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झुकना केवल शिष्टाचार नहीं : अरुण चंद्र मुनि
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- अग्रवाल मंडी स्थित जैन स्थानक में अरुण चंद्र महाराज ने किए प्रवचन
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अग्रवाल मंडी स्थित जैन स्थानक में मंगलवार को युवा प्रेरक अरुण चंद्र महाराज ने प्रवचन किए। उन्होंने कहा कि आज की वंदना केवल औपचारिकता बन गई है। मन के बिना की गई वंदना शुष्क होती है। वह आत्मा को नहीं छूती। वंदना वह है जो आत्मा को झुका दे और गुरु चरणों में समर्पण का भाव जगा दे। समय निकालकर समझ से और संपूर्ण भाव से वंदना करें। गुरु की वंदना वह वायु है जो भीतर के ताप को शांत करती है, दुखों को हरती है और आत्मा को सुकून देती है। वंदना कभी बहरूपिया बनकर न करें। मन, वचन और काय तीनों से एकरूप होकर झुकें।
उन्होंने कहा कि झुकना केवल शिष्टाचार नहीं वह आत्म-समीक्षा है। गुरु-दर्शन से आत्म-दर्शन की यात्रा शुरू होती है। प्रेम ही सच्चा धर्म है। प्रेम से ध्यान में प्रवेश होता है और ध्यान से भगवान के दर्शन संभव होते हैं। प्रेम, ज्ञान और तप का संगम ही वंदना को सफल बनाता है। प्रवचन सभा के अंत में मुनि ने, मेरे घर के आगे गुरुवर एक स्थानक बन जाए, जब खिड़की खोलूं तो तेरे दर्शन हो जाए...भजन गाया। इस पर पूरा सभागार झूम उठा। इस अवसर पर मुनि के साथ उनके शिष्य अभिषेक मुनि, अभिनंदन मुनि पाट पर विराजमान रहे।
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संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। अग्रवाल मंडी स्थित जैन स्थानक में मंगलवार को युवा प्रेरक अरुण चंद्र महाराज ने प्रवचन किए। उन्होंने कहा कि आज की वंदना केवल औपचारिकता बन गई है। मन के बिना की गई वंदना शुष्क होती है। वह आत्मा को नहीं छूती। वंदना वह है जो आत्मा को झुका दे और गुरु चरणों में समर्पण का भाव जगा दे। समय निकालकर समझ से और संपूर्ण भाव से वंदना करें। गुरु की वंदना वह वायु है जो भीतर के ताप को शांत करती है, दुखों को हरती है और आत्मा को सुकून देती है। वंदना कभी बहरूपिया बनकर न करें। मन, वचन और काय तीनों से एकरूप होकर झुकें।
उन्होंने कहा कि झुकना केवल शिष्टाचार नहीं वह आत्म-समीक्षा है। गुरु-दर्शन से आत्म-दर्शन की यात्रा शुरू होती है। प्रेम ही सच्चा धर्म है। प्रेम से ध्यान में प्रवेश होता है और ध्यान से भगवान के दर्शन संभव होते हैं। प्रेम, ज्ञान और तप का संगम ही वंदना को सफल बनाता है। प्रवचन सभा के अंत में मुनि ने, मेरे घर के आगे गुरुवर एक स्थानक बन जाए, जब खिड़की खोलूं तो तेरे दर्शन हो जाए...भजन गाया। इस पर पूरा सभागार झूम उठा। इस अवसर पर मुनि के साथ उनके शिष्य अभिषेक मुनि, अभिनंदन मुनि पाट पर विराजमान रहे।
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