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Panipat News: बताए पराली न जलाने और फसल अवशेष प्रबंधन के फायदे
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पानीपत। अमर उजाला की ओर से मतलौडा खंड के शेरा गांव के सरपंच सुरेंद्र सिंह के मीटिंग हाल में शुक्रवार को किसान चौपाल का आयोजन किया गया। इसमें करीब सौ किसान शामिल हुए। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को पराली और धान के अवशेषों के प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कृषि उपनिदेशक डॉ. आदित्य डबास ने किसानों को पराली न जलाने और फसल अवशेष प्रबंधन करने का आह्वान किया।
कृषि विकास अधिकारी डॉ. वजीर सिंह ने कहा कि भूमि की उर्वरा शक्ति बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है। किसान अपनी फसल के अवशेष को जलाने की बजाय निस्तारण कर भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाएं। किसान पराली प्रबंधन के लिए विभागीय पोर्टल पर 30 नवंबर तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। सुपरवाइजर सतिन कुमार ने कहा कि सरकार द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन के लिए कई योजना चला रही हैं। किसान इन योजनाओं का लाभ उठाकर फसल अवशेष प्रबंधन कर सकते हैं। पराली का प्रबंधन करने वाले किसानों को प्रति एकड़ एक हजार रुपये प्रोत्साहन राशि दी जाती है। एटीएम जगफूल राठी ने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन स्कीम के तहत किसानों को पराली न जलाने व उसके उचित उपयोग के बारे में जागरूकता अभियान चलाने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। कृषि विभाग द्वारा पराली प्रबंधन के लिए किसानों को मशीनें उपलब्ध करवाई जा रही हैं। सहायक जोगेंद्र भालसी कहा कि पराली जलाने की घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाने की व्यापक रणनीति बनाकर काम किया जा रहा है। ग्राम पंचायत सरपंच सुरेंद्र सिंह ने कृषि विशेषज्ञों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि किसान अब पराली नहीं जलाने को लेकर जागरूक हुए हैं। फसल अवशेषों का निपटारा करना पराली के किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। सरकार को किसानों की समस्या को देखते हुए जरूरी उपकरण समय पर उपलब्ध करवाने चाहिए। इसके साथ पोर्टल में आ रही खामियों को दूर किया जाएं। इस अवसर पर रामकरण, जोगेंद्र भालसी व बलवान लोहारी मौजूद रहे।
किसानों ने रखी अपनी बात
कोट्स फोटो
छोटे किसानों की तरफ सरकारों को ध्यान नहीं
किसान ओमप्रकाश ने बताया कि पराली प्रबंधन की मशीनरी बहुत महंगी हैं। एक एकड़ में पराली को नष्ट करने के लिए कई हजार का डीजल लग जाता है। छोटे किसानों की तरफ सरकारों को ध्यान नहीं है। ये किसान पराली जलाने को मजबूर होता है।
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कोट्स फोटो
पराली का निपटारा करना किसानों के लिए बड़ी चुनौती
किसान सूरज सिंह ने बताया कि पराली का निपटारा करना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। किसानों को आगामी फसल के लिए खेत तैयार करना होता है। पराली प्रबंधन में एक माह से अधिक का समय लगता है। इतने दिन किसान इंतजार नहीं कर सकता।
कोट्स फोटो
पोर्टल की खामियों से समय से नहीं हो रहा पंजीकरण
किसान नरेंद्र कुमार ने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन के लिए किसानों को ब्योरा पोर्टल पर देना अनिवार्य है, लेकिन पोर्टल अक्सर बंद रहता है। पोर्टल की खामियों की वजह से किसान समय पर पंजीकरण नहीं करा पाते। कई बार दूसरे किसानों का पंजीकरण पाया जाता है।
कोट्स फोटो
सही तरह से कराएं पंजीकरण
जितेंद्र सिंह ने कहा कि पोर्टल पर किसी किसान के रकबा नंबर पर दूसरे किसानों का पंजीकरण पाया जाना पोर्टल की सबसे बड़ी खामी है। सरकार को चाहिए कि जिस रकबे का किसान मालिक है, उसी का पंजीकरण हों।
कोट्स फोटो
अवशेष प्रबंधन के आ रहे सकारात्मक नतीजे
रामकरण ने कहा कि फसल अवशेष प्रबंधन के उपायों के अब सकारात्मक नतीजे सामने आने लगे हैं। किसान पराली की गांठ बनवाकर फसल अवशेषों के निपटान में जुटे हैं। इससे किसान को फायदा हो रहा है। किसान फसल अवशेषों को जलाने की बजाय प्रबंधन कर रहा है।
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कृषि विकास अधिकारी डॉ. वजीर सिंह ने कहा कि भूमि की उर्वरा शक्ति बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है। किसान अपनी फसल के अवशेष को जलाने की बजाय निस्तारण कर भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाएं। किसान पराली प्रबंधन के लिए विभागीय पोर्टल पर 30 नवंबर तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। सुपरवाइजर सतिन कुमार ने कहा कि सरकार द्वारा फसल अवशेष प्रबंधन के लिए कई योजना चला रही हैं। किसान इन योजनाओं का लाभ उठाकर फसल अवशेष प्रबंधन कर सकते हैं। पराली का प्रबंधन करने वाले किसानों को प्रति एकड़ एक हजार रुपये प्रोत्साहन राशि दी जाती है। एटीएम जगफूल राठी ने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन स्कीम के तहत किसानों को पराली न जलाने व उसके उचित उपयोग के बारे में जागरूकता अभियान चलाने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। कृषि विभाग द्वारा पराली प्रबंधन के लिए किसानों को मशीनें उपलब्ध करवाई जा रही हैं। सहायक जोगेंद्र भालसी कहा कि पराली जलाने की घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाने की व्यापक रणनीति बनाकर काम किया जा रहा है। ग्राम पंचायत सरपंच सुरेंद्र सिंह ने कृषि विशेषज्ञों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि किसान अब पराली नहीं जलाने को लेकर जागरूक हुए हैं। फसल अवशेषों का निपटारा करना पराली के किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। सरकार को किसानों की समस्या को देखते हुए जरूरी उपकरण समय पर उपलब्ध करवाने चाहिए। इसके साथ पोर्टल में आ रही खामियों को दूर किया जाएं। इस अवसर पर रामकरण, जोगेंद्र भालसी व बलवान लोहारी मौजूद रहे।
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किसानों ने रखी अपनी बात
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छोटे किसानों की तरफ सरकारों को ध्यान नहीं
किसान ओमप्रकाश ने बताया कि पराली प्रबंधन की मशीनरी बहुत महंगी हैं। एक एकड़ में पराली को नष्ट करने के लिए कई हजार का डीजल लग जाता है। छोटे किसानों की तरफ सरकारों को ध्यान नहीं है। ये किसान पराली जलाने को मजबूर होता है।
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पराली का निपटारा करना किसानों के लिए बड़ी चुनौती
किसान सूरज सिंह ने बताया कि पराली का निपटारा करना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। किसानों को आगामी फसल के लिए खेत तैयार करना होता है। पराली प्रबंधन में एक माह से अधिक का समय लगता है। इतने दिन किसान इंतजार नहीं कर सकता।
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पोर्टल की खामियों से समय से नहीं हो रहा पंजीकरण
किसान नरेंद्र कुमार ने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन के लिए किसानों को ब्योरा पोर्टल पर देना अनिवार्य है, लेकिन पोर्टल अक्सर बंद रहता है। पोर्टल की खामियों की वजह से किसान समय पर पंजीकरण नहीं करा पाते। कई बार दूसरे किसानों का पंजीकरण पाया जाता है।
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सही तरह से कराएं पंजीकरण
जितेंद्र सिंह ने कहा कि पोर्टल पर किसी किसान के रकबा नंबर पर दूसरे किसानों का पंजीकरण पाया जाना पोर्टल की सबसे बड़ी खामी है। सरकार को चाहिए कि जिस रकबे का किसान मालिक है, उसी का पंजीकरण हों।
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अवशेष प्रबंधन के आ रहे सकारात्मक नतीजे
रामकरण ने कहा कि फसल अवशेष प्रबंधन के उपायों के अब सकारात्मक नतीजे सामने आने लगे हैं। किसान पराली की गांठ बनवाकर फसल अवशेषों के निपटान में जुटे हैं। इससे किसान को फायदा हो रहा है। किसान फसल अवशेषों को जलाने की बजाय प्रबंधन कर रहा है।