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अहोई अष्टमी व्रत आज, बन रहे तीन विशेष योग, माताओं को पूजा के लिए मिलेगा 1 घंटे 17 मिनट का समय
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पानीपत। संतान की दीर्घायु एवं सुखी जीवन के लिए आज वीरवार को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाएगा। यह व्रत करवाचौथ के चार दिन बाद और दीपावली से आठ दिन पूर्व रखा जाता है। इस बार अहोई अष्टमी पर तीन विशेष योगों के बीच माताएं उपवास रखेंगी। इसमें सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और गुरु पुष्य योग एक साथ बन रहे हैं। इन योगों में पुष्य नक्षत्र को सभी नक्षत्रों का सम्राट कहा जाता है। वीरवार को गुरु पुष्य नक्षत्र योग होने से काफी लाभ मिलता है। ऐसे में इस बार अहोई व्रत का फल माताओं को कई गुना ज्यादा मिलेगा।
पंडित वेद पराशर ने बताया कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को संतान के सुख और समृद्धि जीवन के लिए अहोई अष्टमी को व्रत रखा जाता है। 28 अक्तूबर को शाम 5:39 से शाम 6:56 बजे तक अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त है। अहोई अष्टमी के दिन अहोई माता की पूजा का मुहूर्त शाम को 01 घंटे 17 मिनट का है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत कर अहोई माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। इस व्रत में शाम को तारों को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद ही व्रत पूरा होता है।
तारे निकलने के बाद की जाती है अहोई माता की पूजा
तारे निकलने के बाद अहोई माता की पूजा की जाती है। इस व्रत में कथा सुनते समय हाथों में सात प्रकार के अनाज होने चाहिए और पूजा के बाद यह अनाज गाय को खिलाया जाता है। इस व्रत में मुख्य रूप से मां पार्वती की पूजा की जाती है। मां पार्वती के साथ ही मां स्याऊ की भी पूजा करनी चाहिए।
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जमीन की खुदाई व सब्जी-फल काटने की होती है मनाही
इस दिन व्रत रखते वाली महिलाओं को कुछ बातों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। व्रत के दौरान माताएं जमीन में खुदाई न करें और सब्जी या फल आदि न काटें। इससे संतान को कष्ट होता है। पंडित राधे-राधे ने बताया कि इस दिन भगवान शिव एवं माता पार्वती को दूध, चावल का भोग लगाकर चांदी की नौ मूर्तियों को माला में पिरोकर धारण करना चाहिए। अहोई अष्टमी का व्रत जीवन में होने वाली अनहोनी और घटनाओं से रक्षा करता है। साथ ही संतान प्राप्ति में भी यह व्रत लाभकारी है।
इस प्रकार करें अहोई माता का पूजन
पंडित वेद पराशर के अनुसार अहोई माता की आकृति दीवार पर गेरू के घोल से बनाएं। सूर्यास्त होते ही अहोई का व्रत पूजन करें। सामग्री में एक चांदी या सफेद धातु की अहोई, चांदी की मोती की माला, जल से भरा हुआ कलश, दूध, हलवा, गन्ना, सिंघाड़े व पुष्प तथा दीप के साथ पूजा करें। कथा सुनते समय हाथ में गेहूं के सात दाने व दक्षिणा रखें। वहीं शाम को तारों को अर्घ्य देकर व्रत संपन्न करें।
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पंडित वेद पराशर ने बताया कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को संतान के सुख और समृद्धि जीवन के लिए अहोई अष्टमी को व्रत रखा जाता है। 28 अक्तूबर को शाम 5:39 से शाम 6:56 बजे तक अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त है। अहोई अष्टमी के दिन अहोई माता की पूजा का मुहूर्त शाम को 01 घंटे 17 मिनट का है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत कर अहोई माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। इस व्रत में शाम को तारों को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद ही व्रत पूरा होता है।
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तारे निकलने के बाद की जाती है अहोई माता की पूजा
तारे निकलने के बाद अहोई माता की पूजा की जाती है। इस व्रत में कथा सुनते समय हाथों में सात प्रकार के अनाज होने चाहिए और पूजा के बाद यह अनाज गाय को खिलाया जाता है। इस व्रत में मुख्य रूप से मां पार्वती की पूजा की जाती है। मां पार्वती के साथ ही मां स्याऊ की भी पूजा करनी चाहिए।
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जमीन की खुदाई व सब्जी-फल काटने की होती है मनाही
इस दिन व्रत रखते वाली महिलाओं को कुछ बातों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। व्रत के दौरान माताएं जमीन में खुदाई न करें और सब्जी या फल आदि न काटें। इससे संतान को कष्ट होता है। पंडित राधे-राधे ने बताया कि इस दिन भगवान शिव एवं माता पार्वती को दूध, चावल का भोग लगाकर चांदी की नौ मूर्तियों को माला में पिरोकर धारण करना चाहिए। अहोई अष्टमी का व्रत जीवन में होने वाली अनहोनी और घटनाओं से रक्षा करता है। साथ ही संतान प्राप्ति में भी यह व्रत लाभकारी है।
इस प्रकार करें अहोई माता का पूजन
पंडित वेद पराशर के अनुसार अहोई माता की आकृति दीवार पर गेरू के घोल से बनाएं। सूर्यास्त होते ही अहोई का व्रत पूजन करें। सामग्री में एक चांदी या सफेद धातु की अहोई, चांदी की मोती की माला, जल से भरा हुआ कलश, दूध, हलवा, गन्ना, सिंघाड़े व पुष्प तथा दीप के साथ पूजा करें। कथा सुनते समय हाथ में गेहूं के सात दाने व दक्षिणा रखें। वहीं शाम को तारों को अर्घ्य देकर व्रत संपन्न करें।