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प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान भी नहीं बचा पा रहा गर्भवतियों को डेढ़ साल में 29 की मौत, 5 साल तक के 550 बच्चों की गई जान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 10 Oct 2019 01:39 AM IST
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डिलीवरी के दौरान गर्भवती महिलाओं और शिशुओं की जान बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग बीते दो वर्ष से हर महीने कैंप लगा रहा है, इसके बावजूद घरों में हो रही डिलीवरी पर स्वास्थ्य विभाग लगाम नहीं लगा सका है। इतना ही नहीं बीते डेढ़ वर्ष में डिलीवरी के दौरान 29 गर्भवती महिलाओं की मौत हो चुकी और सबसे बड़ी बात इन कैंपों के बावजूद आज भी जिले की 65 फीसदी गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है। नतीजा प्रिमैच्योर डिलीवरी की संख्या बढ़ गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो रोज औसतन चार शिशु प्रीमैच्योर पैैदा हो रहे हैं। यह आंकड़े स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है, जिसके लिए दो वर्ष से कैंप लगा रहे हैं, उसमे उनको सफलता नहीं मिल सकी है। ऐसे में कहीं न कहीं कमी है, नतीजा बच्चों की डिलीवरी के दौरान माताओं की मौत हो रही है और कमजोर बच्चे पैदा हो रहे हैं। बुधवार को लगे कैंप में 550 गर्भवतियों की जांच की गई, 70 महिलाएं हाई रिस्क प्रैग्नेंसी के दायरे में मिली।
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स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं को बचाने, प्री मैच्योर डिलीवरी रोकने, घरों में दाइयों की ओर से डिलीवरी कराने और शिशु मृत्यु दर को रोकने में इतने खर्च के बावजूद नाकाम साबित हो रहा है। पिछले 5 माह में 188 प्री मैच्योर डिलीवरी हुई हैं। स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ रखने के लिए हर माह की 9 की तारीख को प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान के तहत जिले के सरकारी अस्पताल समेत 13 केंद्रों पर गर्भवती चेकअप कैंप लगाया जाता है। औसतन 600-650 प्रसूताओं की यहां जांच होती है। हर माह 60-80 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दायरे में मिलती है।
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दो साल में 550 शिशुओं की मौत-
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार पानीपत में पिछले डेढ़ साल में 2310 महिलाओं की डिलीवरी घर पर हुई है। यह संख्या जिले भर में हुए प्रसव की 7.5 प्रतिशत है। पानीपत में पिछले डेढ़ साल में डिलीवरी दौरान 29 महिलाओं की मौत हुई। इनमें से अधिकतर महिलाएं वो हैं जिन्होंने दाई से डिलीवरी कराने का प्रयास किया। जब उनकी स्थिति बिगड़ी तो उनको सिविल अस्पताल लाया गया, जहां तबियत गंभीर होने पर उनकी मौत हो गई। जिले में विभिन्न कारणों से दो साल में एक से पांच वर्ष की आयु के 550 नवजातों की मौत हुई। स्वास्थ्य विभाग सरकार के निर्देशों के बाद भी आज तक दाईयों के खिलाफ केस दर्ज नहीं करवा पाया है। जबकि जिले में लगभग 150 दाई सक्रिय है।
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सरकारी अस्पतालों में ये मिलती है सुविधा:
1. सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में डिलिवरी कराने पर सरकार की ओर से गरीब परिवारों को 1500 रुपये मिलते हैं।
2. गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने के लिए सरकार की ओर फ्री सेवा है।
3. जन्म के 42 दिन बाद तक नवजात व 30 दिन तक महिला को अस्पताल आने जाने के लिए फ्री एंबुलेंस है।
4. डिलिवरी के बाद जच्चा को साफ टांगे लगते हैं। इससे उनमे संक्रमण का खतरा नहीं रहता।
5. किसी भी आपातकाल की स्थिति में जच्चा की केयर के लिए गायनोकॉलॉजिस्ट व बच्चे के लिए बाल रोग विशेषज्ञ होता है।
पिछले डेढ़ साल में हुई 29 महिलाओं की मौत-
2018 में जिले में कुल 28030 डिलीवरी हुई है। सरकारी अस्पताल में 15305 डिलीवरी हुई है, जबकि निजी अस्पताल में 11415 व होम डिलीवरी 1310 हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 29 गर्भवती महिलाओं की इस दौरान मौत हुई है। 2019 में अब तक लगभग 25 हजार डिलिवरी हुई है। इनमें से लगभग 1400 डिलीवरी घर पर हुई हैं।
इन कारणों से नहीं बंद हो रही घर में डिलीवरी
सबसे ज्यादा दाई सनौली, बापौली व यमुना से सटे गांवों में सक्रिय है। इन क्षेत्र में डॉक्टरों के अनुसार 150 दाई सक्रिय है। विभाग कई बार इनको घर पर डिलीवरी न करने की चेतावनी दे चुका है। फिर भी इन्हीं क्षेत्रों से डिलिवरी के अधिक मामले सामने आते हैं। इसका बड़ा कारण जागरूकता की कमी, शिक्षा का अभाव, स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्रवाई, स्वास्थ्य विभाग की ग्राउंड स्तर पर पहुंच की कमी होम डिलिवरी का बड़ा कारण है।
प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है-
जिले में लगातार प्री मैच्योर डिलीवरी बढ़ रही है। सिविल अस्पताल में हर रोज 30 से 35 डिलीवरी होती है। इनमें औसतन 4-5 प्री मैच्योर डिलीवरी होती है। प्री मैच्योर डिलिवरी का बड़ा कारण महिलाओं में संक्रमण, हाइपरटेंशन और प्री एक्लेम्शिया, खून की कमी व हाई ग्रेड फीवर है।
वीरवार को 13 स्वास्थ्य केंद्र पर 590 महिलाओं की हुई जांच-
प्रधानमंत्री मातृत्व सुरक्षा अभियान के तहत जिले भर के 13 स्वास्थ्य केंद्रों पर 17 डॉक्टरों ने 590 गर्भवती महिलाओं की जांच की। जांच में 65 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी मिली। 70 महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी के दायरे में पाई गई। इनको सिविल अस्पताल रेफर किया गया। सभी डॉक्टरों ने शाम तक अपनी रिपोर्ट सिविल सर्जन कार्यालय में जमा कराई।

होम डिलीवरी रोकने के लिए स्वास्थ्य विभाग प्रयासरत है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में गर्भवती महिलाओं के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाएं भी है, लेकिन होम डिलिवरी का बड़ा कारण अशिक्षा और जागरूकता की कमी है। उनका प्रयास है कि लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचे और उन्हें जागरूक किया जाए। दाईयों पर भी अंकुश लगाने के प्रयास जारी है।डॉ. जितेंद्र कादियान, सिविल सर्जन पानीपत।
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