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इंजेक्शन के बाद बच्चे की मौत!
अमर उजाला, पानीपत
Updated Mon, 21 Oct 2013 09:49 PM IST
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पानीपत। सिविल अस्पताल में इंजेक्शन लगने के आधा घंटे बाद ही सात साल के एक बच्चे की संदिग्ध हालात में मौत हो गई। वह कुरुक्षेत्र का रहने वाला था और रैबिस से पीड़ित था।
कुरुक्षेत्र में इलाज के बाद आराम नहीं मिलने पर रिश्तेदार के बुलाने पर पानीपत आया था। डॉक्टरों ने बच्चे की मौत को छिपाने का प्रयास किया और बिना पोस्टमार्टम कराए आनन-फानन में शव परिजनों को सौंप दिया। उसकी मौत का खुलासा होने के बाद डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया।
कुरुक्षेत्र निवासी संजय सोमवार सुबह अपने सात साल के बेटे सूरज को सिविल अस्पताल पानीपत में रैबिज का टीका लगाने आया था। उसने सिविल अस्पताल में पर्ची बना ली और इंजेक्शन लगा लिया। यहां इंजेक्शन लगने के कुछ देर बाद सूरज (7) की तबीयत बिगड़ गई। बाद में सिविल अस्पताल के इमरजेंसी में तैनात डॉक्टरों ने सूरज को मृत घोषित कर दिया।
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कुरुक्षेत्र में भी कराया था इलाज
संजय ने बताया कि एक सप्ताह पहले उसके लड़के को कुत्ते ने काट लिया था और कुरुक्षेत्र में इलाज कराया। लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। पानीपत की राजीव कॉलोनी में रहने वाली उनकी रिश्तेदार सलमा से बात की और उसने पानीपत के सिविल अस्पताल में इंजेक्शन लगाने की बात कही। वह उसकी बात मानकर पानीपत आ गया।
डॉक्टर और अधिकारी भी खिसके
सिविल अस्पताल में इंजेक्शन लगने के बाद बच्चे की मौत होने पर डॉक्टर और अधिकारी वहां से खिसक गए। हर कोई अपनी कुर्सी बचाने के प्रयास में था। इसी कारण डॉक्टरों ने मृत बच्चे की रजिस्टर में एंट्री तक नहीं की। इमरजेंसी में ड्यूटी दे रही एक मेडिकल अफसर की हालत सबसे ज्यादा खराब थी। वह दूसरी डॉक्टर के कोर्ट में होने के कारण ड्यूटी दे रही थी।
मौत को दबाने का किया प्रयास
बताया जाता है कि अस्पताल प्रशासन ने इंजेक्शन लगने के बाद बच्चे की मौत को छिपाने के प्रयास किए। लेकिन उनके सब प्रयास धरे रह गए। डॉक्टर कहते रहे कि सूरज नाम का कोई मरीज नहीं आया। लेकिन निदेशालय से मांगी सूचना के बाद पूरे मामले से पर्दा उठता गया। इसमें पता लगा कि सूरज के नाम की सुबह नौ बजे एक पर्ची बनाई गई। डॉक्टरों ने रैबिज का इंजेक्शन लगाने के लिए सौ रुपये की रसीद कटवाने की बात कही। इसका नंबर 290/111 है। यह पर्ची भी सूरज नाम से काटी गई है, लेकिन इमरजेंसी में मृत घोषित होने के बाद किसी तरह का रिकार्ड नहीं चढ़ाया गया और न ही परिजनों से कुछ लिखवाकर लिया गया।
निदेशालय की घंटी ने खोली आंख
स्वास्थ्य विभाग और सिविल अस्पताल के चिकित्सक बच्चे की मौत के बाद पूरी तरह से बेखबर थे। मीडियाकर्मियों ने बच्चे की मौत की जानकारी मांगी तो हर किसी ने अज्ञानता दिखाई। इसी समय स्वास्थ्य विभाग के निदेशालय से बच्चे की मौत के बारे में फोन घनघना उठे। एक घंटी में ही डॉक्टरों की आंखें खुल गई और रिकार्ड तलब किया। कार्यकारी एमएस डॉ. सतीश गुप्ता ने अस्पताल का सारा रिकार्ड चेक किया। अस्पताल के किसी भी रिकार्ड में बच्चे को मृत नहीं दिखाया।
ऐसे लगता है टीका
डॉक्टरों की माने तो कुत्ते के काटने के इलाज का पूरा कोर्स होता है। पहला टीका शून्य से 3, दूसरा 3 से 7 और तीसरी टीका 7 से 14 दिन तक लगाया जाता है। इस कोर्स में आराम नहीं मिलने पर मरीज को 14 दिन बाद फिर से एक और इंजेक्शन लगाया जाता है।
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कुरुक्षेत्र में इलाज के बाद आराम नहीं मिलने पर रिश्तेदार के बुलाने पर पानीपत आया था। डॉक्टरों ने बच्चे की मौत को छिपाने का प्रयास किया और बिना पोस्टमार्टम कराए आनन-फानन में शव परिजनों को सौंप दिया। उसकी मौत का खुलासा होने के बाद डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया।
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कुरुक्षेत्र निवासी संजय सोमवार सुबह अपने सात साल के बेटे सूरज को सिविल अस्पताल पानीपत में रैबिज का टीका लगाने आया था। उसने सिविल अस्पताल में पर्ची बना ली और इंजेक्शन लगा लिया। यहां इंजेक्शन लगने के कुछ देर बाद सूरज (7) की तबीयत बिगड़ गई। बाद में सिविल अस्पताल के इमरजेंसी में तैनात डॉक्टरों ने सूरज को मृत घोषित कर दिया।
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कुरुक्षेत्र में भी कराया था इलाज
संजय ने बताया कि एक सप्ताह पहले उसके लड़के को कुत्ते ने काट लिया था और कुरुक्षेत्र में इलाज कराया। लेकिन वह ठीक नहीं हुआ। पानीपत की राजीव कॉलोनी में रहने वाली उनकी रिश्तेदार सलमा से बात की और उसने पानीपत के सिविल अस्पताल में इंजेक्शन लगाने की बात कही। वह उसकी बात मानकर पानीपत आ गया।
डॉक्टर और अधिकारी भी खिसके
सिविल अस्पताल में इंजेक्शन लगने के बाद बच्चे की मौत होने पर डॉक्टर और अधिकारी वहां से खिसक गए। हर कोई अपनी कुर्सी बचाने के प्रयास में था। इसी कारण डॉक्टरों ने मृत बच्चे की रजिस्टर में एंट्री तक नहीं की। इमरजेंसी में ड्यूटी दे रही एक मेडिकल अफसर की हालत सबसे ज्यादा खराब थी। वह दूसरी डॉक्टर के कोर्ट में होने के कारण ड्यूटी दे रही थी।
मौत को दबाने का किया प्रयास
बताया जाता है कि अस्पताल प्रशासन ने इंजेक्शन लगने के बाद बच्चे की मौत को छिपाने के प्रयास किए। लेकिन उनके सब प्रयास धरे रह गए। डॉक्टर कहते रहे कि सूरज नाम का कोई मरीज नहीं आया। लेकिन निदेशालय से मांगी सूचना के बाद पूरे मामले से पर्दा उठता गया। इसमें पता लगा कि सूरज के नाम की सुबह नौ बजे एक पर्ची बनाई गई। डॉक्टरों ने रैबिज का इंजेक्शन लगाने के लिए सौ रुपये की रसीद कटवाने की बात कही। इसका नंबर 290/111 है। यह पर्ची भी सूरज नाम से काटी गई है, लेकिन इमरजेंसी में मृत घोषित होने के बाद किसी तरह का रिकार्ड नहीं चढ़ाया गया और न ही परिजनों से कुछ लिखवाकर लिया गया।
निदेशालय की घंटी ने खोली आंख
स्वास्थ्य विभाग और सिविल अस्पताल के चिकित्सक बच्चे की मौत के बाद पूरी तरह से बेखबर थे। मीडियाकर्मियों ने बच्चे की मौत की जानकारी मांगी तो हर किसी ने अज्ञानता दिखाई। इसी समय स्वास्थ्य विभाग के निदेशालय से बच्चे की मौत के बारे में फोन घनघना उठे। एक घंटी में ही डॉक्टरों की आंखें खुल गई और रिकार्ड तलब किया। कार्यकारी एमएस डॉ. सतीश गुप्ता ने अस्पताल का सारा रिकार्ड चेक किया। अस्पताल के किसी भी रिकार्ड में बच्चे को मृत नहीं दिखाया।
ऐसे लगता है टीका
डॉक्टरों की माने तो कुत्ते के काटने के इलाज का पूरा कोर्स होता है। पहला टीका शून्य से 3, दूसरा 3 से 7 और तीसरी टीका 7 से 14 दिन तक लगाया जाता है। इस कोर्स में आराम नहीं मिलने पर मरीज को 14 दिन बाद फिर से एक और इंजेक्शन लगाया जाता है।