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शुभ कर्म तुम्हारे साथ रहेंगे, नहीं चलेगा संग रुपया
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पानीपत। खुली आंख से देखो, खुले कान से सुन लो भैया, शुभ कर्म तुम्हारे साथ रहेंगे, नहीं चलेगा संग रुपैया...। कवि सुभाष भाटिया की इस रचना पर दीर्घा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी। अंकन साहित्यिक मंच की ओर से रविवार को आर्य पीजी कॉलेज में आयोजित मासिक काव्य गोष्ठी में कवियों ने अपनी रचनाओं से लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही सामाजिक, राजनीतिक आदि समस्याओं पर कटाक्ष भी किया। पानीपत के वरिष्ठ कवि हरगोविंद झांब कमल की अध्यक्षता में आयोजित गोष्ठी में देवबंद से आए अंतरराष्ट्रीय शायर गुलजार जिगर देवबंदी बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि के तौर पर उस्मान उस्मानी मौजूद रहे। मंच संचालन प्रसिद्ध शायर सिराज पैकर पानीपती ने किया। सुरेंद्र धीमान बापौली, शौकीन पानीपती, कमर आलम कमर, फिराज बिजनौरी, अमित सतपाल तंवर, अहसानी साहब, सौरभ मासूम, नरेश लाभ, रमेश चंद्र पुहाल पानीपती ने रचनाएं पेश कीं। काव्य गोष्ठी के अंत में अध्यक्षता कर रहे हरगोविंद झांब कमल ने कवियों का धन्यवाद किया और मंच के संयोजक केसर कमल शर्मा ने शायरों का स्वागत किया।
संगोष्ठी में यों बही शब्द सरिता...
पत्थर से टकरा के कहीं टूट न जाए
रिश्तों के आइने को बचाने में लगा हूं।
- केसर कमल शर्मा
अकड़-अंहकार, अलंकार न कोई, ये मानसिक बीमारी है,
डाक्टर- वैद्य के बूते से बाहर लाइलाज यही लाचारी है।
- हरगोविंद झांब कमल
बोझा ढोता, पत्थर ढोता, ढोता है हमारा मलवा भी,
काम वो करता जी जान से, फिर भी हक उनको मिलता नहीं,
महल बनाए हैं उस गरीब ने, पर खुद का घर कभी बना नहीं।
जुल्म हुआ है उस बेबस पर, क्यों हमको इसकी खबर नहीं।।
- रविंद्र सरपंच
फूल के बदले हर एक हाथ में पत्थर होगा।
क्या खबर थी यह मेरे देश का मंजर होगा।
- सिराज पैकर पानीपती
नोंच कर चांद सितारों को गिरा देता है,
गर्दिशे वक्त तो औकात बता देता है।
- सोनिया सोनम अक्स
एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्तां करने को,
हर शाख पर उल्लू बैठा है यारों मेरे वतन का क्या होगा।
- चंद्रशेखर आजाद
कुछ भी कर गुजरने में देर कितनी लगती है,
फूल के बिखरने में देर कितनी लगती है।
- कमलेश पालीवाल
हमेशा मैं खुदा को जानने के दावे करता हूं,
मगर मैं आदमी हूं आदमी को देर से समझा।
- सूबे सिंह सुजान कुरुक्षेत्र
हर ईंट जिसके सर से गुजर कर महल बना,
देखा जब उस गरीब को बेघर मिला मुझे।
- प्रकाश कुरुक्षेत्र
बड़ी बोझिल सी हो गई है जिंदगी आज कल,
चलो कुछ वक्त बुजुर्गों के साथ गुजारा जाए।
- डॉ. बलवान सिंह कुरुक्षेत्र
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संगोष्ठी में यों बही शब्द सरिता...
पत्थर से टकरा के कहीं टूट न जाए
रिश्तों के आइने को बचाने में लगा हूं।
- केसर कमल शर्मा
अकड़-अंहकार, अलंकार न कोई, ये मानसिक बीमारी है,
डाक्टर- वैद्य के बूते से बाहर लाइलाज यही लाचारी है।
- हरगोविंद झांब कमल
बोझा ढोता, पत्थर ढोता, ढोता है हमारा मलवा भी,
काम वो करता जी जान से, फिर भी हक उनको मिलता नहीं,
महल बनाए हैं उस गरीब ने, पर खुद का घर कभी बना नहीं।
जुल्म हुआ है उस बेबस पर, क्यों हमको इसकी खबर नहीं।।
- रविंद्र सरपंच
फूल के बदले हर एक हाथ में पत्थर होगा।
क्या खबर थी यह मेरे देश का मंजर होगा।
- सिराज पैकर पानीपती
नोंच कर चांद सितारों को गिरा देता है,
गर्दिशे वक्त तो औकात बता देता है।
- सोनिया सोनम अक्स
एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्तां करने को,
हर शाख पर उल्लू बैठा है यारों मेरे वतन का क्या होगा।
- चंद्रशेखर आजाद
कुछ भी कर गुजरने में देर कितनी लगती है,
फूल के बिखरने में देर कितनी लगती है।
- कमलेश पालीवाल
हमेशा मैं खुदा को जानने के दावे करता हूं,
मगर मैं आदमी हूं आदमी को देर से समझा।
- सूबे सिंह सुजान कुरुक्षेत्र
हर ईंट जिसके सर से गुजर कर महल बना,
देखा जब उस गरीब को बेघर मिला मुझे।
- प्रकाश कुरुक्षेत्र
बड़ी बोझिल सी हो गई है जिंदगी आज कल,
चलो कुछ वक्त बुजुर्गों के साथ गुजारा जाए।
- डॉ. बलवान सिंह कुरुक्षेत्र