फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Panipat News ›   अब्दाली से नहीं भयंकर अकाल से हारे थे मराठा

अब्दाली से नहीं भयंकर अकाल से हारे थे मराठा

Mon, 14 Jan 2019 01:18 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Mon, 14 Jan 2019 01:18 AM IST
विज्ञापन
अब्दाली से नहीं भयंकर अकाल से हारे थे मराठा
अब्दाली से नहीं भयंकर अकाल से हारे थे मराठा
विज्ञापन

पानीपत। पानीपत की धरती पर 258 साल पहले 18वीं शताब्दी का सबसे खतरनाक युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध में अफगानी हमलावर अहमदशाह अब्दाली व मराठा सेना को जान माल का भारी नुकसान हुआ था। युद्ध में जान माल के भारी नुकसान से भयग्रस्त अब्दाली, दिल्ली के सिंहासन पर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था और सीधे अफगानिस्तान चला गया था। जबकि पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद फिर किसी विदेश अक्रांता की हिम्मत खैबर के दर्रे से भारत पर हमला करने की नहीं हुई। इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि पानीपत के तीसरा युद्ध की नींव 10 जनवरी 1760 को अफगानी हमलावर अहमद शाह अब्दाली द्वारा दिल्ली में मराठा सेनापति दत्ताजी सिंधिया की हत्या कर दिल्ली पर कब्जा करने के साथ ही रखी गई थी।
दत्ताजी की हत्या व दिल्ली हाथ से निकल जाने की सूचना से मराठा पेशवा बालाजीराव आगबबूला हो उठे और उन्होंने, अब्दाली को हराने के लिए अपने चचेरे भाई सदाशिव राव भाऊ व अपने पुत्र विश्वास राव के नेतृत्व में विशाल सेना, दिल्ली को जीतने के लिए भेजी। मराठा सेना ने दो अगस्त 1760 को दिल्ली को अब्दाली के कब्जे से मुक्त करवा लिया। दिल्ली हाथ से चले जाने की सूचना से अब्दाली बौखला उठा और मराठा सेना के साथ दिल्ली पर कब्जे के लिए युद्ध करने की ठान ली। हालात को देखते हुए मराठा सेना ने महाराजा भरतपुर सूरजमल के साथ समझौता किया था। वहीं दिल्ली जीतने के बाद मराठा सेनापति भाऊ के तानाशाही रवैये के चलते भरतपुर के महाराजा सूरजमल के बीच तकरार इस कदर बढ़ गई कि दोनों के बीच अब्दाली से संयुक्त रूप से युद्ध करने का समझौता खत्म हो गया। समझौता टूटने के साथ ही अवध का नवाब शुजाउद्दौला ने अब्दाली से हाथ मिला लिया।
विज्ञापन


मराठा सेना ने कुंजपुरा (वर्तमान में करनाल का गांव) को भी अब्दाली के चुंगल से मुक्त करवा लिया। इस दौरान दिल्ली से कई-कई सौ किलोमीटर क्षेत्र में सूखा पड़ गया और मराठा सेना को रसद मिलनी बंद हो गई। रसद नहीं मिलने के कारण मराठा सेना की भूखे मरने की नौबत आ गई। हालात को ध्यान में रख कर मराठा सेना ने अब्दाली से समझौते के प्रयास किए। लेकिन रूहेला सरदार नजीब ने कूटनीति चाल चलते हुए अब्दाली व मराठों के बीच वार्ता नहीं होने दी। वहीं मराठा सेना को हराने के लिए अब्दाली, शुजाउद्दौला व नजीब की सेनाएं एकजुट हो गई और तीनों की सेना को इस्लामिक सेना का नाम दिया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन

इधर, अब्दाली अपनी सेना के साथ यमुना नदी पार कर पानीपत में मैदान में आ डटा और इसके साथ ही युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो गई। अकाल से त्रस्त मराठा सेना के सामने करो या मरो के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। विकट हालत में वीर मराठाओं ने अब्दाली से युद्ध करने का निर्णय लिया और 14 जनवरी 1761 की सुबह करीब आठ बजे मराठा सेना ने अब्दाली की फौज पर भयंकर हमला बोल दिया। करीब नौ घंटे चले युद्ध में मराठा सेना, दुश्मन पर हावी रही। युद्ध के दौरान पेशवा के पुत्र विश्वाराव शहीद हो गए। विश्वासराव की मौत की सूचना से सेनापति सदाशिव भाऊ आपा खो बैठे और घोडे़ पर सवार होकर अब्दाली की सेना पर टूट पडे़। युद्ध में भाऊ भी वीरगति को प्राप्त हुए। पहले विश्वासराव और फिर भाऊ की मौत की सूचना से मराठा सेना में भगदड़ मच गई और मराठा जीते हुए युद्ध को हार गए। इतिहासविद् डॉ. बिजेंद्र बालियान बताते है कि मराठा सेना, अकाल का शिकार हो गई। वहीं दिल्ली फतेह के बाद दंभी प्रवृति के मराठा सेनापति सदाशिव भाऊ ने अराजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए महाराजा भरतपुर सूरजमल के साथ अब्दाली से संयुक्त रूप से युद्ध करने का समझौता खत्म कर दिया। यदि समझौता न टूटता तो अब्दाली की हिम्मत युद्ध करने की ही नहीं होती। उन्होंने बताया कि भरतपुर के साथ समझौता खत्म होने, अकाल के कारण मराठा सेना को रसद नहीं मिलने, अवध व रोहिला के अब्दाली के साथ मिल जाना ही मराठाओं की हार का कारण बन गया। उन्होंने दावा किया कि मराठा सेना, अब्दाली से नहीं बल्कि अकाल से पहले ही हार चुकी थी, भूखी-प्यासी मराठा सेना ने वीरता का परिचय तो दिया, लेकिन भूखे पेट युद्ध नहीं जीते जाते।

पानीपत की धरती पर लड़े गए 18वीं शताब्दी के सबसे खतरनाक युद्ध में मराठा व अब्दाली की सेनाओं को जान व माल की जबरदस्त हानि हुई थी। युद्ध खत्म होने के बाद मराठा सेना ने पेशवा को भेजे गए पत्र में कुटनीतिक भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा था कि दो मोती टूट गए, यानि सेनापति सदा शिव भाऊ व विश्वास राव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। 73 स्वर्ण मुद्रा खो गई, युद्ध में मराठा सेना के 73 सरदार शहीद हुए। चांदी व तांबे के नुकसान का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है, चांदी मतलब सैनिक व तांबे से तात्पर्य पशु धन से था। वहीं अब्दाली की सेना को भी इस युद्ध से जबरदस्त जान माल की हानि हुई थी। इधर, पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद फिर किसी विदेशी हमलावर की हिम्मत खैबर के दर्रे से भारत पर हमला करने की नहीं हुई। स्मरणीय है कि विदेशी हमलावर खैबर के दर्रे से ही भारत पर हमला करने के लिए आते थे। महाराजा सूरजमल ने बचाई थी।

मराठा स्त्रियों की लाज युद्ध में हारने के बाद अब्दाली की सेनाओं ने मराठा सेना का दमन शुरू कर दिया था। वहीं मराठा सेना के साथ बड़ी संख्या में स्त्री व बच्चें भी थे। महाराजा भरतपुर सूरजमल ने मराठा सेना के साथ आई स्त्रियों व बच्चों को शरण दी और हालात सामान्य होने पर अपनी सेना की सुरक्षा में मराठा स्त्रियों व बच्चों को आर्थिक व रसद की सहायता प्रदान कर महाराष्ट्र भिजवाया था।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed