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Panipat News: पानीपत के हथकरघा की बंटवारे के समय टूटती सांसों को गांधी ने दी थी ऑक्सीजन

Thu, 02 Oct 2025 12:20 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत Updated Thu, 02 Oct 2025 12:20 AM IST
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Gandhi gave oxygen to the dying breaths of the handloom workers of Panipat during Partition.
जगमहेंद्र सरोहा
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पानीपत। मुगल साम्राज्य के समय से बुनकरों के शहर के रूप में विख्यात पानीपत के हथकरघा की बंटवारे के समय टूटती सांसों को महात्मा गांधी ने ऑक्सीजन दी थी। वे हथकरघा उद्योग को बचाने के लिए 10 नवंबर 1947 और 2 दिसंबर 1947 को पानीपत आए थे। उन्होंने दोनों बार किला मैदान पर सभा की। पहले पाकिस्तान जाने वाले कारीगरों को रोकने का प्रयास किया, वे नहीं माने तो पाकिस्तान से आने वाले इस पेशे से जुड़े लोगों को पानीपत लाने का फैसला लिया। उनके इस प्रयास का रंग आज प्रदेश व देश ही नहीं पूरा विश्व देख रहा है।
पानीपत में बुने जाने वाले कालीन और दूसरे उत्पाद अब विश्व के कई बड़े देशों और ऊंचे भवनों में पहचान बनाए हुए हैं। पानीपत का घरेलू बाजार ही 80 हजार करोड़ पर पहुंच गया है। वहीं निर्यात 20 हजार करोड़ है। यहां करीब 37 हजार छोटे-बड़े उद्याेग हैं।
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मुगल काल के शाही दरबार के बुनकर यहीं काम करते थे। कारीगर कंबल, कालीन, गलीचे, रजाई, पर्दे और अन्य विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाते थे। पानीपत को इतिहास में भारत के बुनकरों का शहर भी कहा जाता है। इतिहासकार एडवोकेट राममोहन राय ने बताया कि कांग्रेसी नेता मौलवी लकाउल्ला ने महात्मा गांधी को पानीपत आकर कारीगरों को रोकने की बात की। वह 10 नवंबर, 1947 को किला मैदान पर पहुंचे थे। गांधी को यहां विरोध का भी सामना करना पड़ा था। कामरेड टीका राम उनको किला स्थित लाइब्रेरी ले गए थे।
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गांधी दूसरी बार 2 दिसंबर 1947 को पानीपत के किला मैदान पर ही आए। उस्ताद नंदलाल ने पानीपत के हथकरघा उद्योग को बचाने के लिए सुझाव दिए थे। उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के हैदराबाद में लोग इस तरह का काम करते हैं। वहां से बड़ी संख्या में लोग रोहतक व अन्य शहरों के कैंप में हैं। तब उन कैंपों में रहने वाले लोगों को पानीपत लाने का फैसला किया। उक्त लोगों ने पानीपत के उद्योग को संभाला और आज पानीपत का उद्योग अति आधुनिक मशीनों पर चलने लगा है।

उद्योग लोगों की अपनी मेहनत
हरियाणा चैंबर ऑफ कॉमर्स पानीपत चैप्टर के प्रधान विनोद धमीजा ने बताया कि उनके बड़ों ने हथकरघा को संभाला और दिनरात मेहनत की। इसके बाद उन्होंने काम संभाला। तब जाकर उद्योग बना है। इसमें एक नहीं तीन पीढि़यों ने अपनी मेहनत से पसीना बहाया है। सेक्टर-25 के अश्वनी शर्मा ने बताया कि उनके दादा हकीम पंडित सावन राम पाकिस्तान के मियांवाला जिला के हैदराबाद गांव से पानीपत आए थे। उन्होंने यहां पहले हकीम का काम किया और फिर हथकरघा को संभाला। भाजपा के वरिष्ठ नेता नवीन भाटिया ने बताया कि उनका पाकिस्तान में बड़ा काम था। उनके पूर्वज बंटवारे के समय हिंदुस्तान आ गए थे। उन्होंने हथकरघा में मेहनत की और आज उद्योग भी बनाए हैं।


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