिले पुरस्कार
हथकरघा क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पहले भी कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। वर्ष 2009 में उन्हें संत कबीर पुरस्कार प्रदान किया गया। 2011 में ठाकुर वेद राम राष्ट्रीय पुरस्कार राष्ट्रीय संस्था और 1999 में दिल्ली राज्य हस्तशिल्प पुरस्कार दिल्ली सरकार की ओर से दिया गया। 2018 में योग्यता प्रमाण पत्र हरियाणा सरकार, वर्ष 2016 में पानीपत जिला प्रशासन ने भी उन्हें हथकरघा के सबसे महत्वपूर्ण प्रचारक के रूप में सम्मानित किया। ब्यूरो
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खेमराज सुंदरियाल ने बताया कि उनका जन्म पांच फरवरी 1943 को उत्तराखंड के सुमरी गांव में एक साधारण परिवार में जन्म हुआ। उत्तराखंड के श्रीनगर स्थित सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान से हथकरघा प्रौद्योगिकी में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने वर्ष 1967 में दिल्ली के बुनकर सेवा केंद्र से बतौर बुनकर कॅरिअर की शुरुआत की। पांच दशकों से अधिक के अपने सफर में भारतीय वस्त्र परिदृश्य की सूरत बदल दी। उन्होंने बताया कि दिल्ली में आयोजित समारोह में उनके साथ उनके बेटे अजय राज और पुत्रवधु कनक भी जाएगी।
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तकनीकी नवाचारों से दी हथकरघा को नई दिशा
सुंदरियाल को हथकरघा क्षेत्र में उनके क्रांतिकारी बदलावों के लिए जाना जाता है। उन्होंने पुंजा दरी लूम में हट्टा तकनीक को शामिल कर बुनकरों की कार्यक्षमता को कई गुना बढ़ा दिया। इसके अलावा 1980 में पेट्रोफिल परियोजना के तहत हथकरघा में पॉलिएस्टर यार्न की शुरुआत की। 1986 में जैक्वार्ड लूम के माध्यम से वस्त्रों पर जानवरों के सजीव आकार उकेरे। 2001 में ऊनी धागे में पारंपरिक जामदानी बुनाई को बढ़ावा दिया। इसमें कला को नई पहचान दी।
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10 हजार से अधिक शिष्यों को बनाया आत्मनिर्भर
वर्ष 2001 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने पानीपत में द विष्णु हैंडलूम पीसीआईएस लिमिटेड सहकारी समिति की स्थापना की। उन्होंने ललित कला अकादमी और आईआईसीडी जयपुर जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में अतिथि व्याख्याता बनकर 10 हजार से अधिक बुनकरों और छात्रों को प्रशिक्षित किया।
हथकरघा क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए मिले पुरस्कार
हथकरघा क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पहले भी कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। वर्ष 2009 में उन्हें संत कबीर पुरस्कार प्रदान किया गया। 2011 में ठाकुर वेद राम राष्ट्रीय पुरस्कार राष्ट्रीय संस्था और 1999 में दिल्ली राज्य हस्तशिल्प पुरस्कार दिल्ली सरकार की ओर से दिया गया। 2018 में योग्यता प्रमाण पत्र हरियाणा सरकार, वर्ष 2016 में पानीपत जिला प्रशासन ने भी उन्हें हथकरघा के सबसे महत्वपूर्ण प्रचारक के रूप में सम्मानित किया। ब्यूरो